दंगाई बनजारे

टी.वी. पर दिखने वाले सभी न्यूज चैनल इस समय एक ही खबर दिखा रहे थे। खबर भी कुछ ऐसी ही रोचक थी कि लोग टी.वी. के सामने से हट ही नहीं रहे थे।
खबर उड़ीसा के ताज़ा तरीन दंगों पर आधारित थी। दंगे भी कैसे। जंगलों में निवास करने वाली शान्तिप्रिय कौंध जनजाति के लोग अचानक आक्रामक हो गये थे। पिछले कई दिनों से वे आसपास के शहरों में लोगों को अपना निशाना बना रहे थे। किस मुद्दे पर वे आक्रामक हुए हैं, किसी की समझ में नहीं आ रहा था।
लेकिन लोगों के टी.वी. से चिपके रहने की ये वजह नहीं थी। भारत एक विशाल देश है जहाँ अपने अपने मुद्दों को लेकर लोग अक्सर एक दूसरे से लड़ा करते हैं। और फिर एक भी हो जाते हैं।
विस्मयकारी चीज उनके लड़ने का ढंग थी। शहर में दौड़ते हुए वे जिस किसी को पकड़ लेते थे, वह इस तरह अकड़ जाता था मानो उसे ज़ोरदार बिजली का झटका लगा गया है। फिर उसकी लाश ही मिलती थी।
दंगाईयों पर काबू पाने के लिए स्थानीय पुलिस बल के साथ पी.ए.सी. और सी.आर.पी. भी कोशिश कर रही थी लेकिन ये लोग गुरिल्ला पद्धति से वार कर रहे थे। थोड़ी देर के लिए जंगल से बाहर आते और तबाही मचाकर फिर जंगल और पहाड़ियों में छुप जाते। इसलिए उनपर काबू पाना बहुत मुश्किल हो रहा था।

इस समय उड़ीसा के पुलिस कमिश्नर ने इंस्पेक्टर्स की मीटिंग बुलाई थी।
"बहुत बदनामी हो रही है हमारी। आप लोग क्यों नहीं इस फसाद पर कन्ट्रोल कर पा रहे हैं?" कमिश्नर ने इंस्पेक्टर्स की तरफ देखा।
"क्यों न हम पूरी कौंध जनजाति का गोलियों से सफाया कर दें।" एक इंस्पेक्टर ने सुझाया।
"पूरी जनजाति फसाद नहीं फैला रही है। केवल उनमें से कुछ लोग ये हरकत कर रहे हैं।" कमिश्नर ने इंस्पेक्टर को घूरा और वह चुप हो गया।
"तुम लोग अपना दिमाग लगाओ और सोचो कि उनपर कैसे काबू पाया जाये।"
एक इंस्पेक्टर ने जेब से तंबाकू की पुड़िया निकाली और उसे हथेली पर लेकर मसलने लगा।
"ये तुम क्या कर रहे हो इंस्पेक्टर प्रकाश?" कमिश्नर ने उसे घूरा।
"दिमाग लगाना है न, तो पहले टानिक ले लूं।" इं प्रकाश ने एक झटके में तंबाकू हलक के अंदर उंडेल ली और मुंह चलाने लगा। फिर उसे निगलने के बाद बोला, "मेरा विचार है कि जंगलों के चारों तरफ दीवार खड़ी कर दी जाये।
कमिश्नर का चेहरा गुस्से के कारण सुर्ख हो गया। लेकिन वह कुछ बोल नहीं पाया। उसे पता था कि इंस्पेक्टर प्रकाश केन्द्रीय मंत्री का करीबी है और नोटों के सूटकेस पर उसका एप्वाइंटमेन्ट हुआ है।
उसी समय एक सिपाही ने अंदर आकर किसी का विज़िटिंग कार्ड कमिश्नर के सामने रखा।
"हमने मुंबई ए.टी.एस. से इस बारे में मदद मांगी थी। उन्होंने अपना एक आदमी हमारे पास भेजा है। अब यह मीटिंग यहीं खत्म होती है। मुझे उससे मिलकर आगे की प्लानिंग करनी है।"
वहाँ मौजूद इंस्पेक्टर्स के चेहरे बिगड़ गये। एक बाहर का आदमी उनपर वरीयता ले जाये, यह यकीनन खलने वाली बात थी।

इंस्पेक्टर यशवन्त ने इससे पहले कई टेढ़े मेढ़े केस हल किये थे। विशेश रूप से बाहरी आतंकवादियों से सम्बिन्धत।
"क्या उन दंगाईयों में से कोई पकड़ा गया है अब तक?" इं. यशवन्त ने कमिश्नर से सवाल किया।
"जिन्दा तो कोई नहीं पकड़ा गया। हां कुछ को मार गिराने में ज़रूर कामयाबी मिली है पुलिस को।"
"क्या उनके शरीर में इलेक्ट्रिक करेंट पैदा करने की कोई चीज़ पायी गयी?"
"नहीं। न ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कोई विशेश बात पायी गयी।"
"मुझे लगता है कोई जिन्दा दंगाई ही हमें कुछ सूत्र दे सकता है। मैं सोचता हूं दंगाग्रस्त क्षेत्र में रात गुजारी जाये।"
"जितनी फोर्स की जरूरत हो, बता दो। मैं इंतिजाम कर दूंगा।"
"फिलहाल मैं अकेले ही काम करना चाहता हूं।" कहते हुए इं.यशवन्त उठ खड़ा हुआ।

पहाड़ियों के बीच छुपते छुपाते इं.यशवन्त को तलाश थी किसी कौंध जनजाति के व्यक्ति की, जिसे वह जिन्दा पकड़ना चाहता था।
जल्दी ही उसे एक व्यक्ति दिख भी गया। इस जनजाति के लोगों की पहचान बहुत आसान होती है। क्योंकि इन व्यक्तियों के होंठ के आसपास का हिस्सा ज़रूरत से ज्यादा उभरा होता है।
लेकिन असली समस्या थी यह पता लगाना कि यह उन दंगाईयों में शामिल था या नहीं। इं.यशवन्त ने अब जोखिम लेने का निर्णय लिया और एकाएक पीछे से उसे आवाज दी। इस समय वहां दोनों के अलावा और कोई नहीं था।
आवाज सुनकर वह व्यक्ति पीछे मुड़ा और इं. यशवन्त को देखकर गुस्से में उसकी तरफ बढ़ा। उसका दायां हाथ हवा में उठ गया था। मतलब साफ था। वह एक दंगाई था और इं. यशवन्त की जान लेना चाहता था।
इं. यशवन्त ने फौरन जेब से पिस्टल निकाली और उसकी तरफ रुख करके ट्रिगर दबा दिया। पिट् की आवाज हुई और वह व्यक्ति आगे पीछे झूमने लगा। इं. यशवन्त की इस पिस्टल से दरअसल गोली न निकलकर बेहोशी का इंजेक्शन बाहर आता था जो सामने वाले को सेकंडों में बेहोश कर देता था।
उसके बेहोश होते ही इं. यशवन्त दौड़कर उसके पास पहुंचा और उसे उठाने का प्रयास करने लगा। लेकिन बिजली के तेज झटके ने उसका पूरा जिस्म झनझना दिया।
"इसका मतलब इसके पूरे जिस्म में करंट दौड़ रहा है। लेकिन यह कैसे संभव है?" बेयकीनी के भाव में उसने उसके जिस्म की ओर देखा।

"हमें अब जरूरत है एक अच्छे साइंटिस्ट की। जो उसके जिस्म का निरीक्षण कर असलियत का पता लगाये।" इं.यशवन्त ने कमिश्नर से कहा। अब तक पकड़ा गया व्यक्ति एक अलग बैरक में बन्द किया जा चुका था। उसे वहां तक पहुंचाने में काफी एहतियात से काम लिया गया था।
"क्या वह मेडिकल क्षेत्र का होना चाहिए?"
"हाँ। खासतौर से मोल्क्यूलर बायोलॉजी का माहिर। हमें उसकी एक एक कोशिका का बारीकी से अध्ययन करना होगा।"
इस समय दोनों बातें करते हुए उस कैदी की बैरक की तरफ बढ़ रहे थे। क्योंकि उन्हें खबर मिली थी कि उसे होश आ चुका है।
उन्हें देखते ही कैदी आगे बढ़ा और बैरक की सलाखें पकड़कर चीखने लगा।
"क्या कह रहा है यह?" इं.यशवन्त ने पूछा।
"कहता है कि इसे छोड़ दो वरना यह सबको मार डालेगा।" कमिश्नर चूंकि लोकल निवासी था इसलिए वहाँ की स्थानीय भाशाएं समझता था।
"इससे पूछिए कि ये लोगों की हत्याएं क्यों कर रहे हैं?"
कमिश्नर ने उससे चीखकर यह प्रश्न पूछा। जवाब में उसने भी चीखकर कुछ कहा।
"यह कहता है कि इसे अपनी देवी धरनी से ऐसा करने का आदेश मिला है। ये लोग धरनी की उपासना करते हैं।"
"यानि मामला धार्मिक है। फिर तो काफी गंभीर है। लेकिन इनकी देवी प्रकट कहां होती है?"
कमिश्नर ने फिर उससे सवाल किया। उसने पुन: फौरन उत्तर दिया। उसका जवाब सुनकर कमिश्नर की आँखें फैल गयीं।
"अब क्या जवाब दिया इसने?"
"विश्वास नहीं होता। यह कहता है कि जंगल में एक मंदिर के अंदर देवी स्वयं प्रकट होती हैं और उन्हें अपने हाथों से शक्ति प्रदान करती है। यह शक्ति मिलने के बाद ये लोग जिसपर हाथ रखते हैं, वह वहीं खत्म हो जाता है।"
"मामला वाकई कुछ ज्यादा ही इंटरेस्टिंग है। अब तो मुझे भी उस देवी से मिलना पड़ेगा। और शक्ति हासिल करनी पड़ेगी। मेरा ख्याल है जब तक इधर साइंटिस्ट इसके जिस्म की जाँच करें, मैं जंगल होकर आता हूं।"
"वहां जाना खतरे से खाली नहीं।"
"खतरों से खेलने के लिए ही मैं इस पेशे में आया हूं।"