इसे कहानी माने या फिर किसी रचनाकार की अभिव्यक्ति। चाहे तो इसे आप हर आम औरत की जिन्दगी से जुड़ा किस्सा मान सकते हैं। भारतीय समाज में विवाह संस्था का जितना अधिक महत्व है उतनी ही ज्यादा इसके भीतर वो खामियां हैं जो इसका अटूट हिस्सा बन चुकी हैं। संयुक्त परिवारों से एकल और एकल से एकान्त तक का सफर इन कारणें का एक हिस्सा है फिलहाल अभी इतना ही, आगे सोचने विचारने के लिए पड़ी है कलम की बयानबाजी।
अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो
मां-बेटी का रिश्ता, मां-बेटे का रिश्ता। औरत होनेका मतलब है तमाम रिश्तों की सुगन्ध को एक साथ एक समय में जी जाना। बेटी होने पर रिश्तों की सम्पूर्णता का जो अहसास है, जो आत्मीयता है वो पुरूष होने पर नहीं मिल सकती। रिश्तों की महक को मैने जाना था अपने घर में जहां मैने जन्म लिया। मेरी दीदी, जो उस पीढ़ी और खानदान की पहली बेटी थीं।
उससे पहली की पीढ़ियों में बेटी थी ही नहीं। दीदी के जन्म के बाद परिवार में एक, दो, तीन नहीं तेरह लड़कियों ने जन्म लिया, लेकिन आज भी वह अहसास याद है कि जब मेरे चाचा के पांचवी बेटी हुयी तो उन्होंने कहा सबमें गोला दगे हैं अब छूटेगी बन्दूक की गोली। वह प्यार, वह दुलार जो चाचा, दादा मौसी, मामा से हमें मिला उसकी तुलना में भाइयों को कुछ भी नहीं मिला जो कि तेरह बेटियों के बाद जन्में थे।
उनके हिस्से में आया परिवार का अनुशासन। मुझे आज भी कई बरस बाद खुशी है क्योंकि मन पर न तो बचपन से बेटी होने का लादा गया बोझ है और न ही बेटी होने का अफसोस। अब तो बस प्रार्थना है ईश्वर से कि अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो। ताकि मां, बहन पत्नी, मौसी, बुआ और तमाम रिश्तों की महक से अपने जीवन को महका सकूं।
हमसफर का साथ और पराग की खुश्बू
लोगों का कहना सच ही है व्यक्तित्व किसी को जानने का सबसे अच्छा जरिया होता है। हो सकता है लोगों के मापने का तरीका रूप रंग भी हो। मैं तो अपने घर की साधारण रंग और सामान्य नाक-नक्श की लड़की थी। कहीं न कहीं एक हीन भावना थी। इसी हीन भावना ने मुझे महत्वाकांक्षी लड़की बनाया। अपने व्यक्तित्व का नया रूप, नया आकार देने में ऐसी जुटी कि पलटकर देखने का अवसर ही नहीं मिला।
मैंने भी रूप से ज्यादा सुन्दर व्यक्तित्व का हमराही चाहा था। ऐसा ही हमसफर मेरी जिन्दगी में आया। जो मैंने अपनी कहानी "आखिर कलाकार हूं मैं" में चाहा था। एक संवेदनशील समझदार हमसफर। जो मेरी धड़कनों को सुन कर उसे महसूस करता हो। जहां आर्थिक समीकरण के स्थान पर हो एक दूसरों को सम्मान करने की भावना। सच मैं खुशकिस्मत थी मेरा जीवनसाथी मेरे मानदण्ड में खरा उतरा। शादी के बाद पहली रात में हम दोनों के बीच कहीं देह नहीं थी। हम दोनों थे और एक दूसरे को समझने की कोशिश। हम एक दूसरे की आत्मा में उतरते गये और भीतर ही भीतर एक दूसरे को तलाशते रहे।
कैरियर को ले जीवन में बहुत संघर्ष झेला था मैंने। लगातार मिलती नाकामियों से मैं त्रस्त ओर हताश थी, मुझे लगा एक मजबूत हाथ मेरे साथ है। मेरे डगमगाते कदमों को सम्भालने वाला हरदम मेरे साथ है। मैं निश्चिन्त हो चुकी थी क्योंकि अब न तो मुझे अंधेरों से भय था ओर न ही सूरज छिपने का डर। जीवन के प्रत्येक प्रहर में हर पल रोशन करने वाला ऐसा दिया, जो हर पल अपनी चमक अपनी रोशनी से मेरे जीवन में उजाला बिखेर रहा था। और विवाह के बाद पहली बार जब मन्दिर गई तो अनायास मुंह निकल ही गया परमात्मा अगले जनम में मुझे इन्हीं की प्रियतमा बनाना और इतनी लम्बी उमर देना कि मैं इनकी गोद में मेरे प्राण निकले।
ससुराल उर्फ कैकेयी, मन्थरा और खलपुरूष
लोग राम और सीता के दुर्भाग्यपूर्ण जीवन के लिए दोष देते हैं रावण को। रावण बेचारा क्या करे उसने तो अपने पूरे परिवार को मोक्ष दिया था राम से। लेकिन अगर अयोध्या में कैकेयी और मन्थरा न होती ओर न होता धोबी, तो क्या मिलता सीता को फिर से वनवास। अरे भाई यह तो तय है कि घर-घर में होगी सास, ननद, देवरानी-जेठानी ओर देवर जैसे खलपुरूष। इधर बहू उतरी नहीं कि मन्त्रणा कक्ष में षडयन्त्र बनने और प्रसारित होने लगे। हर रोज होने लगी गवाही। रोज लगने लगी अदालतें। घर कभी दंगल का अखाड़ा तो कभी महाभारत में शकुनि की तरह फेंकी गई चालें लगता। कभी-कभी तो कंस के भेष बदले दूत वह काम कर जाते जिसे बेचारी बहूरानी ने सोचा न था।
मजेदार वाकया तब होता जब पति-पत्नी में वैमनस्य के लिए उचित अनुचित प्रयास किये जाते। पत्नी को यह बताने की कोशिश की जाती भारतीय नारी बनकर पति की सेवा करने की जरूरत नहीं हैं। अपने गढ़े किस्से सुनाये जाते ताकि पति-पत्नी के बीच खोपड़ी फुड़व्वल हो। आज भी यह सोच-सोच कर हंसी आती है कि अगर एक पक्ष कहीं कमजोर होता तो हमारा दाम्पत्य कब का बिखर चुका होता। सच तो यह तो राम की तरह हम आदर्श थे लेकिन प्रेम था कान्हा और राधा सा, कान्हा और मीरा का। कृष्ण मेरे प्रेम में पागल थे और मैं कान्हा की दिवानी हम दोनों ने बिना बोले ही घोशणा कर दी थी 'लरिकाई को प्रेम है अलि कैसे छूटै'। इन्द्रप्रस्थ को छीनने की कोशिश और लाक्षागृह में लगाई आग भी हम दोनों का कुछ न बिगाड़ सकी।
जनम-जनम का साथ है तुम्हारा...
कहते हैं विवाह सात जन्मों का साथ होता है और विवाह में होते हैं सात वचन और फेरे भी होते हैं और सात ओर इन सभी का तीन गुना बनाता हैं पहले से इक्कीस। यह हौसला, विश्वास, दृढ़ता सभी में इक्कीस गुना। एक दूसरे के साथ दु:ख सुख में साथ रहने के वायदे ने परिवार के लोगों की धोखेबाजी, प्रापर्टी पर कब्जा तमाम तकलीफें देने के बाद भी तोड़ नहीं पाया। नहीं डाल पायी दाम्पत्य में दरार। बल्कि सच कहूं, इन सभी की कोशिशों ने हमारे दाम्पत्य को “याम रंग में डिबो दिया। हनुमान की कद की तरह बढ़ता गया दोनों की बीच विश्वास। रावण की नगरी के राक्षस बौने तो हुए ही उनकी अभिमान की लंका जलकर राख हो गई। मिट गया राक्षसों और लंका का अस्तित्व।
हर स्तर से तनाव देकर जीवन अस्त-व्यस्त करने की कोशिश अन्तत: नाकाम रही। बड़ा कठिन दौर था। बाहरी लोगों के सामने अभिनय करना था। खुशहाल जीवन का मुखौटा पहनना था। ताकि "हंसि बतलै है लोग सब बांट न लेहैं कोय" की स्थिति भी ध्यान में थी। महाभारत का षडयन्त्र ओर युद्ध जारी था हमारा सत्य, हमारी ईश्वर के प्रति आस्था ठीक कृष्ण की तरह बल दे रही थी। इस युद्ध में मैं और मेरे पति बारी-बारी से लड़ रहे थे। आखिर हम जीत गये। खास बात यह थी कि इस युद्ध में कोई अपना मरा नहीं था। कृष्ण के विराट रूप के दर्शन में मै जान लिया था यह सगे सम्बंधी यह भाई-बहन मेरे नहीं हैं। वह पहले से ही मृत थे ओर जो पहले से ही मर चुका हो उस पर रोना कैसा?
फूले पलाश के फूल, महक उठे अमलताश और गुलमोहर
आज जब कई दशक पीछे याद करती हूं बीती बातों को, तो एक कसक ओर कड़वी याद की लहर निकल जाती है। अतीत वर्तमान और भविष्य इनसे नाता है हर व्यक्ति का। अतीत में दफन यादें न तो हमारे भविष्य को धुंधला सकी ओर न रंग में फीका कर सकीं। वर्तमान के विस्तृत फलक पर मेरी तीनों सन्तान पलाश, गुलमोहर और अमलताश की तरह महक रहे हैं और अपनी सुगन्ध से लोगों को मोह रहे हैं। अब दूर तक जाती निगाह में बस बिखरे हैं खुशियों के रंग। शैशव, बचपन, किशोरावस्था से अब तक किया गया समय आज दाम्पत्य की मजबूत नींव पर टिका है। तमाम संघर्षों के बाद मिली इन खुशियों में हमारे परिवार के प्रेम का दीप लगातार टिमटिमा रहा है यह क्या कम है। दिल की धड़कनों में गूंज रहा है बराबर वह संगीत "तुझ संग प्रीती लगाई सजना..।"