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डाक्टर डी

"हुं तो आप डाक्टर डी के साथ काम करना चाहते हैं?" भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान के निदेशक ने मुझे सिर से पांव तक घूरा।

"जी मैं ही डाक्टर देवाशीष के साथ काम करने का इच्छुक हूँ।"

"देवाशीष? कौन देवाशीष ? अब कोई देवाशीष नही बचा है। वह खगोल भौतिकी का सितारा, पॉंच-पॉंच नोबेल पुरूस्कारों का विजेता तो कब का खत्म हो गया। अब तो एक सनकी बद-दिमाग घुन्ना डाक्टर डी बचा है। पता नही क्यों सरकार इसे अब तक रखे है इस संस्थान में?" निदेशक के स्वर में हाताशा भी थी, दुख भी और क्रोध भी।

"आप गलत सोचते हैं सर। उस असफल अंतरग्रहीय यात्रा की दुर्घटना के बाद भले ही प्रोफेसर बदल गये हों, उन्होने सारी दुनिया से अपने आप को काट कर आत्मकेन्द्रित कर लिया हो, भले ही अपना नाम खुद बदलकर देवाशीष से डाक्टर डी रख लिया हो पर देवाशीष मरा नहीं है सर। देखना एक दिन फिर ये बूढ़ा डाक्टर डी अपने किसी नये अविष्कार से सारी दुनिया पर छा जायेगा। हर महान वैज्ञानिक पहले दुनिया को पागल और सनकी नजर आता है। क्योंकि वह असंभव को संभव बनाने की बात करता है।"

"ओह, आप इतने बडे फैन होंगे डाक्टर डी के मुझे नहीं पता था।"

फैन, अरे मैं तो कहूंगा कि दुनिया भर के वैज्ञानिको को, सारी दुनिया को, कृतज्ञ होना चाहिये डाक्टर देवाशीष का।"

"देखो यंग मैन, प्रोफेसर देवाशीष के जीनियस का मैं भी कायल हूंं पर आज वह प्रोफेसर देवाशीष कहीं नहीं है। आज बचा है केवल एक सनकी पागल बद-दिमाग डाक्टर डी। मैने खगौल भौतिकी पर तुम्हारे शोध पत्र पढ़े है। तुम में अपार संभावनायें नजर आती हैं मुझे, तभी कह रहा हूं। तुम अपने कैलीवर को ऐसे बरबाद मत करों दिस इज माई फादरली एडवाइस।"

"बट सर...."

"ओके, ओके, नो डिसकशंस। इसके बाद भी अगर तुम डाक्टर डी के साथ काम करना चाहते हो, यू आर एलाउड।"

"थैंक्यू सर, थैंक्यू वेरी मच," और मैं बिना एक पल गंवाये निदेशक के कमरे से बाहर आ गया।

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डाक्टर डी यानि कि प्रोफेसर देवाशीष इकतालीसवीं शताब्दी का ही नही, अब तक का महानतम वैज्ञानिक। उनके दो आविष्कार बहुत मशहूर हुये, एक तो साइकोस्कोप। मस्तिष्कीय तंरगों के सूक्ष्म कम्प्यूटरीकृत विश्लेषण पर आधारित इस छोटे से यंत्र के द्वारा, सामने वाले व्यक्ति की सोच, मनोभावों और संवेदनाओं की विस्तृत जानकारी मिल जाती थी।

सामने वाला व्यक्ति क्या सोच रहा है, क्या करना चाहता है, इस यंत्र से जाना जा सकता था। डा. देवाशीष का दूसरा महान आविष्कार था "एल.टी.एस."यानि "लेंग्वेज ट्रान्सफंरमेशन सिस्टम"। इससे एक भाषा को आसानी से दूसरी भाषा में परिवर्तित किया जा सकता था। बोलने वाले की नितांत अपरिचित भाषा को अपनी रोजाना बोलचाल की भाषा में सुना जा सकता था। एल. टी. एस. व साइकोस्कोप के सम्मिलित प्रयोग ने बड़ी संभावनायें जगाईं थीं। लोगों का मानना था कि सुदूर ब्रहमाण्ड में अगर कभी कोई सभ्यता कहीं पाई गई तो उसकी भाषा को समझ पाना शायद इन्हीं एल. टी. एस. व साइकोस्कोप के सम्मिलित प्रयोग  से संभव हो पायेगा। प्रोफेसर देवाशीष की महानतम देन थी "सुपर कन्डेन्स्ड फ्यूल"।

पदार्थ के मूल-भत कणों, इलेक्ट्रान, प्रोटोन और न्यूट्रान के एन्टी कणों, यानि कि एन्टी - इलेक्ट्रान, एन्टी -प्रोटोन और एन्टी -न्यूट्रान से बने एन्टी-मैटर का प्रतिरूप था, ये इंधन। इसने ही एक आकाश-गंगा से दूसरी आकाश-गंगा में जा सकने वाले यानों की परिकल्पना को साकार किया था। इसके कारण ही ये यान प्रकाश की गति से कई गुना तेज चल सकते थे। इस पदार्थ की कुछ किलोग्राम मात्रा ही एक ऐसे यान को कई दशकों तक आवश्यक ऊर्जा दे सकती थी। ये प्रोफेसर देवाशीष ही थे जिनके कारण इस 41वीं शताब्दी में भारत के पास दर्जनों इस प्रकार के यान थे और उनके लिये सैकड़ों मीट्रिक टन सुपर कन्डेन्सर ईंधन।

आज इंटर-गैलेक्सयल यात्राओं के सैकड़ों मिशन भारत सफलता पूर्वक सम्पन्न कर चुका था। इस प्रकार की यात्राओं का मुख्य उदेदश्य होता था सुदूर ब्रहमाण्ड में पृथ्वी की तरह की अन्य सभ्यताओं की खोज। यही प्रोफेसर देवाशीष का प्रिय विषय था। वे इस प्रकार के कई परियोजनाओं पर सुदूर ब्रहमाण्ड की यात्रा कर चुके थे। उनकी ऐसी आखिरी यात्रा में उनका यान दुर्घटना ग्रस्त हो गया था। इस यात्रा में उनकी मौत हो गई थी, ऐसा मान लिया गया था पर एक दशक बाद अचानक वे एक अंतरिक्ष में एक कैप्सूल नुमा यान से स्ट्रेस-सिग्नल्स भेजते मिले जिन्हें संयोग से अंतरग्रहीय यात्रा पर जा रहे एक यान  ने इन्टरसेप्ट किया तो पता चला कि प्रोफेसर देवाशीष जीवित हैं। यान का कमांडर ने अपने मिशन को बीच में ही रोक कर उन्हें सुरक्षित घरती पर ले आया। पर इस दुर्घटना के बाद वे एकदम बदल गये थे। उन्होने किसी को कुछ भी बताने से इन्कार कर दिया। वे मीडिया से चिढ़ने लगे थे। वे किसी के किसी प्रश्न का उत्तर नहीं देते थे, बस हमेशा अपनी प्रयोगशाला मे बंद रहते, प्रयोगों में व्यस्त। पहले लोगों को उनकी बड़ी फिक्र हुई, फिर बाद में लोग धीरे-धीरे उनके प्रति उदासीन हो चले और बाद में वे उनका मजाक उड़ाने लगे, उन्हें पागल और सनकी कहने लगे।

पर मुझे अब भी न जाने क्यों लगता है कि कहीं कुछ खास बात जरूर है उस बुढ़ढे में। देवाशीष का जीनियस अभी जिंदा है बस लोगों ने उसे समझ नहीं पा रहे हैं और प्रोफेसर को इसकी फिक्र भी नहीं है। अजीब फक्कड़पन नजर आता था मुझे उनके स्वभाव में। जितना मैं उनके बारे मे सोचता, मेरी उनके साथ काम करने की इच्छा उतनी ही प्रबल होती जाती और आज मुझे ये मौका मिल ही गया।

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आज डाक्टर डी के साथ काम करते मुझे पूरा एक वर्ष हो गया है। इस अवधि में हमारे बीच एक वाक्य भर का भी संवाद नहीं हुआ है। मैंने डाक्टर डी को कभी ढ़ंग से खाते, सोते या नहाते-धोते नहीं देखा। सोने के नाम पर अपनी मेज पर सिर टिका कर एक झपकी ले लेना, खाने के नाम पर जल्दी में खुद बनाये गये सेन्डविच, बस। मैने कभी उन्हें प्रयोगशाला से बाहर निकलते नहीं देखा। कभी-कभी मुझे बड़ी चिढ़ होती है। कैसा है ये आदमी, एक दम जंगली। मैं इसके साथ एक वर्ष से  हूंं (ही हैज नॉट ईवन टेकन नोटिस आफ इट)। शायद इसी लिये कोई इनके साथ काम नहीं करता। और काम भी क्या सिर्फ एक काम करते हैं ये। सुदूर ब्रहमांण्ड से आने वाले सिग्नलों को पकड़ कर उसका विश्लेषण करते रहते हैं, एक सा ऊबाऊ काम। आखिर क्यों करते रहते हैं देवाशीड्ढ ये सब? आखिर क्या खो गया है इसका जिसको ढूंढ़ता रहता है ये बूढ़ा। पर क्या, क्या करना चाहता है ये ? कुछ भी हो जाये, ये गुत्थी मैं सुलझा कर रहूंगा।

आज सवेरे जब मैं प्रयोगशाला में घुसा तो हमेशा की तरह वे वीडियो मॉनीटर पर बैठे थे, सामने सोलर-मैप की एक पुरानी कॉपी फैलाये। मैने सेन्ट्रल सप्लाई टैप से एक कप काफी खुद के लिये निकाली और एक कप निकाल कर उनके सामने रखी।

"थैंक्यू", मेरी ओर बिना देखे ही उन्होने कहा।

मैं काफी देर उनके सामने के वीडियो स्क्रीन को देखता रहा मै फिर घीरे से बोला "सर"।

"हुं," पर उन्होने वीडियो स्क्रीन से दृष्टि नहीं हटाई।

"आप जिस लेविल से सिग्नल सेलेक्ट कर रहे हैं सर, उस लेविल पर तो बहुत सारे प्रकाश वर्षों की दूरी तक कोई गेलेक्सी नहीं है," मैने सकुचाते हुये उन्हें याद दिलाया।

"जानता हूं।"

"तब उसी ओर से सिगनल रिसीव करना..."

डाकटर डी पलटे "तो क्या औरो की तरह तुम भी पागल और सनकी समझते हो मुझे?"

"ज...ज...जी...नहीं तो", मै हकलाने लगा था। इस अप्रत्याशित प्रश्न के लिये मैं तैयार नहीं था।

"मैं गलत दिशा के संकेतो पर ध्यान केन्द्रित क्यों करता हूंं, यही जानना चाहते हो तुम ? तुम्हारी तरह और बहुत सारे लोग है जो मेरे बारे मे बहुत कुछ जानना चाहते हैंं। पर मैने किसी को कुछ नहीं बताया। तुम पिछले एक वर्ष से मेरे साथ हो, बिना कोई शिकायत किये। कभी डिस्टर्ब नहीं किया तुमने मुझे, क्यों? इसलिये कि तुम समझते हो मुझे, तुम्हें भरोसा है मुझ पर। औरों की तरह पागल और सनकी नहीं मानते हो तुम मुझे। आज बताऊंगा मैं तुम्हें सब कुछ क्योंकि मैं अब बहुत थक गया हूंं,मेरी सारी उम्मीदें खत्म हो चुकीं हैं"उनकी आंखों में आंसू झलक आये और उन्होने वीडियो स्क्रीन आफ कर दी।

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ये बात है सन 4.54 की। आपरेशन "एलियन सिवलाइजेशन" के तहत एक अंतग्रहीय यात्रा पर निकलना था हमें। लक्ष्य था सुदूर अंतरिक्ष में किसी और सभ्यता की खोज। मैं नेता था उस मिशन का। हमें जाना था 14.. प्रकाश वर्ष दूर की एक आकाशगंगा की यात्रा पर। इस तरह की ये मेरी  तेरहवीं यात्रा थी। डाक्टर डी बोलते जा रहे थे पर उनकी दृष्टि सुदूर अंतरिक्ष में कहीं स्थिर हो गयी थी।

यात्रा के पहले कुछ महीनों तक सब ठीक चल रहा था। हम कई सौ प्रकाश वर्षों की यात्रा कर चुके थे। हम एक आकाश-गंगा को खंगालते, उसके ग्रहों की गुरूत्वाकर्षण की हद से ऊपर रह कर उसका अघ्ययन करते। हालांंकि किसी भी ग्रह के गुरूत्वाकर्षण क्षेत्र में जाकर वापस आने की क्षमता हमारे यान में थी पर इस प्रक्रिया मे इंघन काफी खर्च हो जाता था और हम अपने ईधन को जहां तक संभव हो कम से कम खर्च करना चाहते थे।

अब तक हमें अंतरिक्ष में किसी जीवित प्राणी का कोई निशान नहीं मिला था। पर अगले कुछ ही घंटों बाद हमारे इलेक्ट्रोमैग्नेटिक राडार ने अजीब किस्म के संकेत प्राप्त करने शुरू किये। निश्चय ही ये संकेत प्रथ्वी से नहीं थे। संकेतो का जब हमारे स्कैनर ने विश्लेषण किया तो पता लगा कि इनमें तो जीवन के संकेत हैं। मतलब कहीं आस-पास ही थी जीवन की संभावना। हमने अपने यान पर लगे एन्टीना इन संकेतो की तरफ घुमाये। अब संकेत बहुत साफ मिल रहे थे। ये हमसे मात्र एक प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित एक छोटे से ग्रह से आ रहे थे ये संकेत। हमें लगा हमारी खोज पूरी हुई। हमने इस ग्रह के गुरूत्वाकर्षण क्षेत्र में प्रवेश करने का निर्णय ले लिया।

उस ग्रह के गुरूत्वाकर्षण क्षेत्र में प्रवेश करते ही हमें लगा कि हम भारी भूल कर गये हैंं। इस ग्रह का गुरूत्वाकर्षण बल इतना प्रबल था कि सारी कोशिशों के बावजूद हम पर कटे पक्षी की तरह गिरते चले जा रहे थे। मुझे शक हुआ कि कहीं हम किसी ब्लेक होल में तो नहीं फंस गये। हमने यान की कम्प्यूटर मेमोरी की मदद ली। ये कोई ब्लेक होल नहीं था। ब्लेक होल होता तो इस तरह के ये संकेत कहां से मिलते। ये जो भी था, शायद हमारा अंत था। अगर हम इसी तरह इस गुरूत्वाकर्षण बल से खिचते रहते तो अगले  कुछ मिनटों में हम उस ग्रह के धरातल से टकरा कर नष्ट होने वाले थे। मैने यान के कैप्टन को आदेश दिया कि चाहे जो हो, यान को इस ग्रह के गुरूत्वाकर्षण से बाहर निकाला जाये। कैप्टन ने पूरी कोशिश की, यहां तक कि यान का 9. प्रतिशत इंधन इस प्रकिया मे फूंक डाला पर हम उस ग्रह के गुरूत्वाकर्षण की जकड़ से निकल नहीं पाये। तब मेरी समझ में आया कि हम लोग उस ग्रह वासियों के हमले का शिकार हुये हैं और ये प्रबल ग्ररूत्वाकर्षण उन्होने अपने हाथियारों से उत्पन्न किया था।

मैने साइकोस्कोप और एल.टी.एस. जो मेरे स्पेस सूट में लगा था, उसका प्रयोग करना चाहा पर वह हमसे काफी दूर थे कई हजार मील दूर। हमारे पास कोई चारा नही था सिवाय इसके कि हम इजेक्ट कर जायें और अपने आप को उन अनजान निवासियों के रहम पर छोड़ दें। मैने अपना स्पेस कैप्सूल पहना। इस स्पेस कैप्सूल पर ग्रह के वातावरण की रगड़ से उत्पन्न ऊर्जा का कोई असर नहीं होता था और व्यक्ति सुरक्षित रह सकता था। यान के सारे सिस्टम्स ने काम करना बन्द कर दिया था। मैने यान का दरवाजा खोला और बाहर कूद गया। तभी एक भयानक आवाज हुई। मेरे पीछे मेरा अंतरिक्ष यान धूं-धूं करके जल रहा था। मैं अकल्पनीय गति से उस ग्रह के घरातल की तरफ जा रहा था। अब मुझे उस ग्रह के निवासियों की हिलती-डुलती आकृतियां नजर आने लगीं थी। किसी भी क्षण मैं ग्रह के धरातल से टकराने ही  वाला था। मौत सामने थी। मैने भय से ऑंखे बन्द कर लीं।  अगले क्षण मुझे एक झटका लगा। मैने समझा कि मैं ग्रह के धरातल से टकरा गया हूं। मैने आंखें खोल दीं। पर यह क्या, मैं तो ग्रह के धरातल से कुछ मीटर के फासले पर था, बीच में लटका। मैं और मेरा कैप्सूल दोनों सही सलामत थे। अब मैं उन्हें साफ-साफ देख सकता था। वे संख्या में बहुत सारे थे। देखने में वे हमारे जैसे नहीं थे। कद में हम लोगो से काफी छोटे थे पर सिर उनका अपेक्षाकृत काफी बड़ा था। वे कौतूहल से मेरे स्पेस-कैप्सूल को देख रहे थे। उन्होने आहिस्ते से मेरे स्पेस- कैप्सूल को ग्रह के धरातल पर उतारा। उनमें से एक आगे बढ़ा, उसके हाथ में एक राड जैसी कोई चीज थी। उसने उसे मेरे कैप्सूल की तरफ घुमाया अगले क्षण मेरा वह कैप्सूल, जिसे मैं अभेद्य समझता था, टुकड़े-टुकड़े हो कर बिखर गया। मैं आजाद था। अपने कैप्सूल से आजाद मगर उनका बंदी।

वे तरह-तरह की आवाजें कर रहे थे। मैने साइकोस्कोप व एल.टी.एस. का प्रयोग करके जानने की कोशिश की तो मैं दंग रह गया। उनमें मेरे प्रति कौतूहल के साथ क्रोध था, डर भी था। उनकी भाड्ढा में वाक्य नहीं थे। वे शब्द नहीं बोलते थे, सिर्फ आवाज करते थे। इस तरह से उनका तथाकथित  शब्द सिर्फ एक अक्षर का होता था। मेरा एल.टी.एस. ऐसी किसी भाड्ढा के लिये प्रोग्राम नहीं किया गया था। ऐसी किसी भाषा की तो मैने कल्पना तक नहीं की थी। अत: उनसे सीधे-सीधे संवाद की अब कोई गुंजायश नहीं थी।

वैसे तो उन्होने मुझे कहीं बंद नहीं किया था पर वे लोग मेरे बहुत नजदीक नहीं आते थे। तब मैने जाना कि उन्होने मुझे एक छोटे पिजड़े के आकार के एक विद्युत चुम्बकीय घेरे में बंद कर रखा है जो मुझे दिखाई नहीं देता था पर मैं उसमे से निकल नहीं सकता था। मैने कई बार उससे निकलने की कोशिश की पर हर बार मुझे एक तेज झटका लगता। अपनी उस विद्युत चुम्बकीय जेल में रहते हुये मैने कई बातें नोट कीं। एक तो उस ग्रह पर वहां के इन निवासियों के अतिरिक्त कोई और जीवित प्राणी नहीं था। या तो वहां ये प्राणी थे या फिर स्वचालित रोबोट। वैसे तो वे बहुत कुछ हम लोगों की तरह थे। उनसे पुरूड्ढ भी थे, स्त्रियां भी थीं, पर देखने में वे सारे के सारे एक जैसे लगते थे मानो आर्डर देकर एक ही कारीगर से  बनवाये गये हों।

मैं उनके लिये प्रयोगशाला जीवधारी की तरह था। वे तरह-तरह से मुझे निहारते, तरह-तरह के प्रयोग करते। कुछ में मुझे तकलीफ भी होती। उन्होने मेरे रख-रखाव के लिये जिसे रखा था वह एक महिला थी। ये महिला मेरे विद्युत चुम्बकीय कक्ष मे प्रवेश कर सकती थी। वह मुझे खाने के लिये गोलियों जैसा कुछ देती थी, जिसके कारण न मैं भूख महसूस करता था न प्यास।

मुझे लगने लगा था कि अगर मुझे जिंदा रहना है तो मुझे इस महिला को समझना होगा। मैं प्राण-प्रण से इसमें जुट गया। अथक प्रयास के बाद मैं इस योग्य हो गया कि मैं उस महिला से संवाद कर सकता था, उसकी बात समझ सकता था, उसे अपनी बात समझा सकता था। उसने उस ग्रह के बारे में जो जानकारियां दीं, वे मेरे लिये चौका देने वालीं सूचनायें थीं।

उस ग्रह पर सब कुछ, यहां तक कि ग्रह का वातावरण, वहां के निवासियों की संवेदनायें, भूख-प्यास, हवा पानी और तो और प्रजनन तक, वहां के निवासियों द्वारा नियंत्रित था। वहां प्राणियों के बीच कोई रिश्ते नहीं होते थे। उनमे कोई भावनायें नहीं होती थीं। उन के नाम नहीं, वर्ग और संख्या होती थी। केवल एक प्राणी पूरे ग्रह को नियंत्रित करता था जिसे वहां "जीरो" कहा जाता था।

उसके अतिरिक्त सारे प्राणी "ए", "बी", "सी", और "डी" श्रेणियों में बंटे होते थे। "ए"सर्वश्रेष्ठ प्राणी होते थे। वे वहां नीति निर्धारण और प्रशासन देखते थे। "बी-ग्रेड"के प्राणी व्हाइट कालर्ड किस्म के काम करते थे जैसे कि हमारे यहां डाक्टर इंजीनियर्स, वैज्ञानिक आदि करते हैं। "सी"श्रेणी के लोग व्यापार और अन्य औसत कामों के लिये होते थे जबकि "डी"वर्ग के लोग नौकर, चपरासी और श्रमिक जैसे कार्यों में लगे होते थे।

सामान्य प्रजनन का वहां रिवाज नहीं था। वहां अंडों व शुक्राणुओं के बैंक होते थे। जितनी आवश्यकता होती उतने अंडे लेकर, उन्हे निषेचित करके, प्रजनन केन्द्रों को सौंप दिया जाता था। ये प्रजनन केन्द्र भी हर वर्ग के प्राणियों के लिये अलग-अलग होते थे। एक कन्वेयर वेल्ट जैसे सिस्टम पर ये भ्रूण रखे जाते थे और बीच-बीच में जीवित गर्भाशय जैसी नियंत्रित परिस्थितियों में समय-समय पर इनमें आवश्यक हारमोन और रसायन पहुंंचाये जाते थे। इस तरह एक निश्चित अवधि तक कनवेयर-बेल्ट जैसे सिस्टम पर रखे ये भ्रूण, तरह-तरह के हारमोन्स और एन्जाइम्स से गुजरते रहते थे। यात्रा की ये अवधि पूरी होने पर ये भ्रूण, पहले से प्रोग्राम किये गये जीन्स वाले मन चाहे शिशुओं में बदल जाते थे।

इसके बाद उनको पालन केन्द्रों को सौंप दिया जाता था फिर  शिक्षण केन्द्रों को। ये पहले से निर्धारित होता था कि किस भ्रूण से क्या बनना है। उसको उसी प्रकार के हारमोन, रसायन, पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा दी जाती थी। पूरी तरह से तैयार होने के बाद ये प्राणी अपने-अपने वर्ग के निवासों और कार्यस्थलों पर चले जाते थे। एक निश्चित आयु पूरी करने के बाद या बीच में कोई विशेष खराबी आने पर इन्हे "डिसइन्टीग्रेशन सेन्टर"भेज दिया जाता था जहां "सर्वशक्तिमान जीरो" के नाम पर उनका जीवन वापस ले लिया जाता था। शरीर को अलग नष्ट करके अलग-अलग तत्वों को पुन: एकत्रित कर लिया जाता था। हालांकि ये पृक्रिया पूरी तरह कष्ट रहित थी पर इस व्यवस्था में किसी का भी अपने जीवन और मौत पर भी कोई अधिकार नहीं था। सब कुछ "सर्वशक्तिमान जीरो"के आधीन था जिसे किसी ने कभी देखा नहीं था, सिर्फ उसके आदेश सुने थे।

किसी भी अपराध या आदेश न मानने की वहां एक ही सजा थी, "डिसइन्टीग्रेशन चैम्बर"। चूंकि वहां के निवासियों में संवेदनायें नहीं होतीं थीं इसलिये वहां कोई विद्रोह नहीं होता था। वे सारे के सारे प्राणी पहले से प्रोग्राम्ड थे इसलिये ऐसी घटनायें भी वहां प्रोग्रामिंग में किसी गलती की वजह से ही होती थीं। जाहिर था इस व्यवस्था मे स्त्री और पुरूष के बीच कभी कोई सम्बन्ध नहीं होता था। उसकी आवश्यकता भी नही थी। शारीरिक सुख के लिये वहां "प्लैजर-सेन्टर्स" थे। अवकाश के समय वहां जाकर कोई स्त्री या पुरूष अपने शरीर में इलेक्ट्रोड लगा कर किसी भी तीव्रता का यौन सुख महसूस कर सकता था।

पर ये स्त्री जो मेरी देख-रेख के लिये नियुक्त थी, औरों से भिन्न थी। इसमें संवेदनायें भी थी। वैसे तो ये "ए"वर्ग की थी पर इसके निर्माण मे कोई गड़बड़ हो जाने से ये औरों से अलग कर दी गयी थी। जब तक इसे "डिसइन्टीग्रेशन चैम्बर" नहीं भेजा जा रहा था तब तक ये मेरी देख-भाल करने वाली थी। चूंकि इस स्त्री में संवेदनायें रह गयीं थीं इसलिये उन्होंने इसे मेरे साथ किये जाने वाले प्रयोगों के लिये बचा कर रखा था। इन प्रयोगों के बाद ही वे उसे नष्ट कर देने वाले थे। ये सारी बातें वह मुझे इतनी सरलता से बताती थी मानो ये सब उसके साथ नहीं किसी और के साथ घटित होने वाला हो।

उसी के लिये मैने अपना नया नाम रखा था "डी", उसके नाम "री" की तर्ज पर। उसमें प्रोग्रामिंग की गलती से संवेदनायें रह जाने के कारण हम संवेदनाओ के स्तर पर एक दूसरे से संवाद स्थापित करते गये और नजदीक आते गये। इतना नजदीक जितने आप अपनी पत्नी के नजदीक होते हैं। और री उस सभ्यता के इतिहास की पहली औरत बनी थी जिसने शारिरिक सुख प्लेजर हाउस के साथ-साथ  हम मानवों की तरह मेरे साथ प्राक्रतिक प्रक्रिया में महसूस किया था। समय गुजरते-गुजरते मुझे लगने लगा था कि ये अजीबो-गरीब ग्रह ही मेरी जिंदगी का अखिरी मंजिल होगा।

एक दिन री मेरे पास आई तो बहुत घबराई हुई थी। आते ही बोली "तुम्हें निकलना होगा यहां से अभी।"

"पर क्यों"?

"आज वे योजना बना रहें हैं कि अन्तिम आपरेशन कर वे तुम्हारा मस्तिष्क निकालेंगे, तुम्हारी आंतरिक संरचना का अघ्ययन करेंगें और फिर डिसइन्टीग्रेशन सेंटर।"

मैं डर गया। मेरा अंत इन्हीं लोगों के हाथों यहीं होगा, ये तो मुझे लगने लगा था पर इस तरह, ये मेरी कल्पना से बाहर था। चूंकि यहां किसी प्राणी के किसी शारीरिक रिपेयर का कोई प्रावधान है ही नहीं, इसलिये यहां एनेस्थीसिया जैसी कोई चीज होती होगी क्या? तो क्या मेरा तथाकथित आपरेशन बिना बेहोशी के ही होगा, मै सचमुच कांप रहा था।

"जल्दी करो," उसने मुझे फिर चेताया।

"पर हम भागेंगे कैसे और जायेंगे कहां ?

"हम नहीं सिर्फ तुम भाग रहे हो तुम। मैने सारी तैयारी कर दी है।"

"और तुम ?"

"डिसइन्टीग्रेशन चैम्बर"

"तब नहीं, तब नहीं जाऊंगा मैं।"

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उसने मेरे भागने की सारी तैयारी कर ली थी। वह सिर्फ मुझे भेजना चाहती थी पर मेरी जिद पर वह भी साथ आने को राजी हो गई। हम उसी समय एक विशिष्ट अंतरिक्ष यान से भाग निकले। जब तक उन्हे इसकी भनक लगती हम उनकी आकाश गंंगा छोड़ चुके थे।

उनका ये यान एक पूरा इकोसिस्टम था, एक आटोमेटिड दुनियां थी अपने आप में पूर्ण समर्थ, उस ग्रह के निवासियों की अभूतपूर्व करीगरी का नमूना। उस यान में मै था, री थी और हमारा प्यार। उसी यान में री ने अपनी सभ्यता का नया इतिहास लिखा। वह अपनी सभ्यता की पहली औरत बनी जिसने बच्चे को जन्म दिया था। प्रसव के बाद मैने शिशु को दुलराते मैने उसकी आंखो में ममता देखी थी जो उसकी सभ्यता के लिये एकदम नई बात थी। अपने नाम के "डी"और उसके "री"को मिलाकर हमने बच्चे का नाम रखा "डीयर"।

पृथ्वी की गणना के हिसाब से डीयर दो वर्ष का हो गया था। हम अभी तक ब्रहमाण्ड में भटक रहे थे। हमारा भविष्य क्या होगा ये हमें पता नही था। हम कहां थे ये भी हमें ठीक-ठीक मालूम नहीं था। हम चाहते थे कि कहीं, किसी दिन किसी एक जीवत प्राणी से संवाद स्थापित कर सकें, पर उसका कोई जरिया नहीं था। कोई उम्मीद हमें दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही थी। क्या होगा हम सब का भविष्य कुछ पता नहीं था। ऐसे में हम अपने बच्चे के भविष्य के लिये कल्पनायें करते। हमारे बाद हमारे डियर का क्या होगा। कौन उसे हमारी सभ्यताओं से परिचित करायेगा। केवल जीते जाना, खाते-पीते जाना ही तो सब कुछ नहीं होता क्योंकि उसकी तो इस "आटोमेटिड यान" में कभी कमी होने वाली नहीं थी।

इसके लिये हमने एक तरकीब निकाली। हम अपने कम्पयूटर के मेमोरी डेटा बैंक में अपनी सभ्यताओं, अपने रीति रिवाजों से सम्बधित से जानकारियां फीड़ करने लगे। हमने उसके लिये मानव शरीर की संरचना से संबधित जानकारियां चित्रों और ग्राफिक्स की सहायता से डेटा बैंक में डालीं। री को उस यान की बेहतरीन जानकारी थी। वह हमेशा यान की बनावट, मेन्टीनेन्स, इमरजेन्सी रिपेयर, इमरजेन्सी इजेक्शन आदि से सम्बन्धित जानकारियां डियर के भविष्य के लिये डेटा बैंक में रिकार्ड करती रहती थीं। हमने अबतक की अपनी जिंदगी का पूरा विवरण उसमें रिकार्ड किया हुआ था। हम उसमें अपने अनुभव रिकार्ड करते थे। वह सब रिकार्ड करते थे, जो आने वाले जीवन में हमारे न रहने पर भी हमारे डियर को जीवन यापन मे सहायता दे।

हमारे यान से जुडा था एक सकेन्डरी यान। मुसीबत में इसके जरिये हम "इमरजेन्सी इजेक्शन" कर सकते थे। री मुझे भी उस यान की बारीकियां समझाती रहती थी ताकि आपातकाल में अकेले ही यान का संचालन कर सकूं। उसे विश्वास था कि एक न एक दिन उसके ग्रहवासी हम सबको ढ़ूंढ़ निकालेंगे और उसी दिन हम सब खत्म हो जायेंगे। वह ऐसी परिस्थिति से निपटने के लिये बराबर तेयारी में जुटी रहती, बिना अपने आराम और नींद की परवाह किये। डियर अब बोलने लगा था। वह बोलता था हमारी मिली-जुली भाषा। एक अभूतपूर्व अनुभव था यह, किसी भी कल्पना से परे। हम एक नई सभ्यता को विकसित होते हुये देख रहे थे, बिलकुल शुरुआत से। पर प्रकृति को  हमारा ये जीवन भी रास नही आया। री के ग्रह के निवासी भी बीच-बीच में अन्तर-आकाशगंगीय यात्राओं पर जाया करते थे। वे इन्हें "हंटिग मिशन्स" कहते थे। इनमें वे दूसरी सभ्यताओं से प्राणी, वनस्पतियां, खनिज, मिट्टी आदि उठा कर लाते थे और उस पर प्रयोग करते थे। वे शायद ऐसे किसी "हंटिग मिशन" से लौट रहे थे, तभी उनका यान हमारे यान के पास से गुजरा। हालांकि सुरक्षा की दृष्टि से री ने हमारे यान को "सिग्नल जैकिट" से कवर कर रखा था, पर उनका यान हमारे इतने पास से गुजरा था कि उन्हें हमारी भनक मिल ही गई।

उन्होने हमारे यान पर आक्रमण कर दिया । री को एकदम खतरे की जानकारी हो गई। इससे पहले कि मैं कुछ सोच पाता री ने अपना फैसला सुनाया, "इस सहायक यान में तुम डीयर को लेकर उसमे बैठ कर भागो। मैं इन्हे रोकती हूंं।"

मैं इसके लिये राजी नही था क्योंकि मैं जानता था कि वह उन्हें नहीं रोक पायेगी। वह उनकी "ए" ग्रेड जरुर थी मगर "डिफेक्टिव ए" थी वह। वह या तो मारी जायेगी या कैद कर ली जायेगी। दोनों बातों का मतलब एक ही था, उसकी मौत और मेरा मन उसको यूं अकेले मरने के लिये छोड़ देने के लिये राजी नहीं था। मैने अकेले जाने से साफ मना कर दिया।

"देखो पागल मत बनो, ऐसे हम सब खत्म हो जायेंगे। हमें अपने डियर के लिये ये सब करना होगा।"

"तो तुम जाओ डीयर को लेकर मै देखूंगा इन्हें।"

"तुम? तुम रोकोगे ? कैसे ? तुम तो कुछ भी नहीं जानते हमारे बारे में तुमसे कुछ नहीं होगा। जाओ, जल्दी करो। अलविदा डी, अलविदा डीयर," हमें सहायक यान में जबरदस्ती धकेल री ने हाथ हिलाया और हमारे मुख्य यान के यंत्रों के साथ व्यस्त हो गई।

डीयर को साथ लिए जब मैं उस सहायक यान में बैठ कर मुख्य यान से डिटैच हो रहा था तो मैने देखा हमारा मुख्य यान धुं-धूं करके जल रहा था। री ने शायद खुद अपने आप को डिसइन्टीग्रेट करके यान को ब्लास्ट कर दिया था। ताकि वे उसे यातनायें देकर उससे हमारे बारे में कोई जानकारी न ले पायें। हम धरती वासियों की भाषा में री मेरी और डियर की जान बचाने के लिये कुर्बान हो गयी थी।

मुझे इस नये यान की कार्य प्रणाली की बहुत जानकारी नहीं थी। जितना मुझे मालूम भी था वह मैं घबराहट में भूल गया था। मैं बेतरतीबी से यान के बटनों को दबा रहा था कि एक लीवर मेंं पता नहीं क्या हुआ कि यंत्रों ने मुझे अपने केप्सूल समेत शून्य आकाश में उछाल दिया। उछलते ही मेरे स्पेस कैप्सूल से अपने आप "स्ट्रैस सिगनल्स" निकलने लगे।  शायद वह इसी के लिए प्रोग्राम्ड था। मेरे सामने ही तीव्रगति से मेरा यान सुदूर अंतरिक्ष में विलीन हो रहा था। यान के साथ ही मेरा प्यारा डियर भी उस शून्य में में खोता जा रहा था। मेरी नजरों के सामने ही थोडे से समय में ही मेरी दुनियां लुट गई और मैं, तुम्हारे हिसाब से इस इकतालीसवीं शताब्दी का महान वैज्ञानिक, ये डाक्टर देवाशीड्ढ कछ भी नहीं कर सका।

उसके बाद की कहानी तो तुम सबको पता ही है । संयोग से किसी और मिशन पर गये यान को जब मेरे ये "स्ट्रैस सिगनल्स"मिले तो उन्होने इन्हें पहचान कर मुझे बचा लिया।

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डाक्टर डी ने गहरी सांस ली "इस तरह एक ही समय में मैं री से बिछड़ा और डीयर से भी बिछुड़ गया।  आज भी न जाने क्यों मुझे लगता हे कि मेरा डीयर कहीं न कहीं जरूर जिंदा होगा और सुरक्षित भी, या तो उस यान में या सुदूर अंतरिक्ष में किसी सभ्यता के बीच। अगर वह जिंदा हुआ तो जिस दिन वह अपने मेमोरी बैक को डिकोड करेगा तो जरूर जानेगा कि उसका पिता कौन था, कहॉं का था। मैने सब सूचना भर दी थी उस यान के मैमोरी बैंक में। और ऐसा हुआ तो एक दिन वह मुझे सिगनल जरूर भेजेगा। आजतक मैं उसके उन्हीं सिगनल्स की तलाश में अंतरिक्ष से आने वाले  इन सिगनल्स को एनालाइज करता हूं, इस उम्मीद में कि एक दिन मुझे उसका सिगनल जरूर मिलेगा। क्या मुझे ऐसा नहीं करना चाहिये? एम आई रोंग? कुछ भी कहें लोग अब तो यही पागलपन मेरी जिंदगी का मिशन है। आफटर आल ही इज माई सन।"



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by Dr. Radut.