आज उस शहर की अन्तिम निशानी भी पानी में समा गई। ये उसके घंटाघर के ऊपर लगे तड़ित चालक की नोंक थी। वैसे तो ये अपने आप में कोई खास चीज नहीं थी पर परिस्थितियों के चलते ये उस मरते शहर की पहचान बन गई थी। हर रोज कुछ तमाशबीन उस डूबते हुये शहर को देखते जुड़ते, आपस में बातें करते, "अरे अभी तो उस घंटाघर का गुम्बद दिख रहा है.....लो आज उसका आखिरी कंगूरा भी डूबा...अब तो बस तड़ित चालक का सरिया ही बचा है....।"
बच्चों के लिये तो तड़ित चालक का वह सरिया, वह डूबते कंगूरे ही पूरा एक शहर था क्योंकि असली शहर तो उन्होंने कभी देखा ही नहीं था। किस्से कहानियों में उन्होंने सुना था कि एक जमाने में ये बेहद जिंदा शहर था। वह शहर बहुतों के लिये वैसा ही था जैसा कि अस्पताल के आपात चिकित्सा कक्ष में पड़ा कोई असाध्य रोगी होता है, जिसकी मौत तो निश्चित हो चुकी होती है पर उसकी चलती सांसें उसके होने का अहसास दिलाती रहतीं हैं। शहर के मरने का ये सिलसिला तो शुरू हुआ था एक शताब्दी पहले, तबसे धीरे-धीरे किश्तों में मर रहा था ये शहर। पहले तो सिर्फ लोग बातें करते थे, `यही हाल रहा.....समय रहते लोग न चेते तो एक दिन खत्म हो जायेगा ये शहर....एक याद बन कर रह जायेंगे इसके जैसे समुद्र के किनारे बसे बहुत सारे शहर..कई देश।'
विनायक भी आज गया था इस मरते शहर की आखिरी झलक देखने के लिये। वह वहां कुछ देख नहीं पाया,चारों ओर हरहराते समुद्री पानी के अलावा। लोगों ने एक ओर इशारा करके बताया कि पिछले महीने तक उस बिन्दु पर कुछ दिखाई दे रहा था। घर में घुसते ही विनायक दादू से टकरा गया। विनायक के दादू देश की एक वैज्ञानिक संस्था में वैज्ञानिक थे। रिटायरमेन्ट के बाद अब तो ज्यादातर घर पर ही रहते हैं, कोई किताब पढ़ते हुये या फिर विनायक से बतियाते हैं। विनायक को भी दादू का साथ बहुत भाता है।
"क्या तुम गये थे उस मरते हुये पुराने शहर को देखने, अभी भी कुछ दिखता है वहां?"
"कुछ भी तो नहीं सिवाय पानी के"
"तो इसका मतलब हमारा शहर भी अंतत: इंसान की करतूतों की भेंट चढ़ गया।"
"क्या मतलब दादू, इंसान की करतूतों के?"
"हां"
"इसमें भला इंसान की क्या करतूत? सब जानते हैं कि समुद्र का तल हर बरस बढ़ रहा है और शहर धीरे-धीरे डूब रहा है और फिर कोई सौ साल से चल रही है ये सब।"
"यही तो बात है, तुम ने कभी गौर से सोचा ही नहीं कि समुद्रों का स्तर बढ़ने कैसे लगा? आज जिस घटना को तुम इस 23वीं शताब्दी में देख रहे हो वह शुरू तो हो गई थी बीसवीं शताब्दी के खत्म होते ही। "
"क्या मतलब दादू?"
"तुम ग्रीन हाउस प्रभाव जानते हो विनायक?"
"थोड़ा-थोड़ा"
"थोड़ा-थोड़ा कितना?"
"वातावरण में कुछ गैसें होती हैं जिन्हें हम ग्रीन हाउस गैसें कहते हैं।"
"बिल्कुल सही, वातावरण में पायी जाने वाली कार्बन डाईआक्साइड, मीथेन, नाइट्रस आक्साइड, जल वाष्प, ओजोन और क्लोरोफ्लोरोकार्बन मुख्यत: ग्रीन हाउस प्रभाव पैदा करने वाली गेैसें हैं।"
"इन गैसों की परतों में से होकर सुदूर अंतरिक्ष के विकरण और ऊष्मा तो हम तक आ सकती है पर धरती पर से पैदा ऊष्मा इन गैसों को भेद कर सुदूर अंतरिक्ष में नहीं जा पाती है।"
"पर दादू इसे ग्रीन हाउस प्रभाव क्यों कहते हैं?"
"विनायक ठंडी, जगहों पर पौधे उगाने के लिये बडे बड़े ग्रीन हाउस बनाये जाते हैं। इन ग्रीन हाउस में पौधे कांच के या प्लास्टिक के बने शेड में रखे जाते हैं। ये कांच या प्लास्टिक बाहर की गर्मी और धूप अंदर तो आने देता है पर अंदर की गर्मी बाहर नहीं जाने देता है। यही काम पृथ्वी के वातावरण के लिये ये गैसें करतीं हैं। अत: इन गैसों के इस गर्मी बचाये रखने के प्रभाव को ग्रीन हाउस प्रभाव कहा जाने लगा।"
"ये तो और भी अच्छा है दादू। अगर धरती की सारी गर्मी जाकर सुदूर अंतरिक्ष में विलीन हो जाती उसे धरती पर रोकने वाली ये गैसें न होतीं तो धरती तो एक दम ठंडी हो जाती।"
"बिल्कुल सही विनायक, अगर ऐसा नहीं होता तो धरती इतनी ठंडी हो जाती कि उस पर जीवन पनप ही नहीं सकता था। इन्हीं गैसों की वजह से पृथ्वी का तापक्रम जीने लायक रहता है।"
"लो और अभी आप कह रहे थे कि ....."
"पूरी बात तो सुनो विनायक। ग्रीन हाउस गैसों का ये गुण, जिसने पृथ्वी को जीने लायक बनाया, वही इंसान की छेड़-छाड़ की वजह से पृथ्वी के लिये मुसीबत बन गया। इस ग्रीन हाउस गैसों में सबसे असरदार गैस है कार्बन डाइआक्साइड और इस कार्बन डाई आक्साइड का सबसे बड़ा हिस्सा आता है उस ईंधन से जो बीसवीं, इक्कीसवीं सदी में इंसान ने खूब इस्तेमाल किया।"
"मतलब कोयला, लकड़ी, पेट्रोल डीजल?"
"हां विनायक इंसान ने इन ईंधनों को तब इतना अधिक इस्तेमाल किया कि उसके पास न पेट्रोल बचा न कोयला न लकड़ी।"
"पर दादू हमारे पुराने शहर के डूबने का इससे क्या मतलब?"
"जैसे जैसे ये खनिज ईंधन जलते गये वातावरण में कार्बन डाईआक्साइड की मात्रा बढ़ती गयी। धरती के वायुमंडल में कार्बन डाइआक्साइड की परतें और घनी होने लगीं। अब धरती की गरमी पृथ्वी के वातावारण से बिल्कुल नहीं निकल पाती थी।"
"तब तो धरती और गरम होने लगी होगी दादू?"
"हां विनायक धरती का तापक्रम एक शताब्दी में चार डिग्री तक बढ़ा।"
"फिर दादू?"
"फिर क्या पृथ्वी के ध्रुवीय क्षेत्र जो हमेशा बर्फ से ढके रहते थे उनकी बर्फ पिघलने लगी। बर्फ के बडे़-बड़े ग्लेशियर पिघल गये और बहुत सारा पानी समुद्रों में बहकर आ मिला। जानते हो कितना?"
"कितना दादू?"
"इतना कि समुद्रों का जल स्तर तीन मीटर तक बढ़ गया।"
"ओह, और उसी में समा गये हमारे ये बहुत सारे शहर, क्यों दादू?"
"हां विनायक"
"इसका मतलब हमने ही डुबोया अपना शहर। पर आदमी करता क्या दादू? ईंधन का इस्तेमाल बंद कर देता क्या?"
"पर खनिज ईंधन का इतना इस्तेमाल जरूरी था ? आज हम नहीं काम चला रहे उन ईंधनों से जिन्हें वह इक्कीसवीं शताब्दी में गैर परम्परागत ऊर्जा स्रोत कहता था.....जिनका प्रयोग उसे झंझट लगता था?"
"दादू कब तक हम अपने डूबते शहर छोड़कर ऊंची पहांड़ियों पर भागते रहेंगे?"
"विनायक इतना सरल नहीं है ये कि एक डूबता शहर छोड़ा और ऊंची पहाड़ी पर कालोनी बना ली। एक वक्त आयेगा कि ध्रुवों पर की बर्फ ही खत्म हो जायेगी। हरे-भरे क्षेत्र रेगिस्तान में बदल जायेंगे। हो सकता है कि वह वक्त आये कि धरती से कुछ उगे ही नहीं, जहां हम रह रहे हैं धरती का वह हिस्सा रहने के काबिल ही न रहे", कहते हुये दादू कहीं दूर देख रहे थे मानो क्षितिज पार उन्हें आने वाली शतािब्दयां दिखाई दे रहीं हों।
विनायक ने धीरे से दादू का कंधा छुआ।
"दादू समझ गया हूंं मैं। कुदरत से छेड़-छाड़ अच्छी नहीं। ये आज मैं समझा हूं, कल सब समझेगें...उन्हें समझना ही होगा, अगर उन्हें बचाना है अपने आपको। आगे से कोई शहर नहीं मरेगा दादू हमारी पीढ़ी आपको ये वचन देती है।"
दादू ने अपने कंधे पर रखा विनायक का हाथ हौले से छुआ, उनकी आंखों में आंसू झिलमिलाने लगे थे।