"थर्टी डिग्री साउथ, फाइव एण्ड वन थाउजेन्ड मीटर टू गो..डाउन...हार्ड आइस-आइडियल फार गुड लैण्डिंग...गुड लक। मंगल के बेस सालमा को इस संदेश के उपरान्त कक्ष में शान्ति छा गयी। कमान्डर रिमेक ने अपने यान के गाइरोस्कोप और स्टीयरिंग को प्रेरित करना प्रारम्भ कर, नीचे के लैण्डिग स्थल की बर्फ कठोरता का अनुमान लगाने वाले यंत्रों को आनकर दिया। बात कुछ ही सेकेण्डों की थी, "बर्फ की सतह दो हजार मीटर मोटी जमी हुयी है," की सूचना ने कमाण्डर रिमेक को लैण्डिंग हेतु अश्वस्त कर दिया और इन्टरकाम के द्वारा उन्होंने यह सूचना तीनों तीनों सहयोगियों को दे दी।
विशालकाय बृहस्पति अपने उपग्रहों के लिए विख्यात् है और उसी का उपग्रह 'यूरोपा' भी मंगल के वैज्ञानिकों को प्रारम्भ से ही आकर्षित करता रहा है। कारण इसका स्पष्ट है...‘यूरोपा' ही बृहस्पति का वह उपग्रह है, जो अपने विकास की प्रारम्भिक अवस्था में तुषार से, हिम से सदैव मंडित, अच्छाछित ढका नहीं था। वह बहुत कुछ था इस ब्रह्माण्ड के एक अन्य ग्रह "पृथ्वी" की भांति ही। उसकी परिस्थितियों के परिवर्तन के कारण, प्राकृतिक परिवेष में हुए, या कहा जाए, उत्पन्न हुए, असंतुलन के फल स्वरूप, आज वह, हिम की मरुभूमि बन गया है।
मरुभूमि शब्द पर आप चकित न हों- उसकी यूरोपा की सतह पर जमी वर्फ भी विविध स्वरूपों वाली है, तुषार मंडित यह उपग्रह कभी अपनी झुरझुरी बुर्फ के कारण, तेज हवा के साथ विलक्षण स्वरूप-ग्रहण कर लेता है,। वायु इस जमी झुरझुरी बर्फ को दशों दिशाओं में फैलाकर चमत्कृत करने के पयार्य श्वेत अंधकार से, उस यूरोपा को छा देती है, उस अवस्था में कोई भी प्राणी कुछ देख नहीं सकता। वैसे उसकी भीषण, शातिजन्य परिस्थिति का, जहाँ तापमान शून्य से दो सौ डिग्री सिलेसियस-नीचे घटता जाता हो, कोई सामान्य रूप से सहन भी नहीं कर सकता तभी तो आज यूरोपा निर्जन है। समस्त जीव-जन्तुओं वनस्पतियोंसे, पादपों से, कवकों से फर्नो से पूर्णरूपेण विहीन है। जीवन विहीन मरुभूमि...बर्फ की मरुभूमि है, यह उपग्रह वृहस्पति का।
वह सर्वत्र समतल नहीं है। उसकी धरा, पर कहीं-कहीं गहरी वर्फीली गुफाएं हैं कंदरायें हैं, खाड़ियाँ है जो मीलों चौड़ी और गहरी हैं तो कहीं, विशकष कर उत्तरी ध्रुव क्षेत्र में उसके शीतल हो चुके चौबीस हजार मीटर ऊँचे ज्वालामुखी पर्वतों की श्रृंखलाएँ हैं। इनका विस्तार बीस हजार किलोमीटर से भी अधिक है, अन्तरिक्ष से देखने पर, सूर्य के प्रकाश में, यह श्रृंखलाएँ मनमोहक, नैनाभिराम सौंदर्य युक्त लगती हैं। परन्तु इनका सौंदर्य शीतल है दारुण है, ऊष्मा विहीन घातक है।
इस उपग्रह के वातावरण में उतरना कितनी समस्यायें उत्पन्न कर सकता है, यही प्रश्न प्रत्येक यूरोपा अन्वेषकों के मानस को आक्रान्त किए हुए था।
उनके यान के, उसकी गति को मंद करने के हेतु पम्प चल रहे थे और धीरे धीरे वह, जिस प्रकार एक तितली मडंराती हुयी पुष्प की पंखुड़ी पर बैठ जाती है, ठीक उसी भाँति वह यान, उस कठोर बर्फ की शिला समान क्षेत्र पर, सावधानी से लैण्ड कर गया। सभी यान के यात्री कुछ निमेशों तक शान्त बैठे रहे। कमान्डर रिमेक ने रोबो विशेषज्ञ इँजीनियर फरकाश से अपनी सीट में लगे बटन को पुशकर-जिससे इन्टर कम्यूनिकेशन आन हो गया था, पूछा "क्या रोबो बाहर आने को तैयार हैं?"
इँजीनियर फरकाश का उत्तर था, "हम उसे एक्टीवेट कर रहे हैं, उसको करीब दस मिनट बाद हम ‘गो अहेड' का संकेत देंगें।"
"फाइन और गुडलक,'' कहकर कमान्डर रिमैक ने यूरोपा के ऊपर घुमते सैटेलाइट को ‘आबजेक्ट लोकेट' करने का संदेश दिया।
कम्यूनिकेशन विंशेषज्ञ फाम-तुआन, चैतन्य हो गए। कक्ष की स्क्रीन आन हो गयी। यूरोपा के ऊपर पाँच हजार मीटर की ऊँचाई पर घुमते ‘यूरोपा एक्सप्लोर' नामक सैटेलाइट से संदेश आने लगे। "तुम्हारे दाहिनी तरफ, दो सौ मीटर पूर्व में छः सौ पैंतीस मीटर नीचे दो आवजेक्टस हैं, उनकी रिफाइन मेंट... इमेज रिफाइनमेंट कर दिया है।" यूरोपा एक्सप्लोर के इमेंजिगँ इँजीनियर मैनफ्रड का उत्तर था।
जो बिम्ब उन "आबजेक्टों'' के दिखे, वे चौकाने वाले थे, किसी को भी चकित कर देने हेतु पर्याप्त थे। मंगल के बेस-सालमा की भूगर्भ स्थित अनुसंघानशाला के विशेष प्रयोजनों हेतु निर्मित छोटे सभा कक्ष में कम्पयूटर विशेषज्ञा ईवानोवा, अन्तरिक्ष भाषा विशेषज्ञ चतुरानन, रोबोटिक्स एवं कम्प्यूटर माडेल विशेषज्ञ इंजीनियर फरकाश तथा यूरोपा अभियान कमान्डर रिमेक उत्सुकता पूर्वक किसी सूचना की प्रतीक्षा कर रहे थे।
विलम्ब असाहय हो उठा और उसे भंग करते हुए कम्प्यूटर विशेषज्ञ इवानोवा ने कमाँडर रिमेक से पूछा "यूरोपा-एक्सप्लोरर तो पूरे यूरोपा का स्कैन करता रहा है, आश्चर्य है कि उसे इस ग्रह की विशाल हिम मरुभूमि में मात्र दो आब्जेक्टों का विवरण प्राप्त हुआ, कुछ और नहीं।"
"आपके इस प्रश्न का उत्तर यूरोपा-एक्सप्लोरर के बिम्ब विशेषज्ञ -- इमेजिंग-विशेषज्ञ इँजीनियर -- मैनफ्रेड सुन्दर रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं। उचित होगा कि आप यहाँ उन्हें बुलायें," अपने प्रश्न के समाधान हेतु कुछ सोचते हुये कमॉडर रिमेक ने अपना विचार व्यक्त किया।
"यही उचित होगा," अन्तरिक्ष भाषाविद डॉ. चतुरानन ने कहा। इंजीनियर मैनफ्रेड के कम्यूनिकेशन कोड को प्रेस करते ही त्वरित उत्तर आया, "मैं स्वतः आप लोगों से मिलने आ रहा हूँ। कृपाकर दो सेकेण्ड और प्रतीक्षा करें।'' चैनल आफ हो चुकी थी। इंजीनियर मैनफ्रेड ने अपना स्थान ग्रहण किया और प्रश्नों के उत्तरों के प्रस्तुतीकरण में उनके पैतालिस मिनट किस भांति बीते किसी का पता चला ही नहीं। परन्तु एक प्रश्न का स्पष्टीकरण बाकी था। वह प्रश्न था कि "सारे हिंम मंडित यूरोपा के क्षेत्रों के क्षेत्रों में से मात्र दो आवेजेब्टों का मिलना।''
इमेजिंग विशेषज्ञ मैनफ्रेड ने स्पष्ट किया, "वैसे तो उस यूरोपा की जमी हुयी बर्फ के नीचे मुझे अनेक प्रकार के निर्माणों, पशु और जीवों जन्तुओं के, वृक्षों वनस्पतियों के उपस्थिति की सूचना थी और यदि आप में से कोई उन्हें देखना चाहें तो वह इमेजर की मोमोरी और डिस्क में सुरक्षित हैं। परन्तु यह सभी टूटी हुयी अवस्था में होने के कारण, इतनी बिखरी थीं कि उनको उस दो किलोमीटर वर्फ की गहरायी से, उस यूरोपा के विशाल प्राकृतिक रेफ्रीजरेटर के गर्भ से निकाल पाना, उस छोटे रोबो की सीमा के बाहर था। वह उसके उत्खनन में सक्षम था ही नहीं। यदि हम यह करने को त्तत्पर भी हों तो हमारे पास संसाधनों का अभाव भी तो था। अतः जो सहज था, मैंने आपका ध्यान उसी तरफ आकर्षित किया। मुझे आशा ही नहीं विश्वास है कि यह आवजेक्टस हमारे इस अभियान की अमूल्य निधि, निश्चित रूपेण, सिद्ध होगें।''
"हम सभी इसी तथ्य-दर्शन की प्रतीक्षा में हैं,'' कम्प्यूटर विशेषज्ञा इवानोवा ने गहरी साँस लेते हुए उत्तर दिया।
"आपकी मानसिक व्याकुलता स्वाभाविक है,'' कहते हुए कमाण्डर रिमेक ने पुनः अपनी कम्यूनिकेशन चैनेल आन कर दी। वे कुछ विशेष प्रकार के तथ्य युक्त संदेश की प्रतीक्षा कर रहे थे। कुछ पलों के बाद संदेश में उनके चेहरे पर प्रसन्नता की किरणों को बिखेर दिया। सभी उपस्थित व्यक्तियों को लक्ष्यकर वे कहने लगे। "उन दोनों आब्जेक्टों को अब सामान्य तापक्रम पर लाया जा सका है। उन्हें लेकर कोल्डरूम के नियंत्रक आरने अपने विशेष वाहन द्वारा इस स्थल पर आ रहे हैं।"
हाइपोथर्मिया विशेषज्ञ डॉ. आरने उन दोनों आबजेक्टों को लेकर कक्ष में आये और सभी की दृष्टि उन दोनों-आबजेक्टों पर टिक सी गयी। विचित्र स्वरूप था, और उससे भी अधिक था चमत्कृतकर देने वाला उनका परिधान। सफेद कवर और उसी में समाहित उनके हाथ-पैर तथा विचित्र रूप से सर को ढँके विजार के ग्लासों से झाँकती उनकी उभरी आखें, कुतुहल उत्पन्न कर रही थी। उनकी बाडी एक्टीवेशन हेतु कम्प्यूटर विशेषज्ञा इवानोवा ने उन्हें माइल्ड इलेक्ट्रिक शाक दिये। दो तीन बार यह प्रक्रिया दुहरा दी गयी। एकाएक वे दोनों आबजेक्टस, जो अभी तक एक विशेष प्रकार की मेज पर रखे थे, उठकर बैठ गये।
उनके अँगों में गति आ गई उनका विजार-हेल्मेट लगा सर चर्तुदिक धूमकर सब कुछ निरीक्षण करने लगा। वे जड़ता त्याग कर चैतन्य हो गये थे। कम्पयूटर विशेषज्ञा इवानोवा के चेहरे पर मुस्कान छा गयी। वे प्रत्यक्ष देख रहीं थीं सभी की भाँति ही कि वे दोनों आवजेक्टस जीवित होते हुए भी मानव नहीं थे, कोई बुद्धिमान जीव भी नहीं थे। थे वे मात्र रोबो जो आपस में कुछ सूचनाओं का आदान प्रदान कर रहे थे। अतंरिक्ष भाषा विशेषज्ञ डॉ. चतुरानन ने अपने सभी सूक्ष्म संकेतग्राही यंत्रों को चालू कर दिया था। सभी रेकार्डस आन थे और डॉ. चुरानन गम्भीरता से उन संकेतों को उनके द्वारा उत्पन्न ध्वनियों को सुनने, समझने, स्पष्ट करने, रिफाइन करने के प्रयास में लगे थे। उन दोनों रोबों की भाव भंगिमा सभी को संशय में डाले हुए थे। स्क्रीन पर उभरते आकार और उनकी ध्वनियाँ अब कुछ स्पष्ट तो हो गयी थीं, परन्तु उनका अर्थ अभी भी समझ में आ नहीं रहा था।
डॉ. चतुरानन ने आटोमेटिक लैग्वेंज इन्टर प्रेटर के सुपर कम्प्यूटर में, चल रह कोड में कम्पयूटर विशेषज्ञा इवानोवा के सहयोग से, कुछ परिवर्तन कर दिया। तत्काल ध्वनियों स्पष्ट रूप से सुनायी देने लगीं और उनका भाषान्तरण आटोमेटिक लैंग्वेज इन्टर प्रेटर द्वारा कक्ष में गूँजने लगा। डॉ. चतुरानन में रेकाडरों को और ट्राँसमीटरों को आन कर दिया। सभी सतर्कता से बैठ गए थे। डॉ. चतुरानन ने लैंग्वेज इन्टरप्रेटर की ओर उन्मुख होकर उन दोनों रोबो गणों का नाम पूछा। उत्तर कुछ पलों बाद कक्ष में गूँज उठा। एक अपेक्षाकृत लम्बा रोबा, दीर्घकाय रोबो ने अपनी भाषा में कहा, "मेरा नाम कुतुलुग है, मेरा निमार्ण, हाँ मुझे अब अच्छी तरह से याद आ रहा है, ग्यारह हजार तीन सौ पचास वर्षों पूर्व मेरे ग्रह के वासियों ने किया था।"
"इस समय हमारे कैलेन्डर के अनुसार वर्ष चार हजार चार चल रहा है। इसको ध्यान में रखते हुए तुम्हारा निमार्ण आज से कितने वर्षों पूर्व हुआ था?'' चतुरानन का प्रश्न था?
"इसका उत्तर मैं गुदुलुग आसानी से दे सकता हूँ क्योंकि मैं कुतुलुग से अधिक मैथेमेटिकल हूँ," दूसरे अपेक्षाकृत छोटी काया के रोबो का उत्तर था।
"ठीक है, तुम्हीं बतलाओ।'' डॉ. चतुरानन ने कहा।
"हमारा निर्माण आज से पन्द्रह हजार तीन सौ चौवन वर्षों पूर्व किया गया था।''
"तुम लोगों का निर्माण क्यों और किस उद्देश्य से किया गया था?'' अभी तक शान्त बैठी-वार्तालाप सुनती, कम्प्यूटर विशेषज्ञा इवानोवा ने पूछा।
"मैडम! हम दोनों "मेटोरायट-वाच '' पर काम करते थे। आप जानती हैं कि मंगल और बृहस्पति की कक्षा, बीच की कक्षा, उल्का पिण्डों-मेटोरायटों की कक्षा है। कभी विशाल उल्का पिण्ड हमारे ग्रह की ओर बढ़ आते थे। यह सभी हमारे विनाश में सक्षम थे। इस कारण हम उन्हे अनेक प्रकार की तकनीकों से नष्ट कर देते थे।''
"उन तकनीकों में सबसे प्रभावी तकनीक कौन सी थी?" कमाण्डर रिमेक न पूछा?
"ओहे हमारे विशेषज्ञ उन्हे, उन उल्का पिण्डों को, लेजरों से अथवा लेजर बीम से नष्ट कर देते थे," कुतुलुग ने इस बार शंका का समाधान किया।
"तो क्या तुम सभी लेजर-तकनीकों से पूर्ण परिचित थे?" इंजीनियर फरकाश ने संशय के स्वर में पूछा।
"आप को आश्चर्य क्यों है-हमारी प्रौद्योगिकी, टकनोलाजी पूर्णरूपेण विकसित थी," गुदलुग का संक्षिप्त पर सारगर्भित उत्तर था।
"तुम लोग अपने ग्रह को किस नाम से पुकारते थे?" तापक्रम नियंत्रक, हाइपोथमिया विशेषज्ञ आरने ने प्रश्न किया?
"आप थे का प्रयोग क्यों करते हैं? मेरा ग्रह, हमारा यह ग्रह, आज भी विद्यमान है। उसे हम सभी अपनी भाषा में पा-श-या कहते है। हमारा ग्रह हम सभी का प्रिय रहा है।'' इस बार कुतुलुग मौन न रह सका।
"तुम दोनों तो 'हथूमेन्वायड' हो नहीं। तुम हमारे मानव रोबो की भाँति नहीं हो। यद्यपि तुम्हारी कार्य पद्धति हमारे रोबो गणों की ही भाँति है, लेकिन तुम्हारे निर्माण का तरीका क्या रहा है हमे ज्ञात नहीं है? वैसे भी तुम दोनों यह स्पष्ट करने का प्रयास करो कि तुम्हारे निर्माता क्या हम मानवों के समरूप थे?'' डॉ. चतुरानन ने लैंगवेज इन्टर-प्रेटर को इंगित करने हुए रिएक्टीवेटेड रोवोंद्वय से पूछा।
मौन कई सेकेण्ड़ों तक छाया रहा। कुतुलुग ने उठकर स्वतः स्क्रीन को एक्टीवेट करने वाली बटन को पुशकर दिया तथा लैंग्वेज इन्टरप्रेटर की वह नॉब पुश कर दी जो भाषा की ध्वनि को विभिन्न संकेतों के रूप में प्रदर्शित करने में सक्षम होती है। कक्ष को प्रत्येक सदस्य को स्क्रीन पर उभरते भाषा संकेत चिन्हों की प्रतीक्षा थी। कक्ष की स्क्रीन पर भाषा ध्वनि चिन्हों को स्वरूप देने पर जो आकृति दिखी वह विशालकाय थी। श्याम वर्ण, की एक छाया जो दो मीटर लम्बी और स्थूल थी, जिसके शरीर पर एक ऊपर से नीचे तक ढ़कता हुआ 'परिहन' था। उस आकृति की नासिका चपटी, ओंढ़ मोटे और आखों मंगोलायड जातियों जैसे चीनी, जापानी कोरियन आदि लोगों की भाँति दिख रही थीं। वे आँखे अपेक्षाकृत बड़ी और कुछ उभरी हुयी सी थी। उसके हाथों की बनावट उसे शक्तिशाली प्रदर्शित करती थी।
कम्पयूटर विशेषज्ञ इवानोवा के प्रश्न कि "आपके पा-रा-या ग्रह की स्त्रीयाँ किस प्रकार दिखती थीं?" ने अतंतः छाये मौन को भंग किया। यह प्रश्न गुदुलुक को लक्ष्य कर किया गया था। अतः उत्तर भी उसी के शब्दों को स्वरूप प्रदान करता स्क्रीन पर दिखायी पड़ा। एक श्यामवर्णी, तन्वी, दो मीटर लम्बी काया के रूप में। वह रानी भी ऊपर से नीचे तक गुदुलुक की भाषानुसार "परिहन'' पहने हुए थी। स्थूल काय होते हुये भी उसकी मुस्कान में मादक आकर्षण था।
इमेजिंग विशेषज्ञ मैनफ्रेड ने कुतुलुग से प्रश्न किया, "यह छवि जो हमे दिख रही है वह कौन है तथा वह पुरुष भी कौन था, नहीं आई एम सारी...कौन है?''
"वह पुरुष हमारा यूथपति है, उसे हम "कागान'' शब्द से संबोधित करते हैं तथा उसकी पत्नी, जिसकी छाया आपने देखी है "कागाना'' कही जाती है, यूथ पत्नी कही जाती है।" कुतुलुग का तत्काल दिया उत्तर, स्पष्ट छबि के रूप में दिख रहा था।
मैनफ्रेड को एक क्षण के लिए ऐसा प्रतीत हुआ आभास हुआ, जैसे वह "कागाना'' उस पर मुस्कुरा रही हो। चौंक कर उसने अपनी आखों को बन्द कर, उपरान्त पुनः खोला, उस समय वह दृष्टि-भोग का क्षण, दृष्टि-अभिसार समाप्त हो चुका था।
कमाँडर रिमेक के आग्रह पर कुतुलुग और गुदुलुक ने क्रमश उस ग्रह पर प्राप्त होने वाली वनस्पति, पादपों, पुष्पों, वृक्षों, लताओं तथा विविध प्रकार के जीवों-जन्तुओं कीटों पतंगों, जलचरों, पक्षियों, मछलियों और उभयचरों के विषय में, अपनी कृत्रिम बौद्धिक क्षमतानुसर सचित्र सूचना दे दी। सभी चकित थे उस ग्रह के जैविक विविधता पर और पृथ्वी से लाकर विकसित किए गए चन्द्रमा के, बायोस्फेयर में रक्षित, जीव पादप, जन्तु समुदाय की सहज समानता पर। इस चकित होने में निहित था, जैविक विकास की समरूपता का तथ्य। जो त्रिआयामी विकास को दर्शा ही नहीं रहा था वरन् यह भी इंगित करता प्रतीत होता था, कि एक अथवा द्विआयामी सृष्टि की सँभावना अपेक्षाकृत इस अनन्त ब्रह्माण्ड में न्यून है, कम है।
अन्तरिक्ष भाषाविद डॉ. चतुरानन के मानस में जो प्रश्न लगतार उभर रहा था जिसे वे विरही यक्ष की हृदय पीड़ा की भाँति छिपाने में लगे हुए थे प्रगट होने के उचित अवसर की प्रतीक्षा में था। कुतुलुग और गुदुलुक के सामवेत स्पष्टी करण के उपरान्त जो मौन छाया था, उसे भंग करते हुए डॉ. चतुरानन ने कुतुलुग की ओर उन्मुख होकर प्रश्न किया, "इन चित्रों की पृष्टभूमि में, दिख रही तुम्हारी बिल्डिगें, तुम्हारें आवासीय निर्माण, प्रयोग शालाएँ कार्य स्थल सड़के और विशाल शापिंग काम्प्लेक्स, अतीव सुन्दर सुरुचिपूर्ण और सुदृढ़ दिख रहे हैं, इनका अस्तित्व किस प्रकार समाप्त हो गया? इस पक्ष को भी स्पष्ट करने कर आवश्यकता है।''
"मैं इस प्रश्न की प्रतीक्षा कर ही रहा था,'' कुदुलुग ने कहा।
"वास्तव मे तुम्हारा यूरोपा और हमारा प्रिय "पा-रा-या'' ग्रह उल्काओं की सतत् बरसती श्रृंखला का शिकार हुआ। मुझे आज भी स्पष्ट रूप से स्मरण है कि हमारे "मेटोरायट-वाच'' के समय मंगल और बृहस्पति के उल्का पिण्ड क्षेत्र से एक अतीव विशाल पिण्ड, जो 20 किलोमीटर लम्बा और पन्द्रह किलोमीटर चौड़ा था, हमारे ग्रह की ओर तीव्रगति से बढ़ता दिखा। इसे हमने लेजर-बीम के द्वारा नष्ट करने का प्रयास किया।
परन्तु यह विशाल उल्का पिण्ड-पूर्णरूपेण नष्ट नहीं हुआ। बहुत संभव है कि उसकी संरचना में कुछ इस प्रकार के प्रदार्थ अथवा तत्व रहे हो जो हमारी लेजर-बीम को आँशिक रूप से सोख लेते थे। फल स्वरूप एक अवाष्पिकृत खण्ड जो पाँच किलोमीटर लम्बा और सात किलोमीटर चौड़ा था, हमारे उत्तरी गोलार्ध में स्थित विशाल नगर के क्षेत्र पर आ गिरा।
वहाँ पर, इस आघात के परिणाम स्वरूप एक सौ किलोमीटर का क्षेत्र "पा-रा-या''की धरा में समाकर सदैव के लिए विलीन हो गया। "हमारे पशु, पक्षी, जीव, जन्तु, पौधे, वृक्ष और वनस्पतियाँ सभी हमारी आधी जनसंख्या जो पाँच लाख लोगों की, स्त्री-पुरुष-बच्चों सहित थी, को इस उल्का पिण्ड ने अपने में उदरस्थ कर लिया। वे सभी कहाँ चले गये, कुछ पता चल ही नहीं सका।"
कक्ष में उपस्थित सभी ने देखा कि कुतुलुग के स्वर में, पीड़ा उभर आयी थी एक विचित्र प्रकार का याँत्रिक अवसाद उसके मुखमंडल पर छा गया था। वह कातर दृष्टि से अपने सहयोगी मित्र गुदुलुक की तरफ देख रहा था। इस नाश की घटना ने उसके आनन को भी प्रभावित कर दिया था। वह हताशा से भरा-निश्चेष्ट बैठा था। थोड़ा सामान्य होकर कुतुलुग ने विगत की दुर्घटना के विवरण को बताना प्रारम्भ कर दिया। "लगता था प्रकृति हमारे बिनाश पर कटिबद्ध हो गयी थी। हम इस दुर्घटना के अवसाद से मुफ्त भी नहीं हो गये थे कि पुनः एक सप्ताह बाद "मेटोरायट वाय'' का एलार्म अर्धरात्रि में बजना प्रारम्भ हो गया। सभी चकित से कुछ भयभीत से, मेटोरायट-वाय'' सेन्टर की ओर चल दिये।''
"एक दूसरा विशाल मेटोरायट उल्टा पिण्ड हमारे कम्प्यूटरों के अनुसार दस किलामीटर लम्बा और 8 किलोमीटर चौड़ा हमारे ग्रह के दक्षिणी गोलार्ध की ओर तीव्रता से बढ़ रहा था। हमने उस पर, अनुमानतः दो किलोमीटर की दूरी पर आ जाने पर लेजर गनों से उसे विखंडित कर वाष्पीकृत तो कर दिया-परन्तु इसके भयावह परिणाम की कल्पना हम उस क्षण नहीं कर सके थे।''
"हमारे रेडियो धर्मिता मापी यंत्रों की ध्वनि ने हमें दूसरे पक्ष की ओर सचेत किया। वह पूरा पिण्ड रेडियोधर्मी तत्वों से बना था। हमारे वातावरण में रेडियो सक्रियता घातक सीमा को पार कर गयी थी। हम सभी रेडियेशन से बचने के लिए अपने आवासों की तरफ दौड़ पड़े। यद्यपि हमारे चिकित्सकों ने सभी को रेडियो धार्मिता से मुक्त कराने का प्रयास किया लेकिन मृतकों की संख्या में आगामी छः मासों में लगातार बढ़ोत्री होती रही। हमारे पास मृत्यु के मुख में जाने को छोड़कर दूसरा विकल्प बचा ही नहीं था।''
"हम सदैव अन्तरिक्ष में अन्य बुद्धिमान जीवों से प्राणिययों से संपर्क बनाये रखते थे। अतः उस र्दुदैव के दिनों में हमने55 सेन्टुरी के दूसरे ग्रह के वासियों से संपर्क स्थापित करने का प्रयास किया। कई मासों के सतत् प्रयास के उपरान्त उनसे संपर्क हो गया। तथ्यों से परिचित होने पर उन्होंने सर्वप्रथम यह जानना चाहा कि हमारे ग्रह "पा-रा-या'' से कितने लोग उनके ग्रह पर जाना चाहेगें।?
"आप कल्पना नहीं कर सकते हमारी जनसंख्या में रेडियोधर्मिता से अप्रभावित, बचे हुए स्वस्थ लोगों की संख्या का। आप परेशान न हों। मैं स्वतः आपको बता रहा हूँ''। कहकर कुतुलुग एक निमेष के लिए रुका और गुदुलुग की ओर इस प्रकार से देखा, जैसे वह तथ्य को स्पष्ट करने का संकेत चाह रहा हो। उनके संकेत को कोई समझ न सका परन्तु संकेत था आवश्यक, क्योंकि उसके उपरान्त ही कुतुलुग कहने लगा। "हम मात्र पाँच-सौ प्राणी, कुछ अप्रभावित वनस्पतियाँ, वृक्षादि और उंगली पर गिनने योग्य जीव जन्तु, ही बच रहे थे, और मात्र दस याँत्रिक मानव। हमारे ग्रहवासियों के संदेश में उन्हें संख्या स्पष्ट कर दी गई थी। निश्चित समय पर वे सभी मात्र हम दो को छोड़ कर, उस ग्रह 55 सेन्टुरी के यान से चले गए। जाते समय वे हमें अति शीघ्र वापस आने और हमें भी ले जाने का आश्वासन दे गये थे। परन्तु वे वापस ने आ सके। हमारे ग्रह के मौसम में आकस्मिक रूप से परितर्वन होना प्रारम्भ हो गया। दीर्घ काल तक छाये अंधकार ने भीषण ऊष्मा को शान्त कर शीत को हिम में परिवर्तित कर दिया। एक रात तो इतना भीषण हिमपात हुआ था कि हमारी प्रयोगशाला के चारों तरफ पचास मीटर बर्फ जम गयी थी। हम कहीं निकल नहीं सकते थे, तापक्रम शून्य से 26 डिग्री सेलसियस नीचे जा चुका था। हमारे संपर्क यंत्र, संदेश भेजने, प्राप्त करने की चैनलों जाम हो चुकी थीं।''
"हम असहाय थे। बर्फ की पर्त मोटी होती जा रही थी। उसके दबाव से हमारी प्रयोगशाला की छत टूट गयी और हम समा गए बर्फ में। चारों ओर भीषण शीत और शून्य से 26 डिग्री सेलसियस नीचे के तापक्रम ने हमें डिएक्टीवेट कर दिया। और उसी रूप में हम पड़े रहे आपके रोबट के आने तक। यही विवरण है, जो मेरी और मेरे सहयोगी मित्र गुदुलुग की मेमोरी चिप्सों मे सुरक्षित बचा रहा है। अब हम आप लोगों के पास आपके प्रयास से पुर्नजीवित-रिएक्टीवेटेड रूप में खड़े है। यही हमारी कथा है," इतना कहकर कुतुलुग एक पल के लिए रुका और सोचता हुआ संकेत माध्यम से कहने लगा, "मेरी और गुदुलुग की एक रिक्वेस्ट है, प्रार्थना है। यदि आप अन्यथा न लें, तो हम कहें।"
"तत्क्षण कमाण्डर रिमेक ने उन्हें आश्वासन देते हुए अपना मनतव्य व्यक्त करने को कहा।''
"धन्यबाद कमाण्डर!" कहने के उपरान्त कुतुलुग ने कहा। "यदि आप सहमत हो तो मैं अपने निर्माण करने वाले लोंगों को 55 सेन्टूरी के दूसरे ग्रह के वासियों के मध्य आपके यंत्रों का उपयोग कर अपनी रिएक्टीवेटेड स्थित का और आपके सहयोग का संकेत भेज दूँ।'' एक पल का मौन छा गया। फिर सहर्ष कमाण्डर रिमेक ने उन्हें संदेश प्रेषित करने की अनुमति दे दी। सभा भी समाप्त हो चुकी थी। कक्ष से बाहर आते समय सभी ने देखा कि कुदुलुग और गुदुलुग तेजी से कमाण्डर-रिमेक के साथ संकेत प्रेषण हेतु, चले जा रहे थे।