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2021

वर्ष 2021, सूचना क्रांति के दौर की जो शुरुआत 20 वीं सदी के उत्तरार्ध में आरम्भ हुई थी, वह अब अपने चरम पर थी. सूचना के निर्बाध प्रवाह ने आम जीवन शैली को काफी सरल बना दिया था, वहीँ कई नई किस्म की समस्याएं भी खड़ी होने लगी थीं. पूरे विश्व में फैले विभिन्न आतंकी संगठन भी अब उच्च तकनीक से लैस हो चुके थे, और वैश्विक अस्थिरता कायम करने के लिए विभिन्न देशों के इन आतंकी गुटों का एक कम्युनिकेशन नेटवर्क ही स्थापित हो चुका था. इस चुनौती से निपटने के लिए अन्तराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न देशों की एकजुट पहल स्वाभाविक ही थी.

भारत में स्थित 'राष्ट्रीय सुरक्षा सूचना केंद्र' (NDEC) इसी दिशा में एक सार्थक प्रयास था.

एशियाई देशों के मध्य सूचना के समन्वय के लिए स्थापित इस केंद्र का उद्देश्य मुख्यतः इस क्षेत्र में कार्यरत आतंकी संगठनों की सूचनाओं के प्रसार का निरीक्षण करते हुए इनकी विध्वंसक कार्रवाइयों से संबंधित देशों के प्रतिरक्षा संस्थानों को अवगत कराना था. इस संबंध में आतंकी संगठनों द्वारा भेजे जा रहे मोबाइल या ई - मेल संदेशों को पकड़, उन्हें डिकोड करना भी शामिल था. इस संस्थान ने एशिया सहित विश्व को कई संभावित हमलों की पूर्वसूचना दे व्यापक विनाश की कई संभावनाओं को निर्मूल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

NDEC के वर्त्तमान निदेशक डॉ. उमाकांत शुक्ल पिछले कुछ दिनों से ऐसे ही एक प्रयास में काफी उलझे हुए थे. संस्थान के अधिकारीयों द्वारा एक पडोसी देश से भेजा गया ई-मेल प्राप्त किया गया था. ई-मेल क्या था - पहली नजर में एक गणितीय पहेली ही थी.

एक समकोण त्रिभुज के लम्ब (p)  42 आधार (b) (2√3)2 था जबकि कर्ण (h) पर x (21) लिखा हुआ था. त्रिभुज के तीनों कोनों पर क्रमशः A, J और T लिखे हुए थे.

विभिन्न भाषाओँ या संकेतों में पहले भी कई गोपनीय संकेतों को सफलतापूर्वक तोड़ लेने में सक्षम संस्थान के अधिकारी इस गणितीय पहेली में उलझ कर रह गए थे, और अब यह कोड सॉल्व होने के लिए डॉ. शुक्ल की मेज पर था.

पहेली को हल कर पाने में संस्थान के विश्लेषकों की असमर्थता को देखते हुए डॉ शुक्ल इसे हल करने के लिए किसी उपयुक्त चेहरे को याद करने की कोशिश कर रहे थे. मगर जब यादों पर उलझनें हावी होती हैं तो अक्सर यादों की दिशा भी भटक ही जाती है. वो अचानक ही उन यादों में खो गए जब इस संस्थान को उसकी सबसे बड़ी सफलता प्राप्त हुई थी - 'यूनिवर्सल यूजर पासवर्ड'(U2P). यह एक ऐसा सोफ्टवेयर था जिसे ई-मेल सेवा प्रदान करने वाली कंपनियों को अपने सिस्टम से जोड़ना था.  इन इन्टरनेट सेवाओं के उपभोक्ताओं को अपने 6 डिजिट्स  के पासवर्ड का पहला अक्षर  i से आरंभ करना पड़ता था. इसके बाद उनका पासवर्ड उनके परिचितों के लिए तो गुप्त रहता था, किन्तु NDEC के उच्च प्रौद्योगिकीयुक्त कंप्यूटर के लिए पासवर्ड का पहला अक्षर तथा उसकी शब्द संख्या पता होने के कारण 'Permutation-Combhination' सिद्धांत के आधार पर उपभोक्ता के मेल अकाउंट में झांकना सहज हो जाता था. वैश्विक सुरक्षा के लिए व्यक्तिगत आजादी में दखल को थोड़े प्रतिरोध के बाद अमूमन स्वीकार कर लिया गया था, अलबत्ता इसकी एवज में NDEC द्वारा हैकरों तथा आतंकी संगठनों द्वारा पासवर्ड चोरी या अवांक्षित इस्तेमाल से बचाव की गारंटी भी दी गई थी.

पासवर्ड का पहला अक्षर 'i' रखने के निर्णय की भी एक उल्लेखनीय वजह थी. दरअसल यह U2P भारत के ही अमेचर सोफ्टवेयर विशेषज्ञ ओम और सुरेश के ही प्रयासों का परिणाम थी; इसीलिए इंडिया के 'I' से ही पासवर्ड को आरंभ करने का निर्णय लिया गया था. अचानक डॉ शुक्ल को याद आया कि आज ओम एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में शिक्षण कार्य से जुड़ा हुआ है तो सुरेश एक वरिष्ठ प्रशासनिक  अधिकारी. इन यादों से गुजरते हुए ही डॉ. शुक्ल को पहेली के हल का रास्ता मिल गया था. उन्होंने तुरंत ही ओम और सुरेश को उन तक लाने की व्यवस्था करने के निर्देश दे दिए.

जिस समय दोनों को यह सूचना मिली वो दीवाली की छुट्टियों में कहीं बाहर जाने के अपने-अपने प्लान बना रहे थे. मगर डॉ. शुक्ल के सन्देश की गंभीरता को समझते हुए दोनों फ़ौरन ही उनसे मिलने  को रवाना हो गए.

NDEC में दोनों का मिलना उनके लिए किसी सुखद आश्चयर्य से कम नहीं था, क्योंकि उन्हें एक -दूसरे के भी आने की कोई सूचना नहीं थी. लगभग 10 वर्षों के बाद अचानक इस तरह एक - दूसरे  से मिलना उनके लिए कॉलेज के दिनों की कई यादों को बांटने का एक दुर्लभ अवसर बन गया. भूली सी कई यादों का अचानक सामने आ जाना उन्हें भावुकता के सागर में गहरे लेते जाने को काफी था कि तभी डॉ शुक्ल के आने की आहट ने उन्हें NDEC के इस विशेष कक्ष में वापस  ला खड़ा  किया.

डॉ. शुक्ल ने उन्हें बैठने का इशारा करते हुए कहना शुरू किया - "तुम दोनों के बनाये U2P software ने हमें कई आतंकी घटनाओं की समय पूर्व जानकारी प्राप्त करने ओर उनकी रोकथाम करने में काफी मदद की है. आज मैं जिस कोड की चर्चा तुमसे करने जा रहा हूँ, उसके बारे में इतना विश्वासपूर्वक कह सकता हूँ कि यह भी किसी संभावित आतंकी घटना से ही संबद्ध है.; किन्तु इसके दिन, स्थान आदि का हम आकलन नहीं कर पा रहे- ओर इसीलिए हमें तुमदोनों की मदद की जरुरत है. " यह कहते हुए डॉ शुक्ल के सामने लगे विशाल स्क्रीन पर उस कोड की आकृति उभर चुकी थी.

ओम ओर सुरेश गौर से उस त्रिभुज को देख रहे थे, मगर उस आकृति में एक सामान्य गणितीय प्रश्न के और कोई विशिष्टता उन्हें नजर नहीं आ रही थी.उन्होंने डॉ. शुक्ल सर पूछा - "हमें तो यह एक सामान्य पहेली ही नजर आ रही है, कहीं यह आप लोगों को उलझाने या भ्रमित करने का कोई प्रयास तो नहीं ! - "नहीं . स्पष्ट शब्दों में डॉ. शुक्ल ने जवाब दिया. - "क्योंकि यह मेल सीमा पार जिस क्षेत्र से भेजी गई है वह एक कट्टर ओर तकनिकी रूप से काफी समृद्ध गुट है, ओर वो उलझाने ओर भरमाने के बजाए सीधी कारर्वाई में ही विश्वास रखता है."

" क्या आप हमें इस गुट के बारे में कोई ओर जानकारी दे सकते हैं?"- सुरेश ने जानना चाहा.

"हाँ, यह गुट 1971 में पाकिस्तान की हार और बंगलादेश के उदय के बाद अस्तित्व में आया और तब से ही भारत को अस्थिर करने की लगभग हर कोशिश में इसकी सहभागिता पाई गई है. सीमावर्ती क्षेत्रों में अलगाववादी गतिविधियों को प्रोत्साहन देने में भी यह गुट संलिप्त रहा है."

ओम जो इन सारी बातों को सुनते हुए आकृति को गौर से देख रहा था, अचानक चौंक पड़ा - " सर, मुझे इस आकृति और इस संगठन के इतिहास में कुछ संबंध दिखाई दे रहे हैं."

"क्या ? कैसा संबंध !"- कहते हुए डॉ. शुक्ल और सुरेश दोनों ओम की ओर मुड़ गए.

" सर, यह एक समकोण त्रिभुज है, जिसका लंब (p) 42 आधार (b) (2√3) है समकोण त्रिभुज का कर्ण (h) ज्ञात करने के लिए - (p2 + b2) = h सूत्र को इस्तेमाल करने से 4 + (2√3) 2  = h 2  या 16 2  + 122  = h2 आ रहा है. यहाँ 16 /12 यानि 1971 के विजय दिवस की तिथि बन रही है.- सर, आकृति में कर्ण पर x(21) लिखा है अब x यानि h ज्ञात करें तो h2 =16 2  + 12 2  या h 2 = 256 + 144 = 400; या h= 20 = x; अतः x = 20."

"हम्म, मगर x (21 ) क्या? ...यानि की... क्या - 2021 ; या 16 /12 /2021 - क्या ?" तीनों एक साथ चौंक पड़े - यानि 16 /12 /2021 को ये फिर कोई बड़ी आतंकी कारर्वाई को अंजाम देने वाले हैं, लेकिन कहाँ ?"

सुरेश ने कहा - " मुझे लगता है कि त्रिभुज के परंपरागत A , B , C बिन्दुओं के बजाये A, J, T बिन्दुओं के इस्तेमाल में ही शायद कोई संकेत छुपा हो." - "हाँ, शायद तुम सही हो. तो फिर AJT से कौन से स्थान की और इशारा किया जा सकता है." डॉ. शुक्ल की इस शंका का उत्तर ओम और सुरेश की एक धीमी मगर सम्मिलित आवाज में उभरा - 'A J T ... T A J..." ताज".

कमरे में बिलकुल सन्नाटा सा छाया हुआ था. कोई किसी से न तो नजरें मिला रहा था, न कुछ बोल ही प़ा रहा था. आतंकवादियों के इस जघन्य और वीभत्स इरादे की कल्पना ने ही उन्हें झकझोर सा दिया था.

डॉ. शुक्ल समझ चुके थे की अब समय सिर्फ इन साजिशों के पर्दाफाश का ही नहीं बल्कि इनकी जड़ों पर अंतिम चोट करने का भी है. इस देश के 'ताज' की ओर तो कोई नजर भी नहीं उठा सकता मगर यह तय है कि पाप का घड़ा अब भर चूका है और सुदर्शन उठाने का वक्त आ चुका है.

डॉ. शुक्ल का इशारा पा कर ओम और सुरेश सुरक्षा एजेंसिओं को तैयारी का निर्देश देने के लिए उठ खड़े हुए. बाहर बढ़ते हुए उन्होंने एक बार पुनः डॉ. शुक्ल की ओर पलट कर देखा, जो रक्षा मंत्री से संपर्क कायम करने के प्रयास में लग गए थे.

(अभिषेक मिश्र)

रचनाकार: 


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by Dr. Radut.