इंस्पेक्टर वागले के घर की फोन की घंटी बज उठी। उनींदी आँखों से उन्होने हैंड सेट उठाया-"हैलो।"
"सब इंस्पेक्टर दिवाकर स्पीकिंग सर।"
"हाँ, बोलें।"
"सर प्रीतम नगर कालोनी के मकान नं। 150 में अभी-अभी एक हत्या हुई है।"
"क्या!" इंसपेक्टर वागले की नींद पूरी तरह गायब हो चुकी थी।
इंस्पेक्टर वागले के घर की फोन की घंटी बज उठी। उनींदी आँखों से उन्होने हैंड सेट उठाया-"हैलो।"
"सब इंस्पेक्टर दिवाकर स्पीकिंग सर।"
"हाँ, बोलें।"
"सर प्रीतम नगर कालोनी के मकान नं। 150 में अभी-अभी एक हत्या हुई है।"
"क्या!" इंसपेक्टर वागले की नींद पूरी तरह गायब हो चुकी थी।
"यस सर मैं घटनास्थल से ही बोल रहा हूँ।"
"मैं अभी आया" कहकर इंस्पेक्टर वागले ने फोन डिस्कनेक्ट किया और जल्दी-जल्दी तैयार होने लगे।
राजधानी में यह दसवीं गर्भवती महिला की हत्या थी। हत्या करने का ढंग और घटनास्थल की अन्य समानताओं के कारण पुलिस ने इन सभी हत्याओं का एक हत्यारा हो सकने की बात स्वीकारी थी पर हत्यारे और हत्या के कारणों से वह कोसों दूर थी।
घटनास्थल पर बड़ा मार्मिक दृश्य था। हत्या एक पच्चीस वर्षीय स्त्री की हुई थी। इंस्पेक्टर वागले महिला की लाश पर से चादर हटाते हैं और तुरन्त ही उनके मुँह से ओफ! की आवाज आती है। बड़ी बेरहमी से महिला के पेट में चाकू घोंपा गया था। वागले पूरे घर का मुआयना करते हैं, पर कोई अप्रत्याशित चीज या बात उनके हाथ नहीं लगी।
इन्टरनेट पर `द वॉशिंगटन पोस्ट´ पढ़ रहे जिज्ञासु ने बेवसाइट लॉग-ऑफ कर दी। जिज्ञासु एक लम्बी अंगड़ाई लेकर कुर्सी पर से उठा। उसे इंटरनेट पर समाचार-पत्र पढ़ते डेढ़ घंटा बीत चुका था। यह उसके प्रतिदिन की दिनचर्या का अंग था। संगीता बाथरूम में कपडे रखो।" उसने पत्नी को जोर से आवाज दी और टेलीफोन रिसीवर गर्दन के सहारे कान में सटाये दाहिने हाथ से नंबर मिलाने लगा। दो बार ट्रिन-ट्रिन होन के बाद कम्प्यूटराइज्ड फोन खुद-ब-खुद चालू हो गया। "गुड डे सर । मि0 बंसल इज नाट अवलेबुल ऑन टेलीफोन, प्लीज गिव योर मैसेज फार रिकाडिंग।"
"बंसल शाम चार बजे गृहमंत्री का प्रेस कांफ्रेंस तुम खुद झेल लेना मैं नहीं आ पाऊँगा, तबियत कुछ नासाज़ है" जिज्ञासु ने मैसेज छोड़ा। छ: सेकेण्ड बाद दूसरी तरफ से टू-टू की दो बार आवाज आई और कम्प्यूटराइज्ड फोन फिर चालू हो गया। "आपका मैसेज रिकार्ड कर लिया गया है, धन्यवाद।"
जब वह बाथरूम से लौटा तो डायनिंग टेबुल पर नाश्ता लग चुका था। "कल की सारी डाक देख ली संगीता।" नूडल्स को काँटे से गोल-गोल फँसाकर मुँह में डालते हुए उसने पूछा।
"काम के अतिरिक्त और भी कुछ याद रहता है तुम्हें?" बगल की कुर्सी पर बैठी संगीता कुछ प्रयोजित से लहजे में बोली।
"हाँ तुम" उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा।
"आज हमारी मैरेज एनीवर्सरी है, बडे आये हैं, हाँ तुम।" संगीता कुछ चिटक कर बोली।
"ओह शिट! मैं तो भूल ही गया था।"
"क्यों तुम्हारे कम्प्यूटर ने तुम्हें कांग्रेचूलेट नहीं किया क्या?" आँखें नचाती हुई संगीता ने चुटकी ली।
संगीता की इस बात पर जिज्ञासु ने हथियार डाल दिया। "तो फिर तैयार हो जाओं आज हम लंच बाहर करेंगे और तुम्हारी बेस्ट एक्ट्रेस `केट विन्सलेट´ की मूवी भी देखेंगे।"
संगीता अंदर चली गई। वह डायनिंग टेबुल से उठकर सोफे में धंस गया। `सचमुच मैं कुछ ज्यादा ही भूलने लगा हूँ।' उसने सोचा, `काम का बोझ इसके लिए उत्तरदायी है।´ उसने अपने मन को समझाया। `पर हम इतना काम क्यों करते हैं?' उसने विचार किया। तभी उसे अचानक जैसे कुछ याद आया हो। उसने एक समाचार पत्र नहीं पढ़ा।" हल्के से वह बुदबुदाया। कम्प्यूटर स्क्रीन पर `द आवजर्वर´ खोला। संगीत तब तक नेल पालिश के साथ ड्राइंग रूम कम स्टडी रूम में प्रकट हो चुकी थी। जिज्ञासु को फिर कम्प्यूटर पर बैठे देख उसने अपना माथा ठोका और सोफे पर बैठकर नेल पालिश लगाने लगी।
`द आवजर्वर´ के एक-एक दिन पीछे के लोकल पेज पर वह सरसरी निगाह दौड़ाता गया लेकिन लगभग डेढ़ महीने पहले के पेज को पढ़ते हुए उसकी आँखें स्क्रीन पर जम गई। एक-एक दिन पीछे का पेज खेलते हुए उसका चेहरा कठोर होने लगा। प्रतिदिन पीछे का एक विशेश समाचारों का सिलसिला जब समाप्त हुआ तो उसने एक गहरी सांस ली पर अगले ही क्षण जैसे उसे कुछ याद आया हो और वह माउस पर से हाथ हटाकर सर खुजलाने लगा जैसे कुछ याद कर रहा हो। `शायद कानपुर,´ मुँह से हल्की बुदबुदाहट के साथ चेहरे पर कुछ पा लेने वाली खुशी दमकी। उसने कानपुर से प्रकाशित होने वाले समाचार-पत्र `एवरी डे´ की साइट खोली।
थोड़ी देर बाद वह कम्प्यूटर लॉग ऑफ कर उठा गया और नेल पालिश लगा रही संगीता के गाल पर हल्की थपकी देते हुए कुछ अतिरिक्त अनुरोध से बोला-"सॉरी डियर मुझे अभी निकलना होगा भोपाल के लिए बहुत बडी खबर हाथ लगी है।"
दो दिन के बाद जिज्ञासु भोपाल से लौट आया। उसी दिन शाम को परफेक्ट टीवी चैनल, जिसका वह विशेष संवाददाता था, में एक विज्ञापन प्रसारित किया जा रहा था- "चार दिन पहले प्रीतम नगर कालोनी में हुई गर्भवती स्त्री की हत्या दसवीं हत्या नहीं थी बल्कि `आपरेशन गर्भवती महिला मर्डर´, कड़ी की यह बाइसवीं हत्या थी। जी हाँ चौंकिए मत। क्या है इन हत्याओं के पीछे, इसकी खबर हम देंगे अपने समाचार बुलेटिन में आज रात नौ बजे।
युवा जिज्ञासु का तथ्यों को प्रस्तुत करने की अपनी एक विशिष्ट शैली है। बोलने के प्रवाह में वह शब्दों के साथ जैसे खेल रहा होता है। शब्दों के उच्च और मद्धिम उच्चारण उसकी बात में जीवंतता ला देते है।
रात नौ बजे वह टी।वी। स्क्रीन पर था। "राजधानी में घट रही तमाम घटनाओं में से गर्भवती महिलाओं की हत्या सबसे सनसनीखेज और लोमहर्षक घटना है। ऐसी घटनाएं केवल राजधानी में ही नहीं हो रही है बल्कि दो अन्य जगहों भोपाल और कानपुर में भी घट चुकी हैं इन सारी घटनाओ में व्यापक समानता को देखते हुए कहा जा सकता है कि हत्यारा एक ही व्यक्ति है और शायद यह भी कि, वह मानसिक रूप से विक्षिप्त है।"
नांगलिया एअर लाइंस की फ्लाइट संख्या एक सौ दो दिल्ली से इंग्लैण्ड की उड़ान पर थी। सीट पर लगे बजर के दबने के बीस सेकेण्ड बाद चेहरे पर मुस्कान लिए एयर होस्टेस बजर दबाने वाले के सम्मुख खड़ी थी - "यस सर, व्हाट कैन आई डू फार यू?" सधे लहजों में एयर होस्टेस पूछी।
"मुझे इस फ्लाइट के सारे पैसेन्जर्स के नाम उनके पते सहित चाहिए।"
जिज्ञासु के अनुरोध पर एयर होस्टेस चिहुंकी और उसके चेहरे की मुस्कान उड़ गई "सॉरी, सर यह कार्य मेरे अधिकार क्षेत्र के बाहर है और इल्लीगल भी।"
"आई एम जिज्ञासु फ्राम परफैक्ट चैनल।" इस वाक्य के सुनने के साथ ही एयर होस्टेस के चेहरे की रंगत आश्चर्य मिश्रित खुशी के साथ लौट आई। तीन दिन पहले गर्भवती महिलाओं की हत्या का तन्तु जोड़ने वाले जिज्ञासु को फोन करने वाली महिलाओं में यह भी थी। "कौन है वह हत्यारा?" उसने फोन पर पूछा था क्योंकि उसकी गर्भवती बहन की भी हत्या हुई थी।
हिथ्रो हवाई अड्डे के लॉन्ज में आधे घण्टे से इंतजार कर रहे जिज्ञासु को उस फ्लाइट के यात्रियों की लिस्ट थमाती हुई इस एयर होस्टेस के चेहरे की हवाईयाँ उड़ी हुई थीं।
"बात लीक होने पर मेरी नौकरी पर बन आयेगी सर और सजा अलग।"
"डोन्ट वरी" जिज्ञासु उसके कंधो को थपथपाते हुए उसके विश्वास को प्रगाढ़ किया, और उससे विदा लेकर लॉन्ज के बाहर सड़क पर आ गया।
अनुसंधान संस्थान से निकलकर रेखा शाह ने पार्किंग से कार निकाली और तेजी से घर की ओर बढ़ने लगी। थोड़ी दूर पर छोटे-छोटे स्कूली बच्चों का एक जुलूस गुजर रहा था। बच्चों के हाथों में तिख्तयाँ थीं `पर्यावरण बचाओं, पेड़ लगाओं´।।। `समय की है यही पुकार वृक्ष लगाओं अपरंमपार। रेखा शाह को गाड़ी धीमी करनी पड़ी। उनकी निगाह बच्चों पर जा टिकी। वे क्षण भर के लिए बच्चों के गोल-मटोल चेहरों में डूब गई। बच्चे नारा लगाते हुए दो पंक्तियों में चले जा रहे थे। जुलूस के निकल जाने पर उन्होंने गाड़ी की स्पीड बढ़ा दी। सोफे में धंसते ही दिग्विजय कॉफी का प्याला लिये आ गये। कॉफी की चुस्की लेते हुए रेखा शाह के सामने उन बच्चों का गोल-मटोल चेहरा घूम गया। वे प्याला एक ओर रखती हुई आँखें मलने लगीं। दिग्विजय शाह उनकी बगल में बैठ कॉफी पी रहे थे। वे दिग्विजय की ओर घूमीं, "हमारी शादी को कितने दिन हुए?"
"चार साल।।क्यों क्या हुआ?"
उन्होने एक गहरी सांस ली, "तुम्हे नहीं लगता कि अब हमें एक बच्चा चाहिये।"
दिग्विजय के चेहरे पर एक शरारतपूर्ण मुस्कान थिरकी, "आफ कोर्स, क्यों नहीं!"
डॉ0 दिग्विजय शाह और डॉ0 रेखा शाह जेनेटिक इंजिनियरिंग के विशेषज्ञ वैज्ञानिक थे और देश के एक उच्च कोटि के संस्थान में कार्यरत थे। कालेज के समय से ही वे एक दूसरे को जानते थे। उन दोनो की महत्वाकांक्षा थी, आसमान की ऊँचाइयों तक जाने की। कार्य के प्रति दोनों जूनूनी थे।
***
संस्थान में डॉ0 रेखा और डॉ0 दिग्विजय साथ-साथ लंच कर रहे थे। डॉ0 रेखा जल्दी ही उठ गयीं तो डॉ0 दिग्विजय ने छेड़ा- "स्वस्थ बच्चे के लिए माँ का स्वस्थ होना जरूरी है।"
"दिग आई एम सीरियस, मुझे एक बच्चा चाहिये।" रेखा ने जवाब में कहा। रेखा के उत्तर के साथ ही डॉ0 दिग्विजय का चेहरा भी गम्भीर हो गया। वे रेखा के चेहरे पर मातृत्व की झलक साफ देख रहे थे।
कम्प्यूटर के सामने बैठे शाह दम्पित्त कम्प्यूटर की मदद से अपने भावी सन्तान की रूपरेखा तैयार कर रहे थे। टी0वी0 स्क्रीन पर एक तस्वीर उभरी ता रेखा शाह ने इस बच्चे की किशोरावस्था से लेकर युवावस्था तक की तस्वीर चाही। डॉ0 दिग्विजय की उंगलियाँ की-बोर्ड पर कुछ देर तक चल कर रूक गयीं और स्क्रीन पर बच्चे की तस्वीर उम्र के हिसाब से बढ़ने लगी। लगभग पच्चीस साल के युवक की तस्वीर के स्क्रीन पर फैलने के बाद तस्वीर स्थिर हो गयी। रेखा ने असहमति से सिर हिलाया।
"इसकी मूँछें नहीं होनी चाहिये।"
दिग्विजय की उंगलियाँ की-बोर्ड पर फिर मचली और कम्प्यूटर के इरेजर ने उस तस्वीर की मूंछें साफ करनी शुरू कर दी।
दरअसल शाह दम्पित्त के सनतान उत्पन्न करने के निर्णय के बाद दोनों ने अपनी इच्छा के अनुरूप सन्तान प्राप्त करने के लिए पहले उस भावी सन्तान की पूरी तस्वीर एवं आंकड़ा कम्प्यूटर के सहारे प्राप्त कर लेना चाहते थे। कम्प्यूटर में आयी तस्वीर को जब रेखा ने ओ0 के0 कर दिया तो डॉ0 दिग्विजय ने रेखा के डिम्ब ग्रिन्थयों में से कुछ डिम्ब निकाल कर उसे अपने वीर्य के साथ फलित किया। इसके बाद उसमें सूक्ष्म मोतियों की माला की तरह कृत्रिम मानव गुणसूत्र को इंजेक्शन द्वारा प्रवेश कराया। इस कृत्रिम मानव क्रोमोसोम में पूर्व निर्धारित गुणधर्मे वाले जीन शामिल होने से स्त्री-पुरूष के डिम्ब और शुक्राणुओं के मिलने से जो भ्रूण तैयार होगा, वह नये क्रोमोसोम के आदेश के अनुसार विकसित होगा। इस कृत्रिम गुणसूत्रों में एक जीन तत्व ऐसा भी होगा जो कोशिकाओं के बीच रहने वाली दोशयुक्त कोशिकाओं को नष्ट करता रहेगा। इससे एकदम प्राकृतिक रूप से ही शरीर में होने वाले दोष दूर हो जायेंगें। जब डॉ0 दिग्विजय और उनकी पत्नी की इच्छा के अनुरूप भ्रूण तैयार हो गया तो डॉ0 दिग्विजय ने उसे डॉ0 रेखा के गर्भाशय में स्थापित कर दिया।
अब इन्तजार था नौ महीने बाद के समय का जब पहले से पूर्व निर्धारित शिशु का पदार्पण इस धरा पर होगा। इसी के साथ रेखा के व्यवहार में भी काफी परिवर्तन आ गया। अब एक जूनूनी एवं महत्वाकांक्षी जेनेटिक इंजिनियर में भारतीय महिला के गुण आ गये थे। अभी भ्रूण प्रत्यारोपण के दो माह भी नहीं हुए थे और उन्होने भावी सन्तान के लिए बाजार से खरीदारी करनी शुरू कर दी थी। वे अपने भावी सन्तान का रंग-रूप, गुण, बनावट, चेहरे मोहरे को अपने मन-मस्तिश्क में उतार लेती और उसके साथ खेलती हुई स्वयं ही मुस्कुराती रहती। एक दिन जब उन्होंने संस्थान से इस्तीफा देने की बात अपने से की तो वे अवाक् रह गये।
"क्या हमारा भविश्य मात्र इतना ही होगा। हमारे सपने, हमारी महत्वाकांक्षा धूमिल हो जायेगी।" उन्होने भारी मन से कहा।
"कुछ भी हो पर अब मेरा मन नहीं लगता है।" रेखा शाह ने किसी शिशु की तरह मचलते हुए कहा।
भ्रूण प्रत्यारोपण के साढे छ: माह बाद एक दिन अचानक डॉ0 रेखा शाह के पेट में असहनीय दर्द होने लगता है। उन्हे अस्पताल में भर्ती कराया जाता है। अस्पताल की डॉक्टर बताती है कि यह प्रसव पीड़ा है। घंटे भर बाद डॉ0 रेखा शाह एक सुन्दर बच्चे को जन्म देती है। नाप-तौल के बाद बच्चे का वजन एक सामान्य नवजात शिशु के वजन से कहीं अधिक निकलता है जबकि वह बच्चा केवल साढ़े छ: माह मॉंं के पेट में था। अस्पताल के डॉक्टर इसे अचरज मानते हैं और इस पर कई जॉंच, परीक्षण एवं चर्चा करते हैं। परन्तु बेड पर लेटी डॉ0 रेखा शाह को इस सबसे कोई मतलब नहीं था। उनकी दुनिया बस उनके बच्चे तक ही सीमित थी। दो दिन के बाद जब वे अस्पताल से घर आयी तब भी उनका व्यवहार वही था।
महीने भर के बाद डॉ0 दिग्विजय को लगा कि, उनके लाडले के वृद्धि की गति तेज है तो वे इस बात को अपनी पत्नी से कहे परन्तु पूर्ण रुप से अपने शिशु को समर्पित मॉं ने बात यह कहकर टाल दी कि, अच्छे लालन -पालन एवं खान-पान के कारण उसकी वृद्धि तेज हो रही है। डॉ0 दिग्विजय इस बात से सहमत नहीं थे। उन्हें लगा कि जेनेटिक थिरेपी के दौरान ही जीनों में किसी सूक्ष्म परिवर्तन के कारण ये हुआ है। धीरे-धीरे समय बीतने लगा और शिशु छ: माह का हो गया। तब दिग्विजय और डॉ0 रेखा शाह ने महसूस किया कि उनके बच्चे का बौद्धिक विकास भी शरीर के विकास के अनुरूप ही हो रहा है। छ: माह का वह बच्चा दौड़ रहा था, उसके पूरे दाँत निकल आये थे। मानसिक एवं बौद्धिक गतिविधियाँ भी वह सवा साल के बच्चे के अनुरूप कर रहा था। डॉ0 दिग्विजय के माथे पर चिन्ता की लकीरें उभने लगी थीं कि, वे इस बात से खुश हों कि, उनका लड़का सुपर जीनियस है या इस बात से दु:खी हों कि, उनके लड़के के गुण अप्राकृतिक हैं।
रेखा शाह संस्थान जाने लगीं और समय बीतने के साथ उनका दो साल का बच्चा पाँच साल का हो गया। अब डॉ0 दिग्विजय की संशय की स्थिति समाप्त हो गयी। उन्हें लगा कि, भ्रूण निर्माण के दौरान कुछ ऐसा `बायोकेमिकल´ परिवर्तन हो गया है जिसने उनके पुत्र अमन की वृद्धि दर को बढ़ा दिया है। उन लोगों ने अमन की उम्र अधिक बताकर उसको स्कूल में दाखिला दिला दिया।
अमन के बढ़ने के साथ-साथ उसके अप्राकृतिक गुणों में भी वृद्धि होने लगी।
तीन साल की अवस्था में उसकी रूचि भौतिक और रसायन विज्ञान जैसे विशयों में हो ही नहीं गई अपितु वह उनका अच्छा खासा जानकार हो गया। साढे पाँच साल की अवस्था में अमन के आवाज में भारीपन आने लगा साथ ही मूँछ की रेखा भी आने लगी। सात साल की अवस्था में वह अट्ठारह साल का युवा हो गया-शरीर और दिमाग दोनों से। इन सात सालों में डॉ0 दिग्विजय ने कई बार अपना मकान बदला और अब वह जिस नए मकान में गए थे वहॉं वे अमन का परिचय अपने बडे भाई के पुत्र के रुप में कराते थे। इस बार नए मकान में आकर डॉ0 दिग्विजय की चिन्ताएंं और बढ़ गयी, डॉ रेखा भी एक अनजाने भय से भयभीत रहने लगीं। हालांकि डॉ0 दिग्विजय ने अमन पर जब वह एक साल का था तभी से कई जांंच, परीक्षण किए पर यह परीक्षण परिणाम विहीन थे। इसी दौरान अमन ने इलेक्ट्रान भौतिकी के कुछ ऐसे सूत्र दिए जिससे इलेक्ट्रान भौतिकी में क्रान्तिकारी परिवर्तन की संभावनाएं थी। इस नए सूत्र के कारण अमन अन्तर्रष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध हो गया। उसे ब्रिटेन के भौतिक संस्थान के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए चुना गया।
***
अपने घर पर कम्प्यूटर के सामने बैठे डॉ0 दिग्विजय के चेहरे पर बेचैनी और कौतुहल की मिली-जुली प्रतिक्रिया कम्प्यूटर पर उभर रही सूचनाओं के साथ बन-बिगड़ रही थी। डॉ0 दिग्विजय तीन साल से उस गुत्थी को सुलझाने में लगे थे जो अमन के अप्रत्यिशत शारीरिक एवं मानसिक वृद्धि का कारण था। इन तीन वर्षो में उन्होने अमन के शरीर से सैकड़ो बार खून, मूत्र, लार आदि निकालकर उनका परीक्षण किया था। वे परीक्षण के निष्कर्षों को कम्प्यूटर में फीड करते हुए और इन्ही की मदद से उस गुत्थी को सुलझाने का प्रयास करते रहे। आज उन्हे वह कारक तत्व मिल ही गया। कम्प्यूटर पर आये परिणाम के अनुसार उन कृत्रिम क्रोमोसोम में जो जीन तत्व दोष्युक्त कोशिकाओ को नष्ट करने का दायित्व निभा रहा था उसी जीन ने उसके शरीरिक एवं मानसिक वृद्धि करने वाले उन सारे कारको को इतना उत्तेजित कर दिया था कि इसमें अप्रत्यशित वृद्धि होने लगी थी।
इसके बाद क्षण भर के लिए कम्प्यूटर स्क्रीन एकदम साफ हो गया और अगले ही क्षण कम्प्यूटर पर अमन से संबंधित दूसरी रिपोर्ट आने लगी। इस नई रिपोर्ट के अनुसार जिन परिस्थितियों में अमन का जन्म हुआ और जिन परिस्थितियों में अमन का शारीरिक एवं बौद्धिक विकास हो रहा है यह सात साल चार महीने तक ही होगा। क्योंकि जो जीन उसके शारीरिक एवं मानसिक वृद्धि का कारक है उसकी आयु सात साल और चार महीने की ही है। उसके आद वह जीन मृत हो जायेगी। परिणामस्वरूप उसका मस्तिष्क बहुत मंद और शिथिल अवस्था में कार्य करने लगेगा। वह रहेगा तो अमन पर मात्र शरीर से। मन और बुद्धि पर उसका कोई नियंत्रण तब शायद नहीं रह जायेगा, और वह एक हिंसक पशु-सा भी व्यवहार कर सकता है।
रिपोर्ट पढ़ने के बाद डॉ0 दिग्विजय को चक्कर आने लगता है। वे कम्प्यूटर पर से उठ जाते है उनके बेचैन चेहरे पर पसीने की नन्ही बूंदें छलक आई। वे दरवाजे की ओर बढ़ने लगते हैं। अपने कमरे में आकर बेड पर बैठ जाते हैं। क्षण भर बाद लेट जाते हैं, अपनी सांस की रफ्तार को जैसे कम करने का प्रयास कर रहे हों। परन्तु दो क्षण बाद ही उठकर पाकेट से कलम निकाल कर हाथ पर ही कुछ गणना करने लगते हैं। गणना कर लेने के बाद एक लम्बी सांस लेते हुए चेहरे पर हाथ फिराते हैं। "बस दो महीने और," वे हलके से बुदबुदाये। उनके पास दो महीने का समय है, इन दो महीनों में वे अमन को ठीक कर पाये जो अच्छा है नहीं तो अमन।। एक सघन पीड़ा और अकुलाहट उतरने लगती है उनके शरीर में और वे हताश, बेसुध हो बिस्तर पर गिर पड़ते हैं।
***
हफ्ते भर से देख रही हूँ कि तुम उदास से दिखाई दे रहे हो।" अगली सीट पर बैठी डॉ0 रेखा ने कार ड्राइव कर रहे डॉ0 दिग्विजय से कहा।
डॉ0 दिग्विजय कुछ नहीं बोले। रेखा की बात सुनकर उनकी पीड़ी और सघन हो गई।
"बोलो क्या हुआ?"
डॉ0 दिग्विजय ने पूरी बात डॉ0 रेखा को बता दी। पूरी बात सुनकर रेखा को जैसे बेहोशी छाने लगी। " पर यह कैसे हो सकता है?" वे बदहवास थी " माना अमन सुपर जीनियस है पर कुछ दिनों बाद वह पागल हो जायेगा, नहीं ऐसा नहीं होगा।" वे जैसे खुद अपने को समझा रही हों।
"पर, रेखा, मेरे परीक्षण यही बताते है।"
रेखा कुछ नहीं बोली। कार रिसर्च सेंटर के बडे गेट के अंदर दाखिल हुई।
रेखा हमारे पास दो महीने का समय है और मुझे विश्वास है कि इन दो महीने में मैं अमन को ठीक कर सकूँगा। वैसे मैंने आज न्यूरोलाजिस्ट की एक पूरी टीम बुलाई है बात करने के लिए।" गाड़ी लॉक करते हुए डॉ0 दिग्विजय ने कहा।
समय अपनी गति से चलता रहा और दो महीने का समय भी बीत गया। इस दो महीने में वे दुनिया का हर संभव प्रयास किए पर कोई युक्ति नहीं सूझ पायी जिससे अमन के साथ होने वाली आशंका का निराकरण दिया जा सके।
डॉ0 दिग्विजय ड्राइंग रूम में बैठे थे। डॉ0 रेखा अभी-अभी उठ के गयी है, सोने के लिए। दो महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद अब वे लगभग निश्चित थीं कि अमन को कुछ नहीं होगा। पर डॉ0 दिग्विजय अपने परीक्षण से प्राप्त रिपोर्ट को अनदेखा नहीं कर पा रहे थे। थोड़ी देर बाद वे उठते हैं और अमन के कमरे की ओर चल देते हैं। अमन के कमरे का दरवाजा हलके से खोलते हैं। दरवाजा खुलते ही बाहर बरामदे में जल के बल्ब का प्रकाश दौड़कर अमन के चेहरे पर फैल जाता है। अमन एक अबोध बालक-सा निश्चन्त सो रहा था। वे एकटक उसे निहारने लगते हैं। उनका वात्सल्य उमड़ पड़ता है। थोड़ी देर बाद वे आहिस्ते से दरवाजा भिड़काकर अपने कमरे की ओर बढ़ गये।
***
इंग्लैण्ड से लौटने के बाद जिज्ञासु डॉ0 शाह के घर गया। डॉ0 शाह संक्षिप्त औपचारिकता के बाद जिज्ञासु के साथ ड्राइंग रूम में चले आये और नौकर को दो कप कॉफी के लिए बोले।
"मुझे भी कल ही पता चला है कि इसमें उसी का हाथ है। इस जानकारी के बाद मुझे लगा कि इस सब का कारण मैं ही हूँ। मैं मानसिक रूप से शून्य हो गया। समझा में नहीं आ रहा था कि क्या करना चाहिए। कभी मन में आता कि आत्महत्या कर लूं तो कभी सोचना कि सब पुलिस को बता दूँ और काफी जद्दोजहद के बाद मैंने निर्णय लिया कि, मैं पुलिस को सारी चीजें बताऊँगा।" अंतिम वाक्य तक आते-आते आवाज लड़खड़ाने लगी। वे उठे और दराज से कागज निकालकर जिज्ञासु की ओर बढ़ाये। "ये है शहर के पुलिस कप्तान को लिखा गया पत्र जिसमें मैंने सारी बातों का उल्लेख कर दिया है।"
जिज्ञासु पत्र थामकर सरसरी निगाह डाला। दो पन्नों में टाइप किया हुआ पत्र सेन्टर टेबुल पर रखते हुए बोला- "डॉ0 शाह अमन के इस तरह के कृत्य का क्या कारण हो सकता है।"
डॉ0 शाह की आँखे पनीली हो गई। वे रूमाल से आँखों को साफ किए पर उनकी आँखें और भरती चली गई। क्षण भर में उनका गला रूंधता चला गया और अगले ही क्षण वे फफक-फफक कर रो पड़े। जिज्ञासु के लिए ये सब अप्रत्यशित था। वह उठकर डॉ0 शाह का पीठ सहलाया। "डॉ0 शाह अपने को संभालिए।"
डॉ0 शाह ने दोनो हाथें से रूमाल पकड़कर आँख और नाक को साफ करने लगे। उनकी सिसकियाँ बँधने लगीं। थोड़ी देर बाद जब उनके अंदर का भावावेश थोड़ा थमा तो वे बोले- "सही माने में अमन के इस सारे कृत्यों का जिम्मेदार मैं ही हूँ। मैंने ही उसके जन्म की पूरी कहानी कम्प्यूटर में फाइल कर दी थी और बाद में अमन पर किये गये शोध की रिपोर्ट और परिणाम भी मैंने उसी फाइल कर दी थी और बाद में अमन पर किये गये शोध की रिपोर्ट और परिणाम भी मैंने उसी फाइल में डाल दी। एक दिन अमन ने वो फाइल खोल कर पढ़ ली और जब उसे अपनी वास्तविकताओं का पता चला तो वह असहज हो गया। मौत का डर उसमें गहरे तक समा गया और फिर..."
डॉ0 शाह आँखों की कोरों पर तैर आयी बूँदों को साफ किये, फँस रहे गले की ख़राश मिटाये जैसे अपने को मजबूत कर रहे हों। "अमन ने जब पहली गर्भवती स्त्री की हत्या किया तो वह एक विषेश प्रकार के मानसिक रोग से पीड़ित हो चुका था। उसने अपने द्वारा की गई उन सारी हत्या और उनसे जुडे पहलू को इसी फाइल में आगे फीड किया है, जिसे मैंने कल ही पढ़ा है और जिसके आधार पर मैं उस विशेश प्रकार के मानसिक रोग जिससे वह अब भी पीड़ित है कि बात कर रहा हूँ। इस रोग में रोगी को न चाहते हुए भी बार-बार नकारात्मक ख्याल आते रहते हैं। इन नकारात्मक विचार एवं ख्यालों की प्रतिक्रिया स्वरूप रोगी रक्षात्मक कार्यवाही में लिप्त हो जाने को विवश हो जाता है। मेरे हिसाब से वह फाइल पढ़ने के बाद जब वह अत्यधिक भयाक्रान्त था तभी किसी गर्भवती स्त्री को देखा होगा और इस स्त्री के गर्भ में वह स्वयं को ईमेजिन कर लिया होगा, जहाँ उसका दम घुट रहा है, जहाँ से वह निकल भागना चाह रहा है स्वतंत्र हो जाना चाह रहा है। इसी द्वन्द्वात्मक मनास्थिति में वह।।। और हत्या के बाद जब उसका ज्वर थमा होगा तो वह वहीं पुराना सुपर जीनियस अमन हो गया होगा जो आगे और शातिर होता गया साथ ही गर्भवती स्त्रियों से उसकी भयाक्रान्तता और भी बढ़ती चली गयी।" वे क्षण भर के लिए रूके। " इन सब कारणें का जिम्मेदार और अपराधी मैं ही हूँ, क्योंकि अमन को तो बनाया मैंने ही है, प्रकृति के नियम के साथ छेड़छाड़ करके" अब वे भावुक नहीं थे बल्कि हदय से उद्वेलित वह दुखी थे।
मैं आपकी उस बात से सहमत हूँ कि अमन गर्भवती स्त्रियों को देखते भयाक्रान्त हो जाता था। उसकी यही प्रवित्त मेरे शक का आधार बनी और मैं आपके घर तक आ पहुँचा। जिस फ्लाइट से अमन अपनी माँ के साथ ब्रिटेन जा रहा था - भौतिकी संस्थान से पुरस्कार ग्रहण करने उसी फ्लाइट में मैं भी था। अमन मेरे समान्तर सीट पर था और मेरे आगे, की सीट पर एक ऐसी गर्भवती महिला बैठी थी जिसे, कभी भी प्रसव पीड़ा शुरू हो सकती थी। अपनी सीट पर बैठे अमन के चेहरे की भाव-भंगिमा अजीब-सी थी। पहले तो मैंने ध्यान नहीं दिया पर जब मुझे लगा कि वह उस महिला को देखकर बेचैन हो रहा है तथा मौत का सा भय उतर आ रहा है उसकी आँखों में तो मैंने काफी बारीकी से इस पर ध्यान दिया। अमन कई बार बेचैनी और घबड़ाहट में उठकर उस महिला तक गया। वह कभी आपस में अपना हाथ रगड़ता कभी चेहरे को बेरहमी से खींचने जैसा प्रयोजन करता। पर शायद उस दिन सौभाग्य अच्छा था। उस महिला को बैठने में तकलीफ के कारण उसके अनुरोध पर एयर होस्टेस ने उसे सबसे पीछे ले जाकर व्यवस्थित कर दिया तब जाकर अमन थोड़ा सामान्य हुआ, पर हवाई जहाज के लैण्ड करने तक वह पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाया था। उसी फ्लाइट में मुझे शक हुआ और मैं एयंर होस्टेस से यात्रियों की लिस्ट माँगकर आप तक पहुँच आया।"
ड्राईंग रूम में एक बोझिल खामोशी तैरने लगी। नौकर के सेन्टर टेबुल पर कॉफी का प्याला रखने के बाद डॉ0 शाह को जैसे ख़ामोशी तोड़ने का मौका मिला। उन्होने जिज्ञासु को कॉफी के लिए इशारा किए।
"अभी अमन कहाँ है?" जिज्ञासु कॉफी का प्याला उठाते हुए पूछा।
"वह घर में ही सो रहा है, मैंने उसे हलकी बेहोशी का इन्जेक्शन दिया है।"
कमरे में एक बार फिर खामोशी तैरने लगी पर अब कमरे का वातावरण हलका था।
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अमन की गिरफ्तारी के चार दिन बाद डॉ0 शाह की अमन के लिए की गई भविष्यवाणी मूर्त रूप से परिणत हो गई। शरीर से अट्ठारह वर्ष का युवा अब मानसिक रूप से डेढ़ साल के बच्चे से भी कम था। उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया। अमन के बेड पर बैठ कर फूट-फूट कर रो रही रेखा शाह को डॉ0 शाह ढाँढस बँधा रहे थे - "रेखा हम जैसा बोयेंगे वैसा ही काटेंगे यह प्रकृति का नियम है।" वे रेखा शाह का चेहरा अपने सीने में छिपाकर शान्त कराने लगे।
लौटते वक्त रास्ते में स्कूली बच्चों के जुलूस के कारण उन्हें कार रोकनी पड़ी। छोटे बच्चों का झुडं एक स्वर में गाते चला जा रहा था। रेखा शाह ने खिड़की से बाहर देखा-सड़क के किनारे वृक्ष कतारबद्ध खडे थे, आसमान नीला था, धूप चटक थी पर उसका अहसास सुखद गुनगुना था। वे पलट कर दिग्विजय शाह की ओर देखने लगी जो उन्हें ही देख रहे थे। वे अपलक उन्हें देखती रही जैसे उन्हें कुछ समझा रही हो। डॉ0 शाह भी उन्हें अपलक देखते रहे जैसे उनकी बातों पर मौन स्वीकृति दे रहे हों।