इस समय सन् 2005 चल रहा है। आइये, समय के साथ दौड़ लगाते हैं और रेस के इस खेल में हम समय से आगे निकल जाते हैं। तो तय हुआ कि इस कहानी का देशकाल कुछ इस तरह है: काल 2050 और देश पृथ्वी पर ही समुद्र के बीच हजारों हेक्टेयर मे फैला हुआ एक ‘अष्ट धातु’ द्वीप जिसका जन्म पैंतालीस वर्ष पूर्व सुनामी मथंन के दौरान हुआ था। सुनामी नाम भी पहली बार उभरा था तब जब समुद्र की लहरों ने तांडव करके किनारों पर तबाही मचाई थी। लगा समुद्र अपनी मर्यादाओ के अनुशासन मे अर्सों से घुटन महसूस कर रहा था और उसने एकाएक घर मे बंद स्त्री की भॉंति विद्रोह करके दहलीज लॉंघ ली। फलस्वरूप समुद्र की छाती पर फफोलो की तरह ऐसे नये द्वीप उभर आये थे जो किसी भी गणराज्य की सम्पत्ति नहीं थे।
'“जो कुछ भी हमारे इर्द गिर्द होता है चाहे विचार स्वरूप हो या वस्तुपरक वह सब ऊर्जा के सन्तुलन का कारोबार है,” ‘टेक्नो स्प्रीचुअल' मत को बाकायदा बनाने और दृढता से मानने वाले विश्व के नम्बर वन उधोगपति अतुल शाह का कहना था। अक्सर जब वह अपने बेटे के साथ हेलीकाप्टर मे बैठकर मुम्बई से अष्टधातु द्वीप की उड़ान भरता तो समुद्र को ताकते हुए बीती बाते बताता, ‘जानते हो माई सन नकुल यह जो हमारा बी ओ सी यानी ‘बाडी आर्गन कापोर्रेशन‘ का दुनिया भर में फैला दर्जनों कम्पंनियो का एक साम्राज्य है वह एक दिन में नही बना है। मेरा किशोरावस्था का सपना था कि कुछ ऐसा कारोबार करूँ जिस मे फायदा ही फायदा हो और लोगों की जरूरत को भी वाजिब तौर पर पूरा किया जा सके ग्राहक को उसके दामों की उचित कीमत और गुणवत्ता मिलनी ही चाहिए।
‘तब मेरे हाथ ऐसे प्रोजेक्ट की फिजीबिलीटी रिपोर्ट हाथ लगी जिसे अंजाम देने के लिये चाहिये थी ऐसी साइट जहॉं किसी भी देश के कानूनों की कोई बंदिश न रोके वरन सम्पूर्ण सता मेरे हाथों में हो और मै निरंकुश हो अपनी योजना को साकार कर सकूँ और दूसरे देशों की जरूरत अपनी शर्तो पर पूरी कर सकूँ। और तभी नियति ने करवट बदली।’
'पैंतालीस साल पूर्व सुनामी लहरों ने कहर ढाया। लगातार महीने भर तटीय भूखण्डों पर भूकम्प के झटके आये तो विश्व की व्यवस्था राहत कार्यो में लग गई थी। पर मेरा कारोबारी दिमाग दूसरी ओर चलने लगा। रोज अखबारों में समाचार आता कि इस प्रा`कृतिक विपत्ति से क्या क्या परिर्वतन हो रहे हैं और तकनीकी कारणों का विश्लेषण भी। मैं अपनी रिसर्च टीम के साथ प्रभावित क्षेत्रों पर इसी तरह हवाई सर्वे करता नक्शा लेकर। द्वीपों का मुयाइना करता रहता। तभी हमें इस अष्टधातु द्वीप ठिकाना मिला। तब तक यह अस्तित्व में नहीं था मानों समुद्र ने डोजर तरह लेवलिंग करके हमें यह साइट का मुहैया करा दी थैंक्स टू द सुनामी वेव्ज। और जानते हो इसे हम अष्टधातु द्वीप क्यों कहते हैं?'
‘इतना तो जानता हूँ पापा क्योंकि जब आपने यहॉ की मिट्टी की जॉच करवाई तो उसमें अष्टधातु की उपलब्धता साबित हो गई ऐसा द्वीप जिसमें सोना, लोहा, तॉबा और यूरेनियम वगैरह सभी थे और तेल भी।’ नकुल ने कहा।
‘हॉ नकुल तभी मैंने तय कर लिया था कि मेरे प्रोजेक्ट के लिये यही सर्वोतम साइट है जहॉ प्रचुर मात्रा मे संसाधन हो और निरंकुश भी। प्राकृतिक संसाधन हों तो अपने पैरो पर खड़ा होने के लिये फिर चाहिये हाड़ मांस के मनुष्य जो सोच सकें और प्रकृतिक अवयव को उपयोगी स्वरूप में ढाल सकें। लोग खेतों मे गेहू चावल की फसल उगाते हैं। मैंने फैसला किया कि मैं अपने इस अद्वितीय द्वीप मे एकदम नये किस्म की खेती करूगा और मनुष्य की फसल उगाऊँगा। उनके अंगों की उपज का कारोबार कॅरूगा।'
‘फेंटस्टिक, पर पापा हम लोग ठहरे जैनी शुद्ध शाकाहारी अहिंसा परमोर्धर्म वाले। मम्मी ने विरोध किया होगा इस काम के लिये।’
'नहीं बेटे हम धर्म से जैन जरूर हैं पर वो हमारे घरों और संस्कारों तक सीमित है। हम शाकाहारी हैं। घर में तुम्हारी मम्मी शुद्व शाकाहारी भोजन बनाती है। वे तो प्याज भी नही खाती, रात को खाना एवाइड करती हैं। मै उसकी इन परम्पराओं का आदर करता हूँ पर बेटा वह मेरे कारोबार का आदर करती है। हमने दोनो को अलग रखा है।'
घर में हम पूरी तरह आत्म धर्म का पालन करते हुए जप तप करते हैं पर बाहर व्यवसाय में पूरी तत्परता से अपना कारोबार धर्म चलाते हैं वहाँ की प्रथमिकताएं कुछ और हैं।'
'वंडरफुल।'
‘अधिकांश हमारे पूर्वज क्षत्रिय थे तलवार चलाते थे। राज करते थे, पर जिनको वैराग्य भाव आ गया। उन्होने सब कुछ छोड़ दिया और तप करने लगे। हमारी सोच दोनों का मिश्रण है कारोबार मे क्षत्रिय और घरेलू संस्कार मे वीतरगी जिनेन्द्र।'
‘पर पापा मुझे कभी लगता है कि तप वाला मार्ग ही उचित है।’
एकाएक चौंक गये अतुल शाह। संदेह की आहट आने लगी उनकी चेतना पर। 'मैं देख रहा हूँ नकुल तुम पर मॉ का प्रभाव ज्यादा है मेरा कम।’
'चूंकि अब बड़े हो गये हो इसलिए बी.ओ.सी. के बारे मे सब बताना मेरा दायित्व बनता है। उम्मीद है कि इसकी मुख्य धारा को तुम संभालोगे। यूंँ मुझे मृत्यु से उतना खतरा नहीं कि इस बात की चिंता सताये मेरे बाद कौन इतना बडा साम्राज्य संभालेगा फिर भी एक प्रतिशत चांस नही लेना चाहता। तुम्हे मालूम होना चाहिये कि मेरे शरीर का सबसे मुख्य आर्गन दिल गुर्दे लीवर ऑख कान आदि के ‘स्टैण्ड बाई‘ हमेशा लैब मे तैयार रहते हैं बल्कि आटोमटिक प्रणाली के तहत इलेक्ट्रानिकली वे यूं जुडे है कि अगर किसी अंग की कार्यप्रणाली में जरा भी गड़बड़ी आई तो वह दूसरा ‘स्टैण्ड बाई ‘ अंग अपना काम शुरू कर देगा। उसी तरह जिस तरह प्लांट मे एक पंप मोटर के खराब होने पर दूसरी अपने आप स्टार्ट हो जाती है और पूरे प्लांट के कामकाज में कोई अंतर नहीं आता... फिर भी हो सकता है कभी तकनीकी गडबडी से अगर ब्रेक डाउन हो गया तो मैं जा सकता हूँ।'
दीक्षा दहन
पिता के साथ यूं तो नकुल पहले भी द्वीप पर आ चुका था लेकिन इस बार उसे आभास हो रहा था कि पिताजी किसी खास संकल्प के साथ उसे द्वीप पर लाये हैं। उसका मन पानी और समुद्र के विस्तार मे खुली उडान भरने का इच्छुक था और रह रहकर उसमें डूब जाता किन्तु समान्तर में पिताजी के शब्द भी उसकी चेतना को झकझोर रहे थे बारम्बार ध्यान खींच रहे थे।
‘जानते हो आज हमारे अंग आश्रम की दसवीं वर्षगांठ है उसके समारोह में हम जा रहे हैं। फिर मैं तुम्हे वहाँ की कई गोपनीय वर्क शाप और गोदाम दिखाना चाहाता हूँ।’
‘अच्छा क्या वहाँ और भी कुछ है जो मैने नहीं देखा है? मै जानता हूँ दुनियाँ भर में हमारे ‘पार्ट्स्’ ऊँची से ऊँची कीमत पर बिकते हैं।'
‘हाँ जो जो तुमने देखा है यानी हमारे प्रौधोगिक मेडिकल और कम्पयूटर संस्थान, जहाँ हम अपने इंजीनियर डाक्टर प्रबंधक और साफ्टवेयरकर्मी स्वयं तैयार करते है।’
‘और देखे हैं वो आराम दायक विश्राम गृह जहॉ हम पुरूष पर्यटकों को लाते हैं छुट्टियँ मनाने के लिये। उन्हें तमाम सुविधाओं के साथ हमारी परिचारिकाएं भी शारीरिक सान्निध्य के लिये उपल्ब्ध कराई जाती हैं। फलस्वरूप उत्पन्न होने वाली संतानों पर हमारा अधिकार होता हैं जिन्हें हम पालते हैं। मृत्यु होने पर उनके शरीर के अंगों का तत्काल शोधन कर उन्हें सुरक्षित रखते हैं और दुनिया भर में जरूरत मंद लोगों को मुह मांँगी कीमत पर किडनी ऑखें हार्टलीवर ज्वाइण्ट आदि सप्लाई करते हैं। यहीं तो फर्क है’मृत्यु’ होने पर नहीं वरन् मार्केट में ‘डिमांड’ होने पर।’
‘छि: तो क्या हम मनुष्यों को बकरों की तरह हलाल करते हैं।‘
‘क्या फर्क पडता है जीवों के शरीर तो आते जाते रहते हैं प्रकृति भी यही करती है। युद्ध में एक उद्देश्य के लिए मनुष्यों को झोंक दिया जाता है लाखों शरीर भंग होते हैं, सर्वत्र संतुलन को बनाये रखने के लिये। प्राकृतिक आपदाएं हजारों शरीरों को लील जाती हैं। कितना कुछ व्यय हो जाता है व्यर्थ ही। अगर यह सब नियोजित रूप से हो तो प्रोसस की उपयोगिता का दोहन किया जा सकता है। आखिर जो कुछ भी हो रहा है हमारे इर्द गिर्द सब ऊर्जा का परिवर्तन है। शहरों मे देखा नहीं किस तरह से धूर्तता से भोले भाले गरीबों का इस्तेमाल किया जाता है जहॉ दलाल और चिकित्सक छल से उनके अंग झटक लेते है स्त्रियॉ बेची खरीदी जाती हैं उन्हें पता भी नहीं चलता कि उनका शोषण हो गया। लेकिन अगर यही काम हम सम्पूर्ण पारदर्शिता, कायदे, गुणवत्ता और वाजिब ईमानदारी से करते हैं तो क्या हर्ज है? सबको अपनी कीमत मिलती है। लडाई मे भेजे गये सैनिको की तरह यह भी हमारी एक फौज है जो अंतिम उद्देश्य की पूर्ति हेतु अपना जीवन भी समर्पित करने के लिये कटिबद्ध है। प्रकृति के प्रवाह का कुछ अंश हम अपने नियंत्रण मे कर लेते हैं। यूँ सब परिणमन होता है। प्राकृतिक शक्तियों में से थोडी बहुत हम अपने को डेलीगेट कर रहे हैं।’
‘पर पापा सृष्टि का हर जीव और पदार्थ स्वतंत्र है, उसकी अपनी सता है। हम परस्पर एक दूसरे पर अवलम्बित जरूर है पर दूसरे की सत्ता मे हस्तक्षेप नहीं कर सकते, वैसा करने की कोशिश करना हिंसा है।’ नकुल के अनर्तमन से मॉ की आवाज उठने लगी।
‘जीव और पदार्थ सूक्ष्म अणुओं के पुंज हैं अथार्त सम्पूर्ण सृष्टि का सबसे छोटा तत्व है अणु असखंय अणु जिनसे चेतना बनी है जीना, मरना, सोचना, करना, इच्छाये, वनस्पतियों का उगना, मशीनों का निर्माण और चलना वास्तव मे सभी कुछ उन अणुओं का परस्पर विनिमय है। संसारिक रचना के कारोबार मे अणु ही बुनियादी विनियम प्रणाली है। अणुओ का ‘फ्यूजन’ और ‘डिफ्यूजन‘ ही ‘होना’ है लौकिक संसार में घटित इसी तरह होता है। हर पल यह समीकरण बदलता है यह सब करके हम नया कुछ नहीं कर रहे हैं। अणुओं को एक उद्देश्य विशेष के लिये संगठित कर रहे है कुछ कालांतर के लिये. . .संसार की हर लौकिक वस्तु जड़ और जीव दोनो. . .। वास्तव में आयु पुर्यंत उस स्थिति मे ठहरे हुए अणुओ का संगम ही है जो ऊपर से स्थिर होते हुए भी अंदरूनी तौर पर परिर्वतनशील है।’ अतुल शाह मुग्ध हो अपने युवा पु`त्र नकुल से कुछ कह रहे थे मानो बहुत कुछ उगल देना चाहते हों।
‘गहरी सोच है आपका पापा,‘ नकुल के मुँह से निकला। ’ये विचार आया कैसे? बी. ओ. सी. जैसा साम्राज्य बनाने का सूत्रपात कब हुआ?‘
‘कह नहीं सकता पर बचपन को माहौल का प्रभाव महसूस कर सकता हूँ। जानते हो तुम्हारे दादा के साथ बचपन में जिस शहर मे रहता था वह मुस्लिम प्रधान था। बीच चौक मे पिताजी की कपड़े की दुकान थी। वहीं एक गली मे हम रहते थे चारों ओर मुसलमान थे। निजी तौर पर हम सबसे मिलजुलकर रहते। पयूर्षण पर्व के अन्तिम दिन हमारे क्षमापर्व पर वे शामिल होते। ईद पर हम उन्हें मुबारकवाद देते...। लेकिन अन्दर हम सहमे रहते उनके वर्चस्व से आतंकित…चुप…। बकरा ईद के समय घर घर मे बकरे की कुबार्नी दी जाती और मुझे याद है कि मोहल्ले की नालियों मे लाल खून भर जाता था कि कुत्ते उनमे मुहॅ मारते। देखकर अजीब लगता …तुम्हारी दादी को उबकाई आती… पर वे चुपचाप मुहॅ दॉंपकर गली से गुजरकर मंदिर चली जाती। मै देखा करता ठेलों पर बकरों की खालो को लाद कर इधर उधर उसी तरह ले जाया जाता जिस तरह हमारे दुकान के लिये कपड़ो की गठान ले जाई जाती ... फिर ढेरों हडिडयॉं... जिन्हें थोक मे कोई कबाडी चाचा बेचा करते थे। पता चला कि हडिडयों को कैल्शियम बनाने वाले कारखाने खरीदते हैं...।’
'पापा...दादी धर्म से कट्टर जैनी...कैसे रह पाती थीं वहॉ?'
‘नकुल दादी कहती थी कि सब हमारे पूर्व जन्मो का कर्म बंध है...कभी क्षत्रिय योनि मे हमने जीव हत्याए की होंगी तभी इस जन्म मे वैसी विसंगति मे रह प्रायश्चित करना पड़ रहा है। सचमुच आश्चर्य होता था कि बाहर मासॉहारी वातावरण में भी अंदर हमारा घर पूर्णत: शाकाहारी था और मॉ पिता जी ने कभी उस मौहल्ले को छोड़ने की आतुरता नहीं जताई। सब कुछ नि:संग भाव से चलना रहता। स्भ्मवत: व्यापार और अर्थ संबंधी कुछ विवशताए भी हो इसके पीछे जिन्हें मै स्पष्ट तौर पर नहीं जानता था पर मैंने वह जगह छोड़ने का मन बना लिया था। बड़ा हुआ तो दूसरे शहर मे अपने कदम जमाने लगा...। वहॉ भी दुभार्ग्य से बूचड़ खाने से वास्ता पड़ा। जिस सोसाइटी मे हम रहते थे उससे थोड़ी ही दूर पर वह बूचड़खाना था। वहॉ रोज हजारों पशुओ को काटा जाता था...लोग कहते हैं कि वहाँ टनो खून रोज निकालता है जिसे भले ही पाइप के माध्यम से नीचे जमीन के अन्दर छोडा जाता है पर उस क्षेत्र का भू जल दूषित हो जाता है। हैण्ड पंप से निकाला जो पानी होता उसमें रक्तिम प्रदूषण होता। सोचो लोग कुत्तो की तरह पानी नहीं खून पी रहे थे मानो।’ नकुल के कान पापा की बातें सुन रहे थे पर आँखे आकाश और समुद्र के विस्तार को भॉंपने मे लीन थीं।
‘पर वहॉ की कारोबारी व्यवस्था अटूट थी मैंने गौर किया कि किस तरह किसी भी सुव्यवस्थित आधुनिक उद्योग के प्रोडक्ट की भॉति वहॉ मॉस की पेकिग की जाती बाजार मे भेजा जाता। पशुओं के अंगो का बाकायदा संचयन और उपयोग होता अथार्त सामग्री वापस वहीं आ जाती दूसरे रूप मेंजैसे बीज से पौधे होते है। कहते हैं न ऊर्जा न तो नष्ट होती और न ही क्रियेट की जाती वह तो बस अपना स्वरूप बदलती रहती है...’
‘यह नियम चेतनागत ऊर्जा पर भी लागू होता है पापा’ नकुल ने गहरे उतरते हए कहा ‘उन पशुओ की करूणा और वेदना भी समाप्त नही होती कहीं न कहीं वातावरण मे ही ठहर जाती है और हमारी चेतनागत ऊर्जा को दूषित करती रहती है। उसका आभास हमें तब होता है जब हम पर वैसी ही हिंसा होती है...”
‘यह सब संतुलन का पर्याय है माई सन्...वही समझाने तुम्हें यहॉ लाया गया है। मैं आज तुम्हें अपने कारोबार की दीक्षा देना चाहता हूँ। बी. ओ. सी. की गोपनीय बातों की जानकारी तुम्हें मिलेगी। साथ मे तुम्हारे शरीर मे सेंसर्स भी प्लांट किये जायेंगे हमारे सुपर स्पेशियालिटी अस्पताल में...ताकि तुम्हारे अंगों को भी ‘स्टेण्डबाई‘ प्रणाली की सुविधा उपलब्ध हो सके...‘
‘रोमांचक अनुभव होगा …… अद्रभुत भी …’नकुल के शब्द समुद्र की लहरों जैसे उठे पर वह अपने अंदर की गहराई और ठहराव को हिला नहीं पा रहा था।
बारात और वीतराग :
अष्टधातु द्वीप पर समुद्र के किनारे बी ओ सी का भव्य विश्राम गृह और अंग आश्रम का स्थानीय आफिस था। हेलीकाप्टर सीधे इमारत की छत पर उतरा ………फिर लिफ्ट से अतुल शाह अपने विश्रामकक्ष में आये। नकुल का कक्ष अलग बना था। अपने कक्ष में जाते हुए अतुल ने कहा ‘माई सन् ……फ़्रेश हो लो …फिर एक घण्टे बाद कांफेस रूम में रिव्यू मीटिंग लेंगे …तुम्हें भी वहाँ होना जरूरी है…’स्थानीय चीफ को उन्होंने संबोधित किया’ठीक एक घण्टे बाद…… आल द हेड्स टू अटैण्ड ………।
'ओके………मैं सूचित करता हूँ सर। ‘
अपने कमरे में आकर नकुल ने गहरी सॉस ली और खिड़की से समुद्र देखने लगा। कमरे मे सजावट थी। मेज पर फलचाकलेट और फि`ज मे ड़िंकस रखे थे। कमरे मे एक सुंदर और स्मार्ट केयर टेकर भी वहॉ थी। इस आज्ञाकारी मुद्रा मे कि अगर नकुल इशारा करे तो वह गुडिया निर्वस्त्र हो बिस्तर पर आ सकती है लेकिन नकुल ने उसे जो इशारा किया उसका संकेत था कि वह बाहर जा सकती है।
समुद्र की हलचल और आसमान की वीरानगी मानो धड़धडाकर बगैर इजाजत उसके जेहन के कक्ष मे घुस आई। समद्र की कोख से जन्मा अष्टधातु द्वीप उसी की गोद मे खेल सा रहा था ………दूर समुद्री बीच पर सैलानी अठखेलियो मे लिप्त थे। नकुल को दादी का चेहरा याद आया। वे भगवान नेमिनाथ की कहानी सुना रही थी दूल्हे नेमिनाथ की बारात राजकुमरी राजुल को वर ने द्वारिका से जूनागढ की ओर प्रस्थान कर रही थी। विभिन्न प्रकार को मंगल वांद्यों एंव शहनाई के स्वरों से सारा वातावरण गूंंज रहा था। हजारों राजा महराजा बतौर बाराती शामिल थे … रथ में विराजमान दूल्हा नेमिकुमार की शोभा का तो कहना ही क्या था। राजमहल के झरोखे से सहेलियों को साथ विनोद करती हुई राजकुमारी राजुल अपने हृदय सम्राट को एकटक निहारती रही है………।
घूमकर नकुल कमरे के दूसरी ओर आया वहॉ की खिड़की से अंग आश्रम की वो विशाल अट्रटलिकाएं नजर आ रही थीं जिनमे बी ओ सी के विभिन्न विभाग स्थित थे। टेक्नीकल इंस्टीट्रयूट………। आई टी बिल्डग मास्टर सर्वर : मेडिकल कालेज पर्यटन प्रकोष्ट और प्रोडक्शन शॉप तथा अंगो के संग्रहालय ……… सहसा और सबसे अलग नजर आ रही थी टीले पर बनी मास्टर नियंत्रण की इमारत जिसकी छत पर ऊंचा टावर लगा था। सम्पूर्ण दुनिया मे बी ओ सी के कामकाज को नियंत्रित करने वाला मास्टर सर्वर वहीं स्थित था। सहसा नकुल को लगा कि वे सभी इमारतें बाड़े में बंद पशुओं सी निरीह और लाचार हैं।’
इधर दादी की कहानी भी आगे बढ रही थी ………अचानक खरगोश हिरन आदि पशुओं का करूण चीत्कार भगवान नेमिकुमार के कानों मे पड़ा। वे चौक गये। उन्होने देखा कि एक बाड़े में बंद भूखे प्यासे पशु नेमिकुमार की ओर देखकर करूण कं`दन कर रहे थे मानो वे अपनी रक्षा के लिये पुकार कर रहे थे। हमे बचाओ प्रभु………। ’
नेमिकुमार ने और ज्यादा चौंकर सारथी से पूछा, ‘अरे आनन्द के वातावरण मे कैसा क्रंदन ……यहाँ उन पशुओं को क्यों बन्द करके रखा गया है……?'
सारथी ने संकोच के साथ बताया, ’महाराज आपकी बारात मे आये हुए राजाओं के लिये ये पशु यहॉ रखे गये हैं भोज के समय इनका वध किया जायेगा और मांस राजाओं को खिलाया जायेगा ………’
‘राजाओं के आहार के लिये निर्दोष पशुअओं का वध………!’विचार जैसे नेमिनाथ के मन में नहीं अपितु नकुल शाह के मस्तिष्क मे छाने लगे……
अंग भंग
तभी परीचारिका ने याद दिलाया कि उसे कांफ़्रेंस् के लिये जाना है। चेयर मेन साहब प्र`तीक्षा कर रहे हैं। मीटिंग मे यथावत सभी विभागों के प्रमुख मौजूद थे। तकनीक संस्थानो का लेखा जोखा समाप्त हुआ अंत मे रह गये अनुसंधान माकेटिंग प्रोडक्शन के प्रमुख अतुल शाह ने आर्डर की स्थित जाननी चाही तो माकेर्टिग प्रमुख ने कहा ’विश्व के सभी शहरों के सुपर स्पेशयालिटी अस्पतालों से हमारा सेतलाइट संपर्क हैं अंगो के आर्डर सीधे आ रहे हैं बुकिंग ज्यादा है ……हार्ट और किडनी के अलावा आजकल स्किन की डिमाण्ड ज्यादा है। बर्न केसेस के अलावा यू भी काले लोगों को प्लास्टिक सर्जरी से गोरा बनने का काफी चाव हैं…इसीलिये……।’
‘हमारे स्टाक मे गोरे लोगो का रा मटेरीयल है………? ‘अतुल शाह ने पूछा।
‘कम पड़ जायेगा पिछली बार के लाट मे गोरे लोगों को डिसेक्ट किया गया …… स्किन के लिये फलस्वरूप उनके दूसरे अंग गोदाम मे भेज दिये गये। किडनी और हार्ट का स्टाक बढा है … ‘ माकेर्टिंग प्रमुख कर रहा था।
‘प्लानिंग डिपार्टमेण्ट को चाहिए कि रा मटेरियल यानी मानवीय शरीर का गेस्टशन समय ज्यादा होने की बजह से हमे ‘क्लोनिग’ पद्धाति को भी अपनाने का सोचना चाहिये ताकि क्लाइण्ट की जरूरत के मुताबिक ‘क्लोन ‘ बनाकर अंग हासिल किये जा सकें………
‘कृत्रिम क्लोन की बजाय कोख् में मूल वीर्य से विकसित शरीरों को प्राथमिकता दी जाती है। ’
‘यानी स्वाभाविक नेचुरल और हबर्ल अंग ……हमें अंग के पर्यटन को प्रमोट करना होगा। विश्व भर मे सम्पन्न और अय्याश लोगो की भरमार हैंजिन्हे टूरिजम के साथ साथ सुरा सुंदरी भी चाहिए। उनको टारगेट करो ऐसी व्याग्रा जैसी उर्वरक दवाईयॉ खिलाओ कि मानवीय शरीरों का उत्पादन अधिक से अधिक हो……अतुल बोले जा रहे थे मेरे आज यहॉ आने का उद्देश्य और है मेरे साथ बी ओ सी का उत्तराधिकारी मेरा बेटा नकुल भी है इसके शरीर में वे सेंसर्स लगवाने हैं जो अंगो को दूसरे बाहरी पार्टस से बेक अप करेंगे उसी तरह जैसे मेरे अंगों को स्टैण्ड बाई मेकेनिज्म काम कर रहा है। यह हमारा सबसे महंगा प्रोजेक्ट है। विश्व के कई सेलीब्रिटीज इसे प्राप्त करना चाहते हैं। वाजिब प्राइज निगोशियेट होने पर यह सुविधा हम उन्हें दे सकते हैं। फिलहाल चयेर मेन यानी मै और वाइस चेयर मेन यानी मेरा बेटा नकुल इसे अपना रहे हैं सो हमारा चिकित्सा विभाग तैयार रहे ……’
‘हम पूरी तरह तैयार हैं ‘ अनुसांधान प्रमुख ने कहा ‘ हमें जब आपका संदेश मिला हमने तैयारी शुरू कर दी थी। अंग का चुनाव आप स्वयं करेंगे न ’
‘हॉ ……हमारे साथ नकुल भी अपनी राय देगा। माई सन` हम लोग गोदाम में स्वयं स्पेयर पार्टस पसंद कर ले ……। फिर आपरेशन मे ज्यादा समय नही लगेगा…………’
‘हार्डली थर्टी मिनिटस ……पेस मेकर की तरह बस कुछ सेंसर्स ही तो ही तो प्लांट करने है बाडी मे ……फिर सब कुछ कंट्रोल रूम से नियंत्रित होने लगेगा……’
सोच मे डूबे नकुल ने पिताजी का अनुसरण किया उसके अंतर्मन मे द्वन्द्व चल रहा था पर ऊपर से वह शांत और शालीन बना हुआ था।
विशेषज्ञों की टीम के साथ अतुल और नकुल शाह गोदाम मे पहॅचे। प्रयोगशाला ही था गोदाम पूर्ण वातानुकूलित और विशेष प्रकार के द्र`व्यो के मर्तवान में रखे कई अंग अतुल शाह ने उस दिल को देखा जो उनके दिल का ‘स्टैण्ड बाई‘ था।
‘इस स्टैण्ड बाई का भी स्टैण्ड बाई है …… जब आपको पिछली बार हल्का दौरा पड़ा था तो यह एक्टीवेट हो गया था हमने इसका भी बैक्र अप प्लान किया है।’
‘गुड’
‘वाइस चेयरमेन नकुल साहब के लिये उस उम्र के अंग उधर हैं……।’ विशेषज्ञ ने कहा ॐ नकुल के चेहरे पर प्राकृतिक कोमलता थी जो अनायास ही सबको आकर्षित कर रही थी।
‘सो माई सऩ गेट रेडी ……कौन सा अंग पंसद आया?'
‘मै विचार कर रहा हूँ और इनसे सवांद भी …………।’
अतुल शाह चौके ’क्या …अभी सेंसर्स लगे नही और संवाद होने लगा।’
’हॉ पापाचेतना की ग्रिड में हम सब एक दूसरे से जुड़े हैं। उसके लिये आपकी यह कृत्रिम संचार प्रणाली आवश्यक नही। अगर ब्`ह्यण्ड मे फैली चेतना के सूक्ष्म तंत्र से हम सीधे सिनक्रोनाइज हो जाए तो सर्वत्र सिग्नल भेजे जा सकते हैं और किसी भी देशकाल के ऊर्जा कणों से संपर्क किया जा सकता है उन्हें साकार भी किया जा सकता है………’
‘वण्डरफुल!’ अतुल शाह के अलावा अन्य लोग भी सम्मोहित हो नकुल की वाणी सुनने लगे…।
‘मुझे इन अंगो के स्वर सुनाई दे रहे हैं। पापा क्या आप नहीं सुन पा रहें… फूलों की तरह आपने शरीर रूपी पौधों से इन्हें तोंड़ लिया… पर कब तक ये जीवित रहेंगें ये… परिर्वतन टाला नही जा सकता जब हर परमाणु स्वंय गतिशील है तो उसके पुजं से बनी स्पेस में स्थित कोई वस्तु स्थिर कैसे रह सकती है। ये अंग भी क्रंदन कर रहे है कि क्यो इन्हे इनके स्वाभाविक मूल से अलग कर दिया गया। नियति से हटकर इनका नियतां कोई और कैसे बन सकता है और नियति स्वयं कर्मों के बंध से बनी है।’
अतुल शाह को लगा वाकई स्टाक के सारे अंग विद्रोह कर रहे हैं। मिलकर नारे लगा रहे हैं उनके अपने दिल को सहयोग करने से इंकार कर रहे हैं। ‘हमारा इस तरह इस्तेमाल बंद करो हमें अपने घरों मे ही रहना है ……जैसे हैं ठीक हैं। हम बधुंओ मजदूर नही बनना चाहते हैं हम स्वतंत्र हैं… स्वतंत्रता हमारा मूल धर्म और अधिकार हैं…।’
ऊपर से सब सामान्य दिखने वाली स्थिति के बाबजूद अतुल शाह को लग रहा था मानो अपनी ही फैक्टरी मे उनका घेराव हो गया है। और मजदूरो की तरह अंगों ने उनके विरूद्व नारे बाजी शुरू कर दी है। एकदम विचित्र प्रकार की ‘आई आर’ समस्या थी यह। नकुल की बातों से असहमति होते हुए भी वे मौन थे क्योकि विरोध का साहस भी नहीं था उनमें। नकुल का बचपना लगा यह सब। उन्होंने सोचा ‘जरूर इस पर उसकी मॉ और दादी के संस्कार उभर रहे हैं। भावनाओं का यह दौर गुजर जायेगा आखिर उसके लिये यह महत्वपूर्ण अवसर है विवाह जैसा।उसे बीओ सी की कमान जो संभालनी है……’
' खैर बेटा ………तुम्हारी बातें दिलचस्प हैं पर आज का दिन तुम्हारे लिये दूसरी तरह से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। मै समझता हूँ वो रैक थ्री पर रखा और नाइन वाला हार्ट तुम्हारा स्टैण्ड बाई बन सकता है। किडनी भी देख लो?’
‘पहले दिल पर सिस्टम का रिस्पांस देख लो……। फिर अगली स्टेज पर किडनी का करेगे ……।’ टीम के अनुसंधान प्रमुखने मत व्यक्त किया।
‘ओ के………
‘तो चलें नकुल़……गेट रेडी फार आपरेशन……।’
‘पापा अगर इजाजत दे तो मै अपने ढंग से आपरेशन की तैयारी कर लूँ? मुझे लगता हैं बिना किसी शल्य चिकित्सा के यह कार्य सम्पन्न कर सकता हूँ। कुछ ऐसा कि बगैर किसी कृत्रिम सिग्नल के सभी आत्माओं एवं अंगों से संवाद कर सकता हूँ। अपने आपको जोड़ सकता हूँ। उनसे अपनत्व की शाश्वत ऊर्जा पा सकता हूँ ……।’
एकाएक आशंकित हो अतुल शाह ने पूछा, ‘क्या करना चाहते हो तुम?'
‘बी ओ सी के मास्टर टावर के निकट ही एक और पहाड़ी हैं उसकी चोटी पर जाकर मै आत्म ध्यान करना चाहता हूँ………।’
‘कहो तो वहॉ एक लग्जरी काटेज बनवा दें,’ किसी मातहत ने कहा।
‘मै सब कुछ छोड़कर वहॉ जाना चाहता हूँ … न कि बहुत कुछ जोड़कर…।’
असमंजस मे पड़ गये अतुल शाह। बी ओ सी के अधिकारी भी चौकने लगे पर नकुल की वाणी में जो निर्मलता थी उससे सबके विकार बुझने लगे। नकुल के चेहरे पर छाई गरिमा के दर्शन से सभी को असीम आनन्द का भाव आने लगा। मुस्कराहटएक सूरज की भांति नकुल के होंठों पर उभरने लगी जिसकी रोशनी से अष्टधातु द्वीप के कण कण में प्रकाश होने लगा। अतुल शाह के चिंतन मे किंचित भी विरोध न बचा…।
हौले से नकुल विश्राम कक्ष में गये और जब बाहर निकले तो निर्वस्त्र थे सभी मुग्ध भाव से अपरिग्रही नकुल के निर्विकार शरीर को न केवल पहाड़ी की ओर बढ़ता देख रहे थे वरन` श्रृद्वाभाव से उनके पीछे पीछे चलने भी लगे ॐ सबसे विरक्त नकुल अपने मे व्यस्त पहाड़ी पर जाकर आत्म ध्यान मे लीन हो गये।
अतुल शाह की मनसिकता भी अनायास जैसे पुत्र के साथ हो गई उन्हे मॉ की सुनाई कहानी याद आई। विवाह से इंकार कर नेमिनाथ जी ने वैराग्य धारण करने का निश्चय किया और सब कुछ त्यागकर तपस्या के लिये वन की ओर निकल पडे उन हजारों राजाओं ने भी उनका अनुसरण किया जो उनकी बारात में आये थे तथाकथित बारात एक आध्यात्मिक संघ मे बदल गई नेमिनाथ का अनुसरण करने वालों में उनकी होने वाली पत्नी राजुल और वे पशु गण भी थे जिन्हे वध हेतु बाड़े मे बंद रखा गया था……।
पहाडी पर ध्यान मुद्रा मे आसीन नकुल मानो समस्त ब्राह्यण्ड के कण से जुड़े ए थे। बी ओसी के कृत्रिम अंगो के अलावा उन समस्त अंगों से भी जो विश्व भर में अपने शरीर में रहते हए अपने कार्य कलापो मे लगे हुए थे और परस्पर एक दूसरे को अवलम्बन प्र`दान कर रहे थे।
ध्यान द्वीप
आइए समय के साथ और तेज दौडे लगायें। फास्ट फारवर्ड की तर्ज पर। अब जो संशोधित देशकाल है वह इस प्रकार है सुनामी मंथन से जन्मे अष्टधातु द्वीप का मन मंथन से पुर्नजन्म हुआ 2050 में। तत्यपश्चात बारह वर्ष तक अनवरत पहाड़ी पर नकुल ने तपस्या की सब कुछ त्यागकर ध्यान मे लीन रहे। उनकी शारीरिक जरूरते तप ऊर्जा से अनायास ही स्वत: पूरी होती थी मानो प्राकृतिक तौर पर वे वहाँ एक चट्टान की तरह विराजमान थे ……जिस पर धूप ……पानी …… भूख आदि का कोई प्रभाव नही था। बस भी परिवर्तन हो रहा था वह ब्राह्यण्ड की चेतनागत गति के अनुरूप था। ‘अष्टधातु द्वीप‘ अब अपनी बी ओ सी वाली पहचान से हटकर ‘ध्यान द्वीप ‘ के नाम से चचिर्त हो गया। नकुल की भव्य पीठ बी ओ सी के मास्टर टावर से ऊपर उठ गई ……। जो भी वहॉ जाता पाता बगैर बोले नकुल देव उनसे संवाद कर रहे है उनकी तरफ मुहॅ किये हुए उनसे ही मुखातिब हैं। आश्चर्य नही कि तीन सौ साठ अंश के सभी ठोस कोणो की दिशाओ मे हर तरफ जीव उन्हें अपनी ओर ही मुँह किये पा रहे थे………।
कालांतर मे नकुल ने अपना शरीर स्वाभाविक गति से छोड़ दिया किन्तु पहाड़ी पर उनकी चेतना अटल प्रस्तर शिला की भांति स्थापित हो गई। ‘अष्टधातु द्वीप’ का तथाकथित अतीत मिटता गया बी ओ सी के कार्यकर्ता अगो के कारोबार से शनै: शनै: मुक्त होते गये और ‘ध्यान द्वीप’ के चेतना कार्य मे लग गये।
सुदुर समुद्र की सुरम्य छाती पर स्थित ध्यान द्वीप दुनिया का आकर्षण बन गयाजहॉ जो भी जीव जाताअपने को नकुल देव से सीधे संवाद करता हुआ पाता…। उस पहाड़ी के चरणों में श्रद्वा भाव से लौटते हए समुद्र को देखकर लगता कि जैसे उसने भी जीवन पयंर्त तक नकुल देव की अभ्यर्थना को अपनी धर्मगत नियति मान लिया है।
-- राजेश जैन