किन्हीं अनगढ़ हाथों के जोड़े ने
बनाई थी वह मूर्ति,
जिसे कल रात प्रतिष्ठित किया गया
देवी-जागरण के लिये।
(ये धंधा था उनका,
उनका रोजगार,कोई श्रद्धा नहीं)
चार जोड़ी आंखों ने देखी वह मूर्ति
मोहित हुये,
आंखों में भर ली सुगढ़ देहयष्टि,
उपयुक्त रहेगी प्रतिष्ठा के लिये।
अगले मोहल्ले वालों से
अच्छी है लाख गुना।
(जागने लगा था धर्म भी थोड़ा-थोड़ा)
प्रतिष्ठा हुई, श्रंगार हुआ
लोगों ने की वाह-वाह।
क्या छांट कर लाये हैं,
कितनी आकर्षक।
(हम भी लायेंगे ऐसी ही अगले साल)
रात भर बजता रहा झांझ,
ताल-मदंग ढोलक मंजीरा।
झूम-झूम कर गाते रहे भक्त,