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अनुभूतियाँ

आनन्द से उसका तात्पर्य था कि जो भी आनन्द हो सके वह सब कुछ। इसमें निहित था अपने बच्चों का सानिध्य और फिर आनन्द की अनुभूति हेतु एक पुरुष जो विवेकवान हो धैर्यवान हो और सर्वोपरि धनवान हो। हाँ! व्यक्ति से, पुरुष से उसका मतलब था एक सुदर्शन पुरुष से। जिसके उम्र की कोई बाध्यता नहीं थी। पर जो  उससे दीर्घकालीन संबंध बनाए रखने में सक्षम हो......और यदि ऐसा न हो सके तो........ ओह! अभी क्यों  (इस विषय पर चिन्ता की जाए) । खैर! इसके बाद सबसे बड़ी जरूरत है तीन चार गर्ल-फ्रेन्डस की। जिनके साथ वह निजी, व्यक्तिगत बातें कर सके और कभी-कभी मूड बदलने के लिए गम्भीर बातें...... जिनमें वैश्विक अर्थ व्यवस्था, विकास की, औद्योगिक विकास की टेकनालॉजी की हृदय हीन प्रगति, उससे जनित याँत्रिक दासता और इन सब से ऊपर ...... पुरुषों की आधिपत्यवादी प्रवृत्ति में परिवर्तन में चर्चा। इस परिवर्तन में निहित है : पुरुषों का महिलाओं के विशिष्ट संदर्भों पर मौन। निश्चय ही इसी भावना का शिकार उसका भावी मित्र..... पुरुष मित्र भी हो सकता है .... अब असंभव तो कुछ रहा नहीं।

हाँ एक बात और! महिलाओं के प्रति पुरुषों का कुछ विशिष्ट बिन्दुओं पर मौन.... यह मौन अथवा जानबूझ धारण किया गया बहरापान।  तथ्यों को जानते हुए न सुनना और न देखना..... जो इस प्रगतिशील प्रौद्योगिकी का ही परिणाम है......क्या यह परिवर्तन इस प्रगति की संवेदनहीनता का अभिशाप नहीं है ?

पर गर्ल-फ्रेन्डस-सहेलियों, अन्तरंग सहेलियों के साथ शहर में जाकर घूमना जैसे वह पहले घूमा करती थी- बातें करते करते जब  वे थक जातीं तो वापस आकर बेड पर लेट कर गप्पें लगाना और सहेलियों के चले जाने के बाद सोना.... कितना आनन्ददायी होता था। और हाँ ! वह प्रगति का नायक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का नायक बनने का स्वप्न देखने वाला, जरावस्था, वृद्धावस्था के नियंत्रण पर शोध करने वाला, उसका वैज्ञानिक मित्र, जिसके साथ वह स्वच्छन्द रूप से घूमती थी और कुछ अर्थों में उसे चाहती भी थी....... शायद प्यार करने के सोपानों पर चढ़ रही थी। परन्तु वह जब भी पास से निकलती, परफ्यूम की महक उड़ाती सुन्दरी को देखना था, उस समय उसे अपलक निहारता हुआ....., जैसे उसने इसके पहले कभी किसी युवती को देखा ही नहीं था, वह आह भरकर कहता `हे भगवान (एक अर्थहीन संबोधन) क्या सुन्दर काया दी है तुमने उसे! काश वह मेरे बगल में होती (विशिष्ट पुरुष प्रवृत्ति) तो आनन्द आ जाता- मजा आ जाता - लुत्फ आ जाता, मेरी वीरान सूखी जिन्दगी में (एक सफेद झूठ)।´ और कुछ देर बाद, किसी दूसरी सुन्दरी को देखकर वह अपने सीने पर हाथ रखकर (मानों झूठ के छिपाने के प्रयास में ) कहता `जालिम की चाल कत्ल कर रही है और आँखें मेरे दिल को लूट ले रही हैं (अवैज्ञानिक बात)।´

मैं उसके साथ साथ चलते यह निरर्थक बकवास इस कारण सुन लेती थी क्योंकि वह अपना समस्त पौरुष इन्हीं शब्दों के माध्यम से ही प्रकट कर सकता था। मुझें लगता है कि उससे अधिक प्रभावी सड़क पर घूमती गायों को देखकर हुँकार भरते वृषभ थे, जो गायों का गर्भाधान तो कर सकते थे। उनकी हुँकार, मेरे बगल चल रहे कथित पुरुष की अपेक्षा अधिक अर्थपूर्ण और सार्थक रहती थी।

"परन्तु ऋचा तुमने उससे संबंध (मात्र शाब्दिक) तो रखे थे," क्षिप्रा ने मौन भंग करते हुए कहा।

हाँ क्षिप्रा ! वह मेरे मानसिक असमंजस का प्रतीक था- वह एक कवर-अप था, लोगों को दिखाने के लिए, कि मैं अकेली नहीं हूँं वह एक मात्र माध्यम था जिसका प्रयोग मैं अवांच्छित पुरुषों से बचने के लिए करती थी।"

"जानती हो क्षिप्रा" कुछ रुकते हुए ऋचा ने कहा "पुरुष की नैसर्गिक प्रवृत्ति वृषभ की भाँति होती है। पर एक अन्तर है दोनों में।
"क्या?" चकित क्षिप्रा ने पूछा।

" पुरुष स्त्री को गर्भधारण कराकर उस पर नियंत्रक सा बन जाता है। नियंत्रक प्रत्येक अर्थ में, परन्तु वृषभ ऐसा नहीं करता, वह गाय की स्वतंत्रता का, उसके आचरण का ठेकेदार नहीं बन बैठता।
"परन्तु" क्षिप्रा ने पूछा।

"वह कुछ भी नहीं था...... मैं तो अपने जीवन के तीसवें वसन्त में पहुँचने पर अपनों डिम्ब कोशिकाओं को, अपने अण्डाणुओं को हिम-संरक्षित करा दूँगी। जब कोई पुन: दूसरा मनमोहक - मनभावन पुरुष मिलेगा तो मैं उसके शुक्राणुओं से निषेचित, अण्डाणुओं को अपने गर्भ में धारण करने पर विचार करुँगी -गर्भवती होने के आनन्द की अनुभूति प्राप्त करने की कामना करुँगी। स्त्री जीवन के पीड़ा जन्य आनन्दानुभूति का पक्ष, अछूता नहीं रह सकेगा क्षिप्रा! "

"अभी आनन्द उठाने का समय है, उसे अनुभव करने का समय है और क्षिप्रा ! समय है सुख पूर्वक कुरकुरी स्लाइस, ब्रेड और चीज के साथ, धीरे-धीरे सिप करने हुए दार्जिलिंग की चाय का लुत्फ, ब्रेक फास्ट, पर उठाने का।   

उसे अचानक लगा कि उसने एक दो प्रमुख बिन्दुओं पर सोचा ही नहीं और प्रेम .... अरे हाँ । अभी तक मैं अपनी ही बात क्षिप्रा को सुनाए चली जा रही थी। क्या हो गया है मुझे?

इस प्रेम, इन दो शब्दों, अथवा कबीर के शब्दों में 'ढ़ाई आखर प्रेम का' के विषय में सोचते हुए, उसकी निगाह बरबस पार्क में प्रेमालाप करते युगलों पर जा पड़ी। उनमें से कुछ धीरे-धीरे बातें करते, डोपामीन, अमीनों एसिडों के रक्त में  संचार होते ही आलिंगनबद्ध हो जाते थे। ऐसे में पश्चिम की ओर तेजी से बढ़ते संध्या की बाहों में लिपटने के लिए आतुर सूर्य और उसका प्रकाश, उन प्रेमियों के आनन पर अनुराग की लालिमा तेजी से बढ़ा रहा था। इन अनुराग भरे क्षणों को देखकर वह कह उठी ``क्षिप्रा मैं बिना प्रेम के मर जाऊँगी!"

इन ढ़ाई अक्षरों से उसका आशय था, उस व्यक्ति विशेष के साथ बिताए गये क्षणों की याद, उच्छवासों की स्मृति, उस पुरुष द्वारा उसके "चीने जवीं को चूमने की अनुभूति का स्मरण"। उसकी याद आते ही शरीर के विशेष भागों में मादक स्फुरण, जो उसके मानस को एक विचित्र प्रकार की शान्ति से भर देता था। वह उस अनुभूति की उस शारीरिक आनन्द की कामनाकांक्षी थीं और फिर कहते हुए क्षिप्रा रुक गई।

``हाँ। फिर ....बच्चे.... वे इस कारण आवश्यक हैं क्योंकि वे मानव के भविष्य हैं..... प्राकृतिक सृजन सततता के प्रतीक हैं। प्रकृति के नियम निघोZष हैं।´´

यह प्रजनन यह बच्चे.... विकल्प तलाश कर, मानव को मानवता को चतुर्थ विश्व युद्ध जिसे मैं "प्रथम वैश्विक जल युद्ध" कहूँगी से बचा सकते हैं। वे ही सुरसा के मुख के समान निरंतर बढ़ती हुई जन संख्या पर अंकुश लगा सकते हैं। वे ही इस विश्व में आर्थिक समृद्धि ला सकते हैं ...........इतना ही नहीं वे और भी बहुत कुछ करने में, सफल सिद्ध हो सकते हैं।´´

" तुम्हारी बात मैं चाहती हूँ कि सत्य सिद्ध हो सके....परन्तु आज इस इक्कीसवीं शताब्दी में क्या हो रहा है?"    

"मैं जानती हूँ क्षिप्रा" ऋचा तटस्थतता पूर्ण स्वर में कहने लगी "वास्तव में आज पल प्रतिपल मीडिया वैश्विक घटनाक्रमों कों, अपने विविध उपग्रहों के माध्यम से, अपनी विचारधारा के अनुरुप तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करती रहती है......लोगों को जन समुदायों को दिग्भ्रमित करती रहती है.... पर इतना ही क्यों आज इंटरनेट पर क्या उपलब्ध नहीं है? " कहती वह रुक गई।

"तुम रुक गई। मैं तो सोच रही थी कि तुम बोलती ही चली जाओगी।"

"सारी क्षिप्रा!"

"ठीक है-हाँ फिर ?"

" क्या कहूँ........ मैं इस संसार में बदली जा रही भयानक याँत्रिकता से, उससे उत्पन्न हुई नवीन प्रकार की नैतिकता से, परेशान हूँ।"

''परन्तु तुम्हें तो इन्हीं समस्याओं के मध्य में जीना है, और सुख और आनन्द लाभ की चाहत में, जीवन यापन करना है'' क्षिप्रा कुछ विचार करते हुए, रुकते हुए कह उठी।

"मुझे प्रसन्नता है कि तुम अब मेरी मन: स्थिति से, मेरी भावनाओं से सुपरिचित हो चली हो।"

"हाँ ऋचा! तुम ठीक कहती हो। मैं अब अस्सी प्रतिशत  मानवीय भावों को समझ लेती हूँ।"

"चलो अच्छा है। तुम्हारा यांत्रिक मस्तिष्क मानवीय हो रहा है विकास कर रहा है। तुम मेरी सबसे प्रिय राबोटिका सहचरी हो और मेरा सुख , मेरी आनन्द की अनुभूतियों का केन्द्र हो।´´

"चलो क्षिप्रा वापस चलें" कहती हुई ऋचा ने क्षिप्रा का हाथ पकड़ लिया।
 


Image: Nick Rose



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by Dr. Radut.