.....संदीप,
आज अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी तुम्हें पत्र लिख रही हूं। मानती हूं अपने वैवाहिक जीवन की श्रंखला के लिये कोई भी इसे नैतिक अपराध कह सकता है.....मुझे ये पत्र नही लिखना चाहिये था पर एक-एक करके तुमसे कहने को इतनी सारी बातें इकठ्ठीं हो गईं हैं कि उनके बोझ से अपने आप को हल्का करना जरूरी सा हो गया था। उसके बाद एक बार कसम भी खाई थी तुम्हें कभी पत्र नहीं लिखूंगी, पर मेरा अपने आप पर इतना अधिकार ही कहां रह गया है। जो भी मेरे पास था वह सब का सब मैने तुम्हें सौंपना चाहा था पर तुमने उसे स्वीकारा ही कब था....बेबस आंखों के आंसुओं सी मैं तिप-तिप करके धूल में गिरती सूखती रह गयी थी। टटकी मिट्टी की सोंधी गंध तुम कहां पहचान पाये थे। तुमने तो आंख-कान बंद करके सिर्फ दिमाग खुला रखा था, वरना क्या इतना भी न समझ पाते। हर चीज सिर्फ दिमाग से ही नहीं जानी जाती। कभी कभी ये जानते हुये कि जो हम सुन रहे हैं सारे का सारे झूठ है, फिर भी वह झूठ अच्छा लगता है। काश तुमने अपनी बौद्धिकता का लबादा उतार कर कुछ ऐसे ही ‘खूबसूरत झूठ’ बोले होते। तुम नहीं समझोगे कि ऐसे झूठों के लिये मैने कितनी बार तुम्हारा मुंह ताका था.... पर तुम या तो ‘मन’ में झांकने का तथाकथित प्रयास करते रहे थे या सिर्फ जिस्म नापते रहे थे। जानते हो बौद्धिकता का सहारा वही लेते हैं जो मूलतः कमजोर होते हैं। ये तुम्हारा ‘कॉम्पलेक्स’ था जिसने तुम्हें बौद्धिक बना दिया, ये तुम्हारी भूख थी...सिर्फ भूख, मानसिक.....या शारीरिक, वरना तुम प्रकृति से कभी बौद्धिक नहीं थे। तुम ये सोच रहे होगे कि मै तुम्हारे बारे में इतना सब कैसे जान गई? जरा सोचो जिसकी धडकनों ने तुमसे घंटो बातें की हों....जिसके जिस्म के हर हिस्से को तुम्हारी उंगलियों का अहसास हो वह इतना भी न समझेगी भला।
तुम मुझसे कहा करते थे कि आदमी कहीं भी जाये परछाइयाँ साथ रहती हैं। तुम्हारे साथ रहकर मैं भी यही समझने लगी थी पर आज मेरा भ्रम टूटा है। आज मेरे हाथ में एक परछाई है...सिर्फ परछाई....पर ये है किसकी तुम्हारी या उस आदमी की जिसके नाम से मेरा नाम जुडकर ‘संज्ञा’ से ‘सर्वनाम’ बन गया....जो मेरे बच्चों का कानूनी बाप है। हां मैं ‘आशू’ की ही बात कर रही हूं। इस परछाईं का अस्तित्व सिद्ध करना मेरे लिये अब बहुत जरूरी हो गया है क्योंकि कोई भी बिना अस्तित्व की परछाई से लिपट कर मरना पसन्द नहीं करेगा, शायद मैं भी नहीं।
तुम हमेशा मुझे दो मंजिली औरत समझते रहे हो जिसकी एक मंजिल में मन होता है और दूसरी में सिर्फ तन। कभी तुम दोनो मंजिलों को साथ....एक मकान की तरह देख पाये.....कभी सोचा कि इन दोनो की साथ-साथ भी कोई सत्ता हो सकती है?
हर बार की तरह अब भी तुम्हारे पास मेरे सवालों के कोई जबाब नहीं होंगे। तुम सर झुकाये या तो नाखून चबाते रहोगे या मेज की गर्द पर उगलियों से लकीरे खींचते रहोगे फिर खाली-खाली आखों से गम्भीर से स्वर में कहोगे ‘जिन्दगी उतनी सीधी नहीं है जितनी तुम समझती हो....वक्त की गर्दिश...समय के पत्थर....रेत की नदी’ और न जाने क्या क्या....बेहद उबाऊ, उमस भरा, बारिश से पहले की हवा जैसा।
अकसर तुम एक बेहद उदास फिकरा मेरी तरफ उछालते रहे हो ‘जैसे तुम ‘मिसेज सिंह’ बन र्गइं थी वैसे ‘मिसेज संदीप’ नहीं बन सकती थी?’ सवाल के जबाब से मैं बचना नहीं चांहूगी.....हां मैं ये कर सकती थी.....कोई बाधा नहीं थी पर ऐसे रिश्तों के लिये एक शरीर चाहिये होता है। तुम्हारे पास एक दिमाग था एक भूख थी, एक जोडी हाथ थे जो किसी भी जिस्म पर रेंग सकते थे। इस सबके लिये मैं ही क्या कोई भी उपयुक्त हो सकता था। मेरे साथ मजबूरी थी मैं तुम्हारे पास तुम्हारी और अपनी साझी जरूरत बनकर आना चाहती थी, सिर्फ अपनी जरूरत बन कर नहीं। मुझे ‘कोई भी’ नही ‘कोई ही’ चाहिये था....एक पूरा पुरूष....जिसमें केवल भूख ही नहीं, हाथ ही नही एक मजबूत कंधा भी शामिल था। एक औरत चाहे कितनी भी ऊपर उठ जाये, अपनी दोनो टांगो पर कभी अपने आप को सभाल नहीं पाती....एक टांग हमेशा दूसरी से छोटी ही निकल जाती है....हमेशा एक सहारे पर टिकती है....एक मजबूत कंधे पर टिकती है। वह कंधा मै तुममें कहां से पाती। तुम तो सिर्फ ‘तुम’ बनकर जीना सीख पाये थे ‘तुम्हारा’ बन कर नहीं। इसीलिये आज मेरे पास तुम्हारे लिये सिर्फ नाम है......संबोधन नहीं।
बुरा मत मानना संदीप हर औरत अपनी अन्दरूनी वहों पर सिर्फ एक ‘कोख’ होती है.....शरीर सिर्फ माध्यम होता है....वह जिसे पाती है उसकी कोख पाती है.....जिसे देती है उसकी कोख देती है वह जिसे सम्पूर्णता से पाना चाहती है उसे अपनी कोख में पाती है.....जिसके सीने पर सर टिकाया होता है उसी के अंश के मुंह में छाती देकर पूर्ण हो जाती है।
मैने तुम्हें चाहा था संदीप....अपनी परिभाषाओं में तुम्हें पा भी लिया....पूरी पूर्णता के साथ...तुम्हारी सारी कोशिशों के बाद भी। मेरे बडे लड़के की शक्ल अपने से मिलाकर देखना...सब समझ जाओगे.....बडे चालाक बनते थे न अपने आपको।
आज डाक्टर आशु से काफी देर बतियाता रहा था। बाद मे आशु के व्यवहार से मैं यहीं अन्दाजा लगा पा रही हूँ कि मैं कुछ दिनों की ही मेहमान हूँ। अच्छा ही है मेरे लिये कोई काम भी बाकी नही रहा है यही आखिरी काम बाकी था तुम्हें ये आखिरी पत्र लिखना उसे भी निपटा दिया आज।
आखिरी वक्त तुम्हें अपने पास बुलाने की मेरी बिलकुल इच्छा नहीं है....सारी जिन्दगी एक ‘कार्बन पेपर’ बनी रही हूँ न। तुम्हारी और आशू दोनो की लिखावट को बिना फेर-बदल किये जिन्दगी के कागजों पर उतारती रही हॅं। आखिरी समय न जाने क्यों ‘ओरिजिनल’ बनने का मोह जागा है। तुमने एक शाल मुझे दी थी न मैने वह उतार कर रख दी है। सोचा जाते वक्त आशु का दिया कफन ही ओढ़ कर चली जांऊगी.....इसलिये नहीं कि ऊपर वाले को जवाब देना है.......जबाब तो सिर्फ तुम्हें देना था सो दे चुकी।
तुम्हारी
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पुनश्चः तुम जिंदगी को कभी-कभी एक ‘इकानॉमिक्स’ कहा करते थे न आज सारी पूंजी, लाभ-हानि मेरे हाथ में है, तुम्हारे लिये सिर्फ हिसाब छोडे जा रही हूँ लगाते रहना। तुम्हारा शाल भी पोस्ट कर दिया है शायद पत्र के साथ ही मिल जाये।