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साहित्य

साहित्य जगत

कम्पूटर के लिये सर्वोत्तम भाषा : संस्कृत - 'रिक ब्रिग्ज़'

नासा के एक वैज्ञानिक रिक ब्रिग्ज़ का एक लेख 'ए आई' ( आर्टिफ़िशल इंटैलिजैन्स्, कृत्रिम् बुद्धि) पत्रिका में १९८५ में‌ प्रकाशित हुआ है जिसमें उऩ्होंने घोषणा की है : “कम्पूटर के लिये सर्वोत्तम भाषा संस्कृत है"।
कम्पूटर की क्रियाओं के लिये कम्प्यूटर के अन्दर एक भाषा की आवश्यकता होती है जो गणितीय तथा अत्यंत परिशुद्ध होती है। इस भाषा से 'बात' करने के लिये कम्प्यूटर क्रमादेशकों (प्रोग्रामर्स) को एक प्रचलित (स्वाभाविक )भाषा की आवश्यकता होती है जो उसके दैनंदिन कार्य की भाषा तो होती है किन्तु उसका भी परिव्हुद्ध होना अनिवार्य होता है अन्यथा कम्प्यूटर उसकी बात को गलत समझ सकता है।

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बारिशों में गोवा

हवाई-जहाज़ से उतर कर पहला कदम बाहर रखते ही एक हल्की सी बौछार ने चेहरे को भिगो दिया। दिल्ली से चले थे तो वहाँ भी बहुत इंतज़ार करने के बाद बारिश ने अपनी आहट दे दी थी, लेकिन इस बौछार में गोवा की गंध थी। यह गंध ही हमें एक ही मौसम के अलग-अलग रंगों में नहाने का अवसर देती है। शहर की गंध एक ही मौसम का रंग बदल देती है। बाहर निकले। सितादे-दे-गोवा के कुछ लोग हमारे इंतज़ार में तख़्तियाँ और छाते लिए खड़े थे। खुले हुए छाते के नीचे सिमटते हुए हम कुछ हक़ीक़त और कुछ फ़सानों में भीग रहे थे। होटल की कोच कुछ ही पलों के बाद हरियाली और पानी के बीच तेज़ी से वैंगुइम बीच की ओर भागी जा रही थी। यहीं और इसी बीच पर था होटल।

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भाषा¸ संस्कृति और जीवन का जैविक सम्बन्ध

भाषा और मनुष्य के जीवन में उतना ही गहरा सम्बन्ध है जितना माता और सन्तान में। विमाता और विदेशी राजभाषा के व्यवहारों में भी काफी समानता है। समस्त प्रकार के जीवों में शाब्दिक भाषा मात्र मनुष्य के ही पास है। पाशविक प्रवृत्तियों का उदात्तीकरण भाषा और संस्कृति के ही द्वारा सम्भव है। अथार्त मनुष्य पशु से मानव या राक्षस या देव भाषा के द्वारा ही बन सकता है। जब भाषा का इतना मूलभूत और क्रान्तिकारी प्रभाव पड़ता है तब यह देश भाषा को उचित महत्व क्यों नहीं देता। यह भी हमारे सांस्कृतिक पतन का एक ज्वलन्त उदाहरण है। मीडिया ने मानवीय संस्कृति को धता बतलाते हुए ऐसी ‘सदा आधुनिक’ पारिस्थितिकी का निर्माण किया है ज

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हिन्दी फान्ट कन्वर्टर

हिन्दी फान्ट कन्वर्टर

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भाषा और संस्कृति: भारतीय जीवन का संदर्भ

जब द्वितीय युद्ध ने सामरिक शक्ति के बल पर स्थापित साम्राज्यवाद को तोड़ दिया तब यू एस ने आर्थिक साम्राज्यवाद प्रारंभ किया जिसके प्रसार में बहुल उत्पादन प्रौद्योगिकी ने तथा बहुल विनाश प्रौद्योगिकी ने बहुत मदद की। इसके प्रसार से अंग्रेजी भाषा का भी साम्राज्य बढ़ा। अब आर्थिक साम्र्राज्यवाद को सुदृढ़ करने के लिये भाषाई साम्राज्यवाद बढ़ाया जा रहा है जिसके लिये अधिकांश भारतीय माध्यम पर लगातार 'आर्थिक दबाव

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पत्थर, पानी और जंगल प्रताप सहगल

पत्थर, पानी और जंगल                                      प्रताप सहगल 
28।2।2009

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भारतीय वांग्मय में विज्ञान कथाएं: पौराणिक सन्दर्भ

दिक वांग्मय, रामायण, महाभारत, पुराणों और श्रीमद्भागवतादि जो चर्चित भारतीय काव्यात्मक रचनाएं हैं, उनमें उल्लेखित विविध आख्यान, कथाएं भारतीय जीवन के संवेग और संकल्प के बिन्दु हैं। यह आख्यान और मनोग्राही विवरण हमारी सांस्कृतिक शाश्वता, निरन्तरता, सतता के ऊर्जा स्त्रोत हैं, भारतीयता की भागीरथी के अक्षुण्ण प्रवाह के कारक हैं। इन विविधवर्णी आख्यानों और कथाओं की मधुमय, अमृतमय शक्ति है कथ्यों एवं तथ्यों का रोचक रूप में मानवीकरण, जिसके परिणाम स्वरूप अतीत की स्मृतियां आज भी जनमानस में रची बसी सुरक्षित हैं।

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विज्ञान कथाओं में अदृश्यता तथा विज्ञान

मिथक में देवी देवताओं का अदृश्य होना एक सामान्य बात है। नारद जी चाहे जब तथा चाहे जहाँ प्रकट हो जाते। ग्रीक मिथक के अनुसार जो कोई हेड्स का हेलमेट पहन लेता है वह अदृश्य हो जाता है। पर्सिअस मिथक के अनुसार देवी एथेना से पर्सिअस एक टोपी प्राप्त करता है तथा इसे पहनकर अदृश्य हो जाता है। वह सोई हुई मेडयूसा के पास सीधा पहुंचता है तथा उसकी हत्या कर देता है। नॉर्स मिथक के अनुसार टर्न्हेम एक ऐसी ही टोपी पहनकर अदृश्य हो जाता है कस्वालाउन अदृश्य होकर अपब्रान एवं कई सरदारों की नृशंस हत्या कर देता है।

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कल्किआन अब सामान्य साहित्य भी प्रकाशित करेगी

प्रिय पाठकों,

कुछ दिनो पहले हमने एक लघु-कथा प्रकाशित की थी - 'विज्ञान और कला, एक लघु कथा'। संपादक तिवारी जी ने टिप्पणी की थी -- "यह लघु कथा विज्ञान और कविता का सम्बन्ध दर्शाती है, और उनके बीच कोई विरोध नहीं है यह भी।"

सच तो यही है कि साहित्य और विज्ञान समाज के आवश्यक तथा पूरक हिस्सों की तरह है, उन्हे प्रथक नही रखा जा सकता। उनके बीच कोई विरोध नही है। इसी विचार को हम मूर्त रूप दे रहे हैं। कल्किआन हिंदी अब विज्ञान पत्रिका की बजाये, हिंदी साहित्य की पत्रिका मे परिवर्तित हो रही है।

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by Dr. Radut.