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उंगलियाँ

इस जगह पर आने की कभी भी उसकी इच्छा नहीं थी पर क्या करे। कोई दूसरा विकल्प भी तो उसके पास नहीं था। उस पर बेहोशी के इंजेक्शन का प्रभाव क्रमशः उसी भाँति छाता जा रहा था जिस प्रकार वर्षा ऋतु में बादल धीरे-धीरे सूर्य को अच्छादित कर लेते हैं। उसका अचेतन मस्तिष्क कार्यरत था।

उससे मिलना मुझे अच्छा लगता था। क्लास के बाद कैन्टीन में हम दोनों उसी चिर परिचित टेबल के चारों ओर पड़ी कुर्सियों पर बैठ जाते जिस के ऊपर मतिमंद राजनीति की भाँति, जब यह विश्वविद्यालस बना था, उसी समय का पंखा अपनी धीमी गति से चलता रहता था।

हाँ वे कुर्सियों जो कभी रंगीन आबनूसी रही होंगी उनका रंग ही नहीं उड़ गया था वरन् उनमें लगी बेंत की बुनायी भी टूट गयी थी। उन पर हम संभल कर बैठने के अभ्यस्त हो गये थे। लेकिन इन कुर्सियों पर बैठने के बैलेसिंग एक्ट में कभी भी काफी का स्वाद खराब नहीं हुआ था। पता यह उसके साथ बैठकर काफी पीने के कारण से था अथवा वहाँ उस स्टूडेन्टस कैन्टीन में काफी बनती ही अच्छी थी।

एक बार काफी पीते हुये मथुर की दृष्टि उंगलियों से फिसलते हुए मेरे नाखूनों पर टिक गयी। वह काफी का सिप लेता जा रहा था और मौन था...पर उसकी निगाह मेरी उंगालियों के नाखूनों पर टिकी रही। हम दोनों काफी पीने के बाद टैगोर लाइब्रेरी के सामने निर्मित सुन्दर लम्बे टैंक जिसमें होली आने के पहले छात्रगण अपने मित्रों को इसी में फेंककर, होली का प्रारम्भ कर देते थे, टैंक में तैरती रंगीन मछलियों को निरखते बाटल-पाम के नीचे लगी बेंच पर बैठ गये।

"इन रंगीन मछलियों में किस रंग की मछली तुम्हें अच्छी लगती है?" बधुर का प्रश्न था।

"गोल्डफिश।"

"क्या तम्हें किसी सुर्ख लाल रंग की मछली का पता है?"

"यह तो तुम्हीं बताओ।"

मधुर मौन हो गया और ध्यान से छोटी ब्लैक मोली जो टैंक में तेजी से तैर रही थी, को देखने लगा। वह मुझे टीज करने के लिए यह हरकत कर रहा था; मैं जानती थी।

वह मेरी हल्की गुलाबी ड्रेस का व्यंग कर रहा था। उस दिन शाम को मैंने हजरतगंज जाकर जीवन में पहली बार सुर्खलाल रंग को नेल पालिश खरीदी थी। विज्ञान वर्ग की छात्रायें उस समय मे कम फैशन परस्त हुआ करती थीं। जिनके लिये तो, जैसा कि आल इंडिया मुशायरे में कभी सुना था "सादगी गहना है, इस सिन कि लिए" की बात अधिक खरी उतरती थी।

दो दिनों बाद हम काफी पीने फिर कैन्टीन पहुँच गये। आमने-सामने बैठ कर आने वाले छात्र-चुनाव की बाते कर रहे थे कि पिछली बार की तरह मधुर की निगाह मेरी उँगलियोंं पर जाकर टिक गयी ।

उसके होठों को बीच एक पतली मुस्कान की रेखा खिल गयी। वह इतनी क्षणिक भी कि कोई दूसरा शायद इस ओठों के कुतुहल को देख भी नहीं पाता। मैं-अंतरंगता के महत्व उसकी  मीठी अनुभूति से पूर्ण परिचित थी।

मधुर कुछ बोला नहीं। उसकी आँखों में नेत्रों में विचारों के, भावनाओं के बिम्ब झलक रहे थे। उसने भरपूर निगाहों से मुझे देखा और कहने लगा 'वोट किसको दोगी?"

"उसे नहीं, जिसको तुम वोट दोगे।" मेरा मुस्कान भरा उत्तर था।

"तुम तो मेरी हर बात पर प्रतिवाद करती हो?"

"और कर्तव्य?"

"तुम्हारे साथ काफी पीना।"

वह खुलकर हंसा था-उसके दाँत सफेद और सुन्दर थे। हंसने पर वह और सुदर्शन हो उठता था। मेरी सहेलियाँ कहती थीं कि तुम दोनों की मित्रता सुन्दर दाँतों के कारण है। हो सकता है उनकी बातें, उनका अनुमान सही हो।

शिक्षण-सत्र समाप्त हो रहा था, जिस दिन अन्तिम पीरियड था...मथुर के आग्रह पर मैंने उसके साथ क्वालिटी में चलकर काफी पीने के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया था उसने संकेतों से मुझे अपने बगल बैठने का इशारा कि था। पर मैं बैठी उसके सामने। मुझे उसको सामने से देखने मे और टीज करने में मजा आता था। काफी आयी। हम खामोशी से उसे सिप करते रहे। कोई खास बात हुयी ही नहीं। सिर्फ ‘क्वालिटी’ में दूसरों की आवाजों और चम्मचों की खड़खड़ाहट ही हम सुनते रहे। पेमन्ट कर मधुर उठा और एकाएक मेरे बालों पर, अपनी अपनी उंगलियां फिसलाता हुआ धीरे से फुसफुसाया "उमा तुम्हारे बाल मुझे बहुत सुन्दर लगते हैं।"

"इसलिये लेक्चर थियेटर में तुम मेरे पीछे बैठते हो।" अपनी आंखों में कृत्रिम रोष झलकाते हुये, मैंने उसकी आँखों में देखते हुये उत्तर था।

वास्तविकता के आंकलन हेतु उसने गहरायी से मेरी आंखों में झाँका था परन्तु वह बोला कुछ नहीं। वह मौन रहा। मैं उसके इस नो कमेन्ट की आदत से पूर्ण परिचित थी और यह मुझे पसन्द नहीं थी।

मधुर ने रिक्शें पर बैठने का आग्रह किया। न चाहते हुये भी मैं उसके आग्रह को अस्वीकार नहीं कर सकी। उसके साथ रिक्शे पर बैठना.....। मंकी ब्रिज पर गोमती की शीतल बयार ने मेरे शरीर में ऊष्मा का संचार कर दिया था। परन्तु मधुर निश्चेष्ठ बना रहा। शायद उसे मेरी कोई बात चुभ गयी थी या वह मुझे तटस्थ रहकर ‘टीज’ करना चाहता रहा हो।

मैंने शोध कार्य प्रारम्भ कर दिया और पता चला कि मधुर को किसी इन्टरनेशनल कम्पनी में अच्छा जॉब मिल गया। हम लोगो का संपर्क बर्थ डे ग्रीटिंग और न्यू इअर ग्रीटिंग द्वारा बना रहा। फोन करने से हम दोनों ने परहेज सा कर रखा था, शायद हम यथार्थ को स्वीकार करने में कतरा रहे थे।

विवाह मेरे लिये एक कटु अनुभव था। मैंने डाईर्वोस लेकर अपनी शक्ति को अपने शोध छात्र और छात्राओं के साथ जैव विज्ञान की समस्याओं के निराकरण करने में लगा दिया था। कभी-कभी शरीरिक जैव रसायन मेरे मानस को उद्वेलित कर देते थे। किसी की आवश्यकता तीव्रता से सताती थी, कष्ट देती थी, मेरे मन को, उन क्षणों में मुझे में मधुर...।

एक बार, हिम्मत करके मैंने मधुर को फोन किया। पहले तो वह मेरी आवाज को पहचान नहीं पाया है। पहचानता कैसे........दस साल एक लम्बा समय होता। इतने वर्षों में दुनिया बदल जाती है, लोग बदल जाते हैं।

मेरा नाम सुनकर उसने कहा था "उमा! अभी मैं मीटिंग में हूँ मैं आज ही तुम्हें कॉल करूँगा।"

और उसने रात्रि दस बजे मुझे कॉल किया। हमेशा की भाँति उसने मेरा नाम लिया और बात को प्रारम्भ करने की प्रतीक्षा करने लगा।

"अब तुम्हारे बच्चे तो बड़े हो गये होंगे?"

"नहीं।"

"क्या मतलब?"

"मेरे या इस तरह कहूँ कि हम निःसन्तान हैं।"

"क्यों?"

"मेरी पत्नी के यूटेरस को कैंसर ने ग्रसित कर दिया था। उसको निकालना पड़ गया।"

"ओह! बेरी सैड," कहते हुये उमा स्वर काँप उठा।

"और तुम्हारा परिवार कैसा है?" मधुर ने प्रश्न किया। "मैंने डाईवोस ले लिया था पिछले दस वर्षों से अकेली हूँ।" मैं ने उत्तर दिया।

"कठिन है तुम्हारा जीवन।"

"मैने अपने को शोध में डुबा दिया है, मधुर.....मेरे स्वर के दर्द को मधुर शब्दों के माध्यम से देख रहा था।

"फोन तो तुमने सकारण किया होगा?"

"हाँ मधुर! एकाकीपन कभी कभी त्रायद हो जाता है।

"तुम अभी चालिस की भी नहीं हो।"

"मैं तुम्हारे संकेत को समझ रही हूँ। पर वह मैं चाहती नहीं।"

उमा का स्वर मधुर को कहीं दूर से आता हुआ लगा। "फिर..." मधुर ने संशयात्मक स्वर में कहा।

"उस शहर में स्पर्म बैंक तो होंगे ही...यों कहना चाहिये?"

"कि दो स्पर्म बैंक है वहाँ," उमा ने बात पूरी नहीं की। "अच्छा फिर?" मधुर के स्वर में विस्मय का मिश्रण था।

फोन पर कुछ क्षणों का मौन रहा फिर उमा की आवाज आयी "मधुर! (यह नाम उमा ने दस वर्षों के बाद लिया था) क्या तुम अपना स्पर्म वहाँ  डोनेट कर सकते हो?"

"ओह! तुम्हारा तात्पर्य?" उधर से आश्चर्य भरी ध्वनि थी। "तुम्हें याद है क्वालिटी से तुम्हारे साथ रिक्शे पर वापस आते समय तुम्हारा पाषणवत बने रहना।"

"तो तुम्हें वह क्षण अब तक याद है?" अचरज भरा मथुर का स्वर उमा को प्रिय लगा।

"यदि तुम साहस किये होते, तो यह दस वर्षों की घटनायें घटित नहीं हुई होतीं।" उमा के स्वर में उलाहना की पीड़ा थी। "ओह!" एक गहरी सांस लेकर मधुर कुछ कहना चाहते हुये भी कह न सका।

"वह मेरी...." मधुर की बात अधूरी रही।

"तुम अब क्या चाहती हो"

"कर सको तो कहूँ।"

"हाँ कहो।"

"क्या तुम अपना स्पर्म-स्पर्म बैंक में डिपाजिट कर सकते हो।"

"तुम्हारा तात्पर्य है कि तुम उससे.....।"

"हाँ मधुर! तुम ठीक समझ रहे हो। में यही चाहती हूँ..." उमा के स्वर की व्यथा और अनुरोध को मधुर समझ गया था।

"मैं प्रिया से भी बातें कर लूँ-प्रिया मेरी पत्नी है उमा।" मधुर ने कहा।

"मैं प्रतीक्षा करूँगी।" कहते हुये उमा ने फोन रख दिया। बीते क्षण कितने मधुर होते हैं-वह सोच रही थी। मधुर का फोन आया तीन दिनों के बाद परन्तु यह तीन दिन उमा को बहुत ही लम्बे लगे। मधुर ने उमा को बताया कि उसकी पत्नी ने स्वीकृति दे दी है और वह इस संदर्भ में उससे बात करना चाहती है उमा ने धड़कते  दिल से मधुर की पत्नी से बात की। फोन के बाद वह प्रसन्न थी, उसका उद्वेलित मन  शान्त था।

इन "इन-वीट्रो-इम्प्लान्टेशन" सफल रहा था। उमा की डाक्टर ने समयानुसार चेकिंग के बाद उसे सूचित किया उमा इन समाचार से उत्साहित थी। मधुर को उसने एस.एम.एस. कर दिया था ।

उमा की डाक्टर ने अल्ट्रा साउन्ड की रिर्पोट देखी। वह विस्मित नेत्रों से प्लेट को देख रही थी।

"क्या बात है डाक्टर आप चकित दिख रही हैं?" उमा का प्रश्न सुनकर डाक्टर मौन रही।

"यह विचित्र केस है, ऐसा तो दो करोड़ केसों में मात्र एक बार देखा जाता है," कहती हुयी डाक्टर ने फिर रिर्पोट को और प्लेट को ध्यान से देखा।

"प्लीज मुझे भी बताइये," उमा के आग्रह पूर्ण स्वर में निहित वेदना की पीड़ा को डाक्टर अनदेखी न कर सकी।

"तुम्हारा डिम्बाणु पहले दो भागों में विभाजित हुआ और फिर एक भाग दो में पुनर्विभाजित हो गया। इस प्रकार तीन पुत्र तुम्हारे गर्भ में पल रहे हैं।" कहकर डाक्टर ने उमाको ध्यान से देखा। उमा का चेहरा रक्ताभ था और उसके होठों पर मंद मुस्कान थिरक रही थी। तीन समान गुण के बच्चे....आईडन्टिकल ट्रिपलेट, वह सोच रही थी।

मेरे लिए एक शिशु पर्याप्त है, शेष दो मैं......।

प्रकृति के संवेग को समझना कठिन है। उमा को पीड़ा की अनुभूति हुयी।

उमा कराह रही थी। पीड़ा ने उसकी बेहोशी जनित चेतना को जागृत कर दिया था। वह सिस्टर को देखकर धीरे से बोली "वे लोग अभी तक नहींं आये?"

दूसरे पल दरवाजे पर नॉक करने की आवाज आयी। सिस्टर ने दरवाजा खोला।

दरवाजे पर एक पुरुष और महिला प्रतीक्षारत थे।, "मैं मधुर हूँ, क्या मैं उमा से मिल सकता हूँ?"

"आइये," कहती हुयी सिस्टर हट गयी।

मधुर तो भीतर आ गया, पर उसकी पत्नी बाहर रुक गयी।

सिस्टर ने दरवाजा बन्द कर किया। धड़कते दिल से घबराया हुआ मधुर रूम में आ गया।

मधुर को देख उमा के चेहरे पर प्रसन्नता हिलोरें लेने लगी। मधुर ने उमा का हाथ पकड़ लिया......दूसरे क्षण मधुर का हाथ उमा के होठों पर था।

सिस्टर ने मधुर को बाहर जाने का संकेत कर आप्रेशन थियेटर की तरफ बेड़ को बढ़ा दिया। उमा के चेहरे पर चादर थी.....उसके दाहिने हाथ की उठी हुयी दो उँगालियों पर लगी नेल पॉलिश को मधुर ध्यान से देख रहा था।

 



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by Dr. Radut.