"तुमने राजा रवि वर्मा का नाम तो सुना होगा?"
"हाँ क्यों नहीं। वे तो आधुनिक भारतीय चित्रकला के प्रणेता थे" जार्ज पोलस का उत्तर था। कुछ पल बाद उसने मेरी ओर देखा और कुछ सोचकर कहने लगा- "तुम्हारी राजा रविवर्मा की पेन्टिग कुमुद सुन्दरी के विषय में क्या राय है?" मैनें उससे कहा कि "वह तो बिलकुल तुम्हारे बगल में बैठी, सुन्दरी मित्र फिलोमिना की तरह है।" मेरी बात सुनकर फिलोमिना जो अभी तक कॉफी के घूँट ले रही थी बरबस बोली "यह बात मात्र अंशतः सत्य है, मैं कुमुद सुन्दरी की भाँति पृथुल नहीं हूँ और न ही मैं बंगलौरी पद्द्ति पर साड़ी ही पहनती हूँ।"
"यह बात तो सही है फिलोमिना पर तम्हारी मुखाकृति और मृगों को लज्जित करती आँखो में और कुमुद सुन्दरी के नेत्रों की समानता को देखने के बाद कोई इस साम्यता के तथ्य को नकार नहीं सकता।" मैंने कहा- इस पर जार्ज पोलस की टिप्पणी थी "तुम मेरी मित्र को प्रभावित कर रही हो, पर यह मेरे लिए खतरनाक है।" इस बात पर फिलोमिना और मैं हँसे और कॉफी समाप्त कर उठ खड़े हुए। जार्ज पोलस ने फिलोमिना का हाथ पकड़ कर मुझसे शुभ-रात्रि कहकर विदा ली और मैं उन भी उन दोनों के अनुराग की अनुभूति की उष्मा से दूर हट, अपनी कार के शीतल पड़े ईंजन स्टार्ट कर गर्म करने लगा। बाहर रुई की तरह पड़ती बर्फ, एक अजीब मोहक सा वातावरण उत्पन्न कर रही थी।
डॉ. लुई पियरे की प्रयोगशाला पारकिंसन नामक रोग के निदान के लिए विख्यात थी।
इस रोग में प्रभावित व्यक्ति का शरीर काँपता रहता है और वह व्याधि एक विशेष जैव-रसायन जिसे यल-डोपार्मीन कहते हैं के शरीर में कम मात्रा में निर्मित होने के कारण होती है।
यह विशिष्ट जैव रसायन मानव मस्तिष्क के एक विशेष क्षेत्र जिसे ‘सब्सटेंशिया- निग्रा’ कहते हैं, की कोशिकाओं द्वारा सामान्य रूप से निर्मित होता है। परन्तु जब कुछ कारणों से यह कोशिकाएँ एल-डोपामीन बनाना बंद कर देती हैं तो मानव शरीर में पारकिंसन व्याधि का प्रारंभ हो जाता है।
डॉ. लुई पियरे के सहयोगियों ने यह शोध कर लिया था कि यदि मानव की एडरीनल ग्लैण्ड की कोशिकाओं को मस्तिष्क के सब्सटेन्शिया निग्रा क्षेत्र में प्रत्यारोपित कर दिया जाए तो इस व्याधि से पीड़ित व्यक्ति बहुत स्वल्प अवधि में सामान्य हो सकता है। समस्या थी एडरीनल ग्लैण्ड को प्राप्त करने की और थी किसी नवजात अथवा जन्म के कुछ घण्टों पहले के भ्रूण की।
वैसे तो पेरिस के समस्त राजपथ अतीव सुन्दर हैं पर वुलवार-डू-मोपरनास सबसे विलक्षण है। इस राजपथ और बर्लिन के राजपथ-उन्टर-डेम- लिन्डेन में मात्र अंतर है तो नीबू के वृक्षों का, जो उन्टर-डेम-लिन्डे को गर्मी की ऋतु में अपनी भीनी सुगन्धि से आप्लावित कर देते हैं और बुलवार-डू-मोपरनास सदैव ही, जगत् प्रसिद्ध् इत्रों में स्नान सा किए महिलाओं और पुरुषों के वस्त्रों से उड़ती हुई सुगंधि से महकता रहता है। वैसे इस राजपथ का प्रतिबिम्ब बर्लिन के राजपथ-उन्टर-डेम- लिन्डेन पर स्पष्ट दिखाई देता है।
मैट्रो स्टेशन वाँवाँ से लगा एक डोम नामक रेस्ट्रां है, जो फ्रांस के विख्यात लेखकों, विचारकों दार्शनिकों, चित्रकारों और मनीषियों द्वारा पिछली शताब्दी से ही पैर्टनाइज्ड किया जाता रहा है। इसमें बैठकर कॉफी पीने का अपना आनंद है। यह आनन्द सप्ताहाँतों में मैं उठाता रहता था।
गर्मी हल्की पड़नी प्रारम्भ हो गई थी। मैं एकाकी बैठा कॉफी पी रहा था, कि बगल के टेबिल पर बैठी दो स्त्रियां ने फ्रेंच में कहा "वह देखो भारतीय लड़की वह भी साड़ी में"। स्वाभाविक था कि मैं भी उधर देखने लगा। कुछ पलों बाद फिलोमिना, खड़ी थी डोम के मुख्य द्वार पर और मैं उसे देखकर हाथ हिलाकर बुलाने के लोभ का संवरण न कर सका। मैं उठ गया, मुस्कुराकर मैने फिलोमिना का स्वागत किया। उसके मेरे सामने की कुर्सी पर बैठते ही टेबिल पर परंपरागत फ्रेंच कॉफी लाकर रख दी। कुछ पलों तक मौन रही फिलोमिना ने जब सिर उठाया तो मैने उससे पूछ "कैसी हो- कुमुद सुन्दरी।" उत्तर में अपनी धवल दंत पंक्तियां चमकाकर उसने उत्तर दिया "ठीक हूँ और तुम्हारी तलाश में निकली थी। मैं जानती थी कि तुम सप्ताह के अंत में यहाँ कॉफी पीते हो-सोचा तुमसे भेंट नहीं हुई, चलूँ मिल लूँ।" मैनें उसके इस स्नेह प्रदर्शन हेतु धन्यवाद दिया और पूछा कि "आज उसका क्या प्रोग्राम है?"
फिलोमिना ने कहा, "कुछ खास नहीं, कॉफी पीने के बाद चाहो तो थोड़ा घूम आएँ।"
इसी बुलवार पर। मैनें स्वीकृति में सिर हिलाया, गारसों को बिल दिया कॉफी का, और बुलवार पर घूमने निकल पड़े।
जार्ज पोलस डॉ. लुई पियरे की प्रयोगशाला में तकनीकी सहायक था। वह फ्रेंच को मातृभाषा की भांति और अंग्रेजी थोड़ा रुक-रुक कर बोलता था परन्तु मलयालम बोलने में उसे थोड़ी परेशानी होती थी। दूसरे शब्दों में कहें तो उसे मलयालम बोलना पसन्द था ही नहीं। इसका कारण यह नहीं था कि उसे अपनी भाषा प्रिय नहीं थी। वास्तविकता तो यह थी कि उसका पिछले बीस वर्षो से फ्रांस में रहने के कारण, इस भाषा से संपर्क कट सा गया था- फिलोमिना के परिचय के बाद ही वह पुनः सप्रयास उससे मलयायम में वार्तालाप करता था।
जार्ज पोलस ने ही डॉ. लुई पियरे की प्रयोगशाला में पारकिंसन व्याधि पर हो रहे शोध की सूचना मुझे दी थी। एक जैव वैज्ञानिक होने के कारण, विषय में रुचि स्वाभाविक थी। जार्ज पोलस ने ही मुझे बताया कि कि फिलोमिना भाषा वैज्ञानिक है और पेरिस विश्वविद्यालय के भारतविद् प्रो. ऊरीसाँ के देखरेख में डाक्टेरेक्ट की उच्च उपाधि की प्राप्ति हेतु शोधरत हैं उसका शोध कार्य पूर्ण होने को है। मेरे साथ चलते -चलते पार्क के किनारे खाली बेंच को देखकर फिलोमिना इस पर बैठ गई। स्वाभाविक था कि मैं भी उसकी बगल में, उसी बेंच पर बैठ गया। कुछ पलों के मौन के बाद फिलोमिना ने कहा, "पता है तुम्हे कि मैं क्यों इस स्थल तक तुम्हें लाई हूँ?"
"यह तुम्हीं स्पष्ट करो तो अच्छा रहेगा, नहीं तो मैं गलत फहमी में ही पड़ा रहूंगा।"- मैनें किंचित कटाक्ष से कहा। फिर कुछ पल रुक कर मैंने कहा, "तुम्हारी जैसी सुन्दरी के साथ कोई मंत्र मुग्ध-सा चलता चला आए और उसके हृदय में बढ़ते रक्तचाप को यदि अनदेखा कर दिया जाय तो भ्रम का उत्पन्न होना अति स्वाभाविक है, कुमुद सुन्दरी।"
"ओह तो यह बात है" फिलोमिना किंचित सहास्य बोली। "एक बीमार और बढ़ा मेरा।" यह कहकर फिलोमिना ने मेरे हाथ को अपने सुकोमल हाथों में लेकर कहने लगीं। "आज मैं मानसिक रूप से स्वस्थ हूँ- कारण है मैं अपने ऊपर हुए जिन टैस्टों की प्रतीक्षा कर रही थी वह आज नहीं मिले। क्या परिणाम होगा उनका, पता नहीं? और फिर मैं कहूँ क्या समझ मे आ नहीं रहा है।"
मैनें उसके कंधे थपथपाये हुए कहा, "तथ्य क्या है मै नहीं जानता- पर धैर्य धारण करना इस प्रकार की परिस्थिति में, सर्वश्रेष्ठ औषधि है।"
"ठीक ही कहते हो," कहकर फिलोमिना उठी, और मैं तुमसे पुनः सम्पर्क करुँगी कह, पास के मेट्रो-स्टेशन पर आकर रुकी टेªन में बैठकर बोननुई (शुभ-रात्रि) कहकर ट्रेन के गति पकड़ने के साथ ही, दृष्टि से ओझल हो गई। फिलोमिना की समस्या क्या हो सकती है संबंधित विभिन्न पक्षों पर सोचता हुआ, मैं भी अपने एपार्टमेन्ट में आ गया। फिलोमिना से उस भेंट के करीब एक मास बाद फ्रांस के प्रसिद्ध् समाचार पत्र ‘लेमांद’ में छपे समाचार कि डॉ. लुई पियरे को चिकित्सा क्षेत्र का सर्वोच्च पुरस्कार फ्रांस के राष्ट्रपति प्रदान करेंगे, यह सम्मान उनको पारकिंसन व्याधि के पूर्ण निदान हेतु दिया जाएगा, ने मुझे चकित कर दिया। सोचा था इस्टीट्यूट पहुँच कर इस विषय पर और सूचनाएं मिलेगी, पर इसका मौका मिला ही नहीं।
इंस्टीटयूट पहुँचकर अपने प्रयोग कक्ष में बैठकर फोन करने जा रहा था कि धड़धड़ाती हुई बैलेरी आ खड़ी हुई और मुझे देखकर हँसकर शरारतपूर्ण ढ़ंग से बोली - "यह फिलोमिना नामक बुलबुल कौन है तुम्हारी?"
मेरा संक्षिप्त उत्तर था, "तुम्हारी ही तरह है- पर तुमसे अधिक सुन्दर।"
"अरे वाह! तुम मुझे ईष्यालु नहीं बना पाओगे- वह ग्रीक है क्या?"
"नहीं तो," मैंने मन्द मुस्कान के साथ उत्तर दिया।
"तो फिर यह है कौन? क्यों उसने अपना टेलीफोन नंबर तुम्हें देने के लिए नोट कराया है?" बेलैरी इतरा कर बोली।
"नंबर मुझे दे तो मैं बताता हँ।"’ मैने कहा।
बैलेरी ने फिलोमिना का टेलीफोन दिया और कहने लगी "अब तो बताओ"। मैनें उसकी क्षीण कटि पर हाथ रख पास खींचा और अगले शनिवार को बताऊँगा, 7 बजे शाम, तुम्हें कॉफी पिलाऊँगा और इण्डियन फूड भी खिलाऊँगा। बोलो तुम आओगी रेस्ताँ डोम में ‘श्योर' कहकर बेलैर विजयनी प्रतिद्वन्द्वनी की भाँति इठलाती हुई चल दी। मैंने तत्काल फिलोमिना को फोन किया। हॉस्पिटल कोशिन के रिसेप्शन से होल्ड करने का संकेत था- और कुछ ही पलों बाद फिलोमिना ने मुझे उससे उसी शाम मिलने का आग्रह किया। शाम चार बजे मैनें पहुँचने का आश्वासन और फोन रख दिया।
वर्ष की समाप्ति पर दिया जाने वाला प्रो. ऊरीसाँ का भोज सदैव उनकी विद्वतापूर्ण लघुवार्ता से प्रारम्भ होता था। इस बार भी उसी परम्परा का निर्वाह बहुत ही सुन्दर रूप से हुआ।
निमंत्रित अतिथिगण समय से आ गए थे। उनके ड्राईंइंग रूम में इस बार कम लोग थे। परन्तु उनमें से थे डॉ. लुई पियरे और उनकी श्रीमती जो श्रीमती ऊरीसाँ के बगल में बैठी थी। भारतीय संस्कृत के उद्भट विद्वान डॉ. रोरिकोविच और उनकी श्रीमती के बगल में बैठी फिलोमिना कांजीवरम् की साड़ी और वेणी में पुष्पमाला के कारण सबसे विशिष्ट दिख रही थी। उसके बगल की कुर्सी खाली भी उस पर मुझे बैठने के संकेत डॉ. ऊरीसाँ ने किया। जार्ज पोलस की अनुपस्थिति इस बार कुछ विचित्र लगी।
शैम्पेन डालने के बाद चियर्स का उद्द्योष हुआ। सभी ने परम्परानुसार एक घूँट शैम्पेन ली और फिर डॉ. ऊरीसाँ ने कहा कि आज मैं संस्कृत साहित्य के प्रकाण्ड विद्वान डॉ. रोरिकोविच से अनुरोध करुँगा कि वे इस भोज-वार्ता में अपने ज्ञान के कुछ अंशों का अमृत पान हम सबको करायें।
डॉ. रोरिकोवि ने अपने गंभीर वाणी में कहना शुरू किया- देवियो और मित्रों! मुझे आज एक ऐसी घटना का पता चला है जिसने दान करने में मेरी आस्था को सुदृढ़ कर दिया है। भारतीय वाङ्मय में एक कथा आती है कि सृष्टि के उपरान्त आदि देव-ब्रह्मा ने अपने पुत्रों- असुरों, सुरों और मानवों को, उनके कार्यकलापों के विषय में, जानने हेतु अपने स्थान पर निमंत्रित किया। सर्वप्रथम असुरों के कार्यों को सुनने के बाद ब्रह्म ने उनके प्रतिनिधि की ओर दृष्टिपात कर आर्शीवाद में मात्र एक शब्द कहा वह था ‘द’। यही शब्द उन्होनें देवताओं और मानवों के कार्यकलापों को सुनकर कहा। ब्रह्म मौन हो गए और उनके पुत्र प्रतिनिधि चकित भाव से बैठे रहे। कुछ कालोपरान्त असुरों के प्रतिनिधि ने साहस जुटाकर पूछा, ‘पितामह हम लोगों के संदर्भ में ‘द’ क्या ताप्यर्य है?’ पितामह ब्रह्मा ने कहा- ‘तुम लोग क्रूर कर्मा हो, इस कारण जीवों पर दया करना सीखो’। देवताओं के प्रतिनिधि के प्रश्न करने पर पितामह ने कहा ‘तुम लोग भोग विलास में लिप्त रहते हो- इस कारण अपनी वासनाओं का दमन करो’ और मानव प्रतिनिधि की ओर दृष्टिपातोपरान्त पितामह बोले ‘तुम लोग परमलोभी हो, जीवन में उच्चादर्शों की स्थापना हेतु तुम्हें दान करना अतीव आवश्यक है।’ पितामह को उनकी आज्ञा पालन करने का आश्वासन दे, सभी प्रणाम कर उठ खडे हुए।
इतना कहकर डॉ. रोरिकोविच ने शैम्पेन का एक घूँट पिया और वार्ता को आगे बढाते हुए कहने लगे "भारतीय संस्कृति साहित्य, महर्षि दधीच के अस्थिदान। महाराज शिवि का इन्द्ररूपी श्येन को मांस दान तथा क्षुधार्थ रन्तिदेव का अन्नदान, आदि दृष्टांतों से भरा पडा है। आज इसी दान की श्रृखंला में जुड़ गया है एक दान जो सभी प्रकार के दोनों से श्रेष्ठ है वह है भ्रूणदान। अब मै डॉ. लुई पियरे से अनुरोध करूँगा कि वे इस विषय पर दो शब्द कहें।" यह कहकर डॉ. रोरिकोविच अपनी कुर्सी पर बैठ गए।
टाई की स्थिति को ठीक करते हुए डॉ. लुई पियरे ने बताना शुरू किया,"मुझे पारकिंसन व्याधि के पूर्ण निदान के लिए एक व्यक्ति के मस्तिष्क में मानव भ्रूण के एडीरीनल ग्लैण्ड को प्रत्यारोपित करने की आवश्यकता थी। इस कार्य में मुझे प्रोफेसर ऊरीसाँ की शिष्या मैडेमोजिल (सुश्री) फिलोमिना ने अपने गर्भस्थ भ्रूण का दान का सहयोग दिया। मैं आपको यहाँ यह स्पष्ट कर देना चाहूँगा कि यह गर्भ सुश्री फिलोमिना के पूर्व मित्र जार्ज पोलिस द्वारा उन्हें शराब के नशे में करने के उपरांत इनके न चाहते हुए भी, फिलोमिना के शरीर में स्थापित किया गया। यह भ्रूण-शिशु मूढ़ था। दूसरे शब्दों में बौद्धिक स्तर पर रिटार्टेड होने के कारण भविष्य में अपनी माँ के लिए मात्र भार सिद्ध होता। इस तथ्य के अनेक क्लीनिकल प्रयोगों, विशेष प्रकार की जीनो के अध्ययन और शरीर के वृद्धि से संबंधित जैव रसायनों के अपेक्षित अनुपात में कमी के सत्यापित होने के उपरान्त प्रोफेसर ऊरीसाँ के प्रेरित करने पर सुश्री फिलोमिना ने इस मूढ़ गर्भस्थ भ्रूण को मुझे देने का निश्यय किया। इन्हे कोशीन चिकित्सालय में समय आने पर एडमिट किया गया और भ्रूण को सिजेरियन आपरेशन द्वारा निकालकर मुझे दे दिया गया। इसकी एड्रीनल ग्रंथि को विशेष तकनीक के द्वारा मैने पारिकिसन व्याधि से ग्रस्त रोगी के मस्तिष्क में जब प्रत्यारोपित कर दिया तो उसके एक सप्ताह बाद उस रोगी की स्थिति में सुधार प्रारम्भ हो गया। अब वह पूर्ण रूपेण स्वस्थ है और कल चिकित्सालय से अपने घर चला जाएगा। भविष्य में अब हम नवीन जैव प्रौद्योगिकी का संबल लेकर, प्रयोगशाला में ही क्लोंनिग पद्ध्ति द्वारा एडरीनल ग्लैण्ड का संवधर्न कर लेगें। अब मानव भ्रूण की आवश्यकता नहीं पडेगी। इस दिशा में प्रयोग प्रारंभ हो गए हैं। मैं अपनी इस सफलता एवं पुरस्कार का श्रेय सुश्री फिलोमिना को देता हूँ। इनके इस अवदान की चर्चा मैनें अपने शोध में भी कर दी है।"
इतना कहकर डॉ. पियरे बैठ गये। उनके बैठते ही प्रो. ऊरीसाँ उठे और उन्होनें कहा, "आज इस गोष्ठी में आप सबके सम्मुख मुझे यह कहते हुए प्रसन्नता हो रही है कि सुश्री फिलोमिना अब डॉ. फिलोमिना हो गई हैं। उनकी थीसिस स्वीकृत होकर अच्छे कमेन्ट के साथ आ गई है तथा इतना ही नहीं, डॉ. फिलोमिना को कनाडा के वैंकूवर विश्वविद्यालय में नियुक्ति भी मिल भी गई है ‘चियर्स फॉर हर सक्सेस इन फ्यूचर।" सबने समवेत स्वर में चियर्स कह अपने अपने शैम्पेन के ग्लासों को खाली कर दिया। इस प्रसत्रता भरे क्षणों में फिलोमिना के रक्ताभ आनन मेरे मानस में अंकित राजा रवि वर्मा की अमरकृति ‘कुमुद सुन्दरी’ को लज्जित-सा करते प्रतीत हो रहे थे।