लिआना : 2 सितम्बर 2120 ई.
"नहीं, नहीं, नहीं, हैरिस मुझे प्यार नहीं करता। बड़े भ्रम पाल लिए हैं मैंने हैरिस को लेकर। आज दो महीने बाद मेरी उससे भैंट हुई। मैं एंटार्कटिका चली गई थी। डाक्टर का ख्याल था कि मुझे इस तमाम भीड़ और शोर-शराबे से दूर- बहुत दूर कहीं एकान्त में चले जाना चाहिए। मगर एंटार्कटिका में भी अब कहां धरा है एकान्त। भीड़ से ऊबे हुए लोगों ने ही वहां कैसी खासी भीड़ जमा कर रखी है। उपग्रह से प्रसारित होने वाले टेलीवीजन कार्यक्रम वहां भी इस दुनिया की खबरें पहुंचाते रहते हैं। दो पल को भी नहीं लगा कि मैं किसी ऐसे शान्त स्थान में रह रही हूं, जहां न अन्तरिक्ष युद्ध की भयावक आशंका की प्रेत छाया है और न कम्प्यूटरों का घेराव। शायद हैरिस मेरे साथ होता तो ऐसी स्थिति नहीं होती। पर उसे मेरी पीड़ा समझने की फुर्सत ही कब है। जब देखो तब अपनी टिश्यू कल्चर लैबोरेटरी की चर्चा लेकर बैठ जाएगा। सोचती थी दो महीने बाद उससे मिल रही हूं। देखते ही मुझे बांहों में भर लेगा। चूम-चूम कर बेहाल कर देगा। बार-बार पूछेगा, "क्यों चली गईं थीं तुम। तुम्हारी तबियत अब कैसी है। तुम्हारी याद में पता है किस तरह काटे हैं ये दो महीने।"
"...... नहीं, नहीं, नहीं...... वैसा कुछ भी तो नहीं हुआ। हम मिले.... वह मेरी ओर बढा और हां, उसकी बांहें उठी थीं..... पर मेरे हाथ से एंटार्कटिका से इकट्ठे किए गए फॉसिलों का डिब्बा लेकर वह बैठ गया था। मैं प्रतीक्षा करती रही.... पर उसने तो यह भी न पूछा कि.... उफ़ मुझसे नहीं सही जाती उसकी यह उपेक्षा।.... फॉसिल देखने में सदियों पहले बर्फ में दबे पथराए पौधों को लेकर वह इतना मगन हो गया कि मेरी उपस्थिति ही भूल गया- एक बार भी उसने मेरी पथराई आंखों में झांकने की कोशिश नहीं की। हार कर मैं खुद ही उसके कंधे से लग गई थी और तब मुझे लगा था जैसे उसके कंधे किसी टैरियोस्पर्म जैसे फासिल फर्न के बने हों.... स्पन्दनहीन।
"मेरे नाम का मतलब जानते हो, हैरिस!", मैंने उसके कंधों पर अपना भार डालते हुए पूछा था।
"हां, हां, तुम्हारा नाम है....... लिआना। लिआना यानी महालता। इतनी बड़ी लता कि बड़े-बड़े पेड़ को अपने दायरे में समेट लें।"
"सच......!" मैंने शरारत से उसकी आंखों में झांकते हुए अपनी बांहों की गिरफ्त और गहरी कर दी थी (फिर पूछा था ....." क्या इतने बड़े पेड़ को भी बांध लूंगी मैं!"
"मगर मैं पेड़ नहीं हूं लिआना!" मेरी बांहों को झटककर गिरफ्त से बाहर होते हुए उसने कहा था।.... ये उसी हैरिस के शब्द थे, जिसके बिना में एंटार्कटिका पर बेचैन रहती थी, कि कब अपने हैरी के पास पहुंचूं। कहता है मैं पेड़ नहीं हूं (एकदम पेड़ है, पर ऐसा पेड़ जिसे बसन्त कमी नहीं छूता, जिस पर पत्तियां कभी फूटी ही नहीं (कलियां कभी खिली ही नहीं... जिसकी शिराओं का क्लोरोफिल सूख गया है..... एक पथराया पेड़ .... एक फॉसिल। .... पागल ही तो हूं मैं जो फॉसिल को हासिल करने के लिए परेशान हूं।
हैरिस : 10 सितम्बर 2120 ई.
ये लिआना को क्या हो गया है। एंटार्कटिका से इतना अच्छा कलैक्शन करके लाई हैं फॉसिलों का कि प्रो. एण्ड्रूज तो मारे खुशी के उछल पड़े। कहने लगे, जल्छी से इनके माइक्रोसेक्शन कटवा कर इलेक्ट्रोन फोटो ले लो। दिसम्बर में पैलिओबाटनिस्टों का अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन होने वाला है भारत के बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट में। वहां इनका प्रदर्शन करेंगे। पर लिआना है कि कोई दिलचस्पी ही नहीं लेती। जब देखो तब फिजूल की बातें करती रहेंगी। कोई जरा भी कड़ी बात कहो कि आंसू टपकाने लगेगी।
उस दिन तो उसने पूरे चौबीस घंटे खराब कर दिए। हवा पर फिसलने वाली हौवरकार लेकर आ गई कि चली यौसेमिटी घूम आएंं। पता नहीं योसेमिटी घाटी में ऐसा क्या नज़र आता है उसे। फिर भी यह सोचकर कि शायद वहां घूम आने के बाद वह अपने फॉसिल अनुसंधान में जुट जाएगी, मैं चल दिया।
अभी तो तुम एंटार्कटिका से लौटी हो, अब योसेमिटी घाटी घूमने चल दीं। क्या जिन्दगी भर यों ही घूमती रहोगी। मैंने मिरर लेक मैं तैरते हुए पूछा था। वह बोली, "वहां तो मैं अकेली गई थी (यहां तुम साथ हो.... फिर तुम साथ रहो तो मैं घूमती ही रहूं... सारी दुनिया... सारे ग्रह.... और उपग्रह, सबका चक्कर लगा आऊं।"
ठीक है, ठीक है, अबकी बार नासा के किसी वैज्ञानिक से कहूंगा कि कृत्रिम उपग्रह तो बहुत छोड़ लिए गए, जब सीधे तुम्हें ही उठाकार आर्बिट में रख दें, फिर करती रहना परिक्रमा सारी दुनिया की।" मेरी इस बात पर फिर उसने टप्प-टप्प आंसू गिरा दिए।
मिरर लेक से लौटकर मैंने बहुत चाहा कि वापस लैबोरेटरी लौट चलें। पर कितनी जिद्दी लड़की है। कहने लगी एक रात योसेमिटी विलेज में गुजारेंगे। निहायत ही पुराने ढंग की कॉटेज। एयर-कण्डीशनिंग का गया-गुजरा तरीका। यहां के लोगों ने इधर एटौमिक प्लांट ही नहीं लगाने दिया, कि सारी प्राकृतिक शोभा नष्ट ही जाएगी। आज भी लोग प्रकृति के कितने गुलाम हैं (आश्चर्य होता है मुझे तो....। उस कॉटेज मैं मेरा तो दम घुट रहा था। फिर यह लिआना.... सारी रात सोने नहीं दिया।
लिआना : 10 सितम्बर 2120 ई.
योसेमिटी विलेज की उस कॉटेज में रात उतरी तो मैंने तय कर लिया था कि आज हैरिस और अपने बीच के सभी अंधेरे मिटा दूंगी। मैंने सोच लिया था कि प्रेम की जो चिनगारी में और सब उपायों से हैरिस के मन में नहीं फूंक सकी, आज देह के स्तर पर जगाऊंगी।
झीने-झीने प्रकाश में मैंने वह खेल शुरू किया। हैरिस के हाथ से किताब छीनकर फैंक दी। मैंने उससे कहा, "मेरी ओर देखो, हैरिस, मेरी आंखों में तुम्हें क्या नज़र आता है?"
"कोई खराबी नहीं है, तुम्हारी आंखों में। बिल्कुल ठीक हैं, जैसी कि किसी उच्च श्रेणी के स्तनधारी जीव की आंखों होनी चाहिए।"
"स्तनधारी जीव की आंखें," उसके इस सूखे जवाब से मेरा उत्साह ठण्डा होने लगा। फिर भी मैंने हिम्मत की।
बड़ी गर्मी लग रही है मुझे, हालांकि कमरा एयरकण्डीशण्ड था, पर मैं तो हैरिस को जीतने के लिए उतावली थी ... और मैंने देह पर चढ़ा झीना आवरण उतारकर हैरिस की ओर फेंक दिया।
मेरी देह-यष्टि सचमुच ही ऐसी है कि कोई भी लड़की गर्व कर सकती है। फिर जहां-जहां आदिम वासना की ललक से छलकती सैकड़ों आंखे-मुझे इसका अहसास करा चुकी थीं। रोशनी की घार कटावों को और तीखा कर रही थी, यह मुझे मालूम था। .... लेकिन हैरिस... हैरिस मेरी देह में नहीं, देह से उतार कर फेंके गए आवरण मैं उलझा हुआ था।
"ये जैली वस्त्रा तुम्हें किसने दिया।" उसने पूछा।
"किसी ने भी दिया हो, तुम्हें क्या?" बेहद अपमानित हुई मैं। क्या समझता है ये हैरिस ..... सिर्फ एक स्तनधारी जीव।
"अरे रे. . . नाराज क्यों होती हो (मैं तो इसलिए पूछता था कि यह तो अन्तरिक्ष यात्रा की पोशाक के काम आता है। मुझे क्या मालूम था कि तुम महिलाओं के फैशन में भी यह पोशाक प्रचलित हो गई है(" वह जिस संजीदगी और धैर्य से बोल रहा था, उसने मेरा रहा-सहा धीरज भी खो दिया। हथेलियों में मुंह दबाकर सिसक पड़ी।
इसके बाद भी हैरिस ने सिर्फ इतना किया कि उठा और जो जैली-वस्त्रा सिकुड़कर रूमालनुमा हो गया था, उसे मेरी देह पर चढ़ा दिया। रोते हुए भी मैंने कनखियों से देखा था कि मेरी निरावरण देह को छूते और उलटते-पलटते हुए उसके चेहरे का रंग जरा भी तो नहीं बदला था (उसकी आंखों में वही सूनापन था। शायद मैं सारी रात रोती रही थी। सारी रात कमरा रोशनी में डूबा रहा था, और मुझे लगा था एक काला स्याह दलदल मुझे निगलता जा रहा है और मैं उसमें धंसती जा रही हूं। मैं चीख पड़ी थी- "मैं इस दलदल में डूबकर मरना नहीं चाहती.... मुझे बचा लो हैरिस, बचालो।" पर सुबह आंख खुली तो देखा- हैरिस जा चुका था।
लिआना : 11 सितम्बर 2120 ई.
टिश्यू कल्चर लैबोरेटरी में गई हूं। हैरिस नहीं मिला...... एक पंक्ति का पत्रा था मेरे नाम... प्रिय लिआना, मैं मंगल ग्रह पर जा रहा हूं। वहां मौलीक्यूलर बायोलोजी की लैबोरेटरी में मुझे अनुसंधान का अवसर मिल गया है। अलविदा!
पूरी पंक्ति लेसर की लाल रोशनी की छूरी की तरह मेरे कलेजे मे उतरती चली गई है।
तभी पीछे से कोई हाथ मेरे कंधे थपथपाता है। "हैरिस" में मुड़कर देखती हूं।
"मैं हैरिस की मां हूं बेटी। उस स्नेहमयी महिला ने बड़े प्यार से कहा, तुम... तुम हैरिस को बहुत चाहती थीं।"
मैं उनकी गोद में सिर छिपाकर सुबकने लगती हूं, "मैं तो उसे जान से भी ज्यादा चाहती थी, मां, पर मैं उसका प्यार नहीं पा सकी।"
"उसका प्यार कोई नहीं पा सकता पगली," मां ने मेरे आंसू पोंछते हुए कहा, "चल मेरे साथ चल मैं तुझे समझाती हूं।"
"प्रोडक्शन सेंटर फॉर रेडीमेड बेबीज।" साइनबोर्ड पढ़कर चौंकती हूं मैं, "ये आप कहां ले आई हैं आप मुझे।"
"तू, आ तो सही," उनका यह स्नेह भरा संबोधन अनायास पांवों को खींच लेता है और उनके पीछे-पीछे चल पड़ती हूं। वे प्रोडक्शन सेंटर के मुख्य अधिकारी से मिलकर सेंटर देखने की इच्छा प्रकट करती हैं और एक लड़की हमारी गाइड बनकर सेंटर दिखाने ले चलती है। बटन दबाने पर एक ऑटोमैटिक द्वार खुलता है.... बहुत भारी भरकम। हमारे भीतर घुसने के बाद द्वार खुद-ब-खुद बन्द हो जाता है। थोड़ी दूर चलने के बाद फिर एक गोल ढक्कननुमा दरवाजा आता है। हम उसमें से भी पार चले जाते हैं।
"ये इतने भारी भरकम दरवाजे क्यों हैं, यहां पर? मैंने गाइड से पूछा।"
"इस सुरक्षा व्यवस्था के पीछे," मुस्कराते हुए गाइड ने कहा, "किसी दुश्मन के हमले का कोई डर नहीं है पर कुछ अदृश्य शत्रुओं से बचाव के सिर यह प्रबंध किया गया है।"
"अदृश्य शत्रु?"
"हां, हां, वायरस और बैक्टीरिया वगैरह... ये अदृश्य शत्रु ही तो हैं।"
"तो क्या हमारे साथ ये सभी सूक्ष्मजीव अन्दर नहीं आ गए होंगे?"
"नहीं, आपको पता नहीं लगा। जब आप उन दो द्वारों के बीच की छोटी गैलरी में खड़ी थीं.... तभी आप पर अल्ट्रावायलट किरणों की वर्षा हुई, जिसमें कोई वायरस या बैक्टीरिया जीवित नहीं रह सकता है।"
मैं आश्चर्य में डूबी हुई देख रही हूं.... एक बिल्कुल नई दुनिया... रेडीमेड बच्चे। मां की कोख से नहीं, परखनली की कोख से पैदा हुए बच्चे। इससे पहले कि मैं बच्चे पैदा करने वाली फैक्टरी के बारे में कुछ पूछती, गाइड ने हमें एक लिफ्ट में बैठाकर बटन दबा दिया। लिफ्ट जिस विशाल कक्ष में जाकर रुकी, वह एक संग्रहालय है-प्रयोगशाला में प्राणों के निर्माण से संबद्ध वैज्ञानिकों की आदमकद मूर्तियां! जीव विज्ञान की छात्रा होने के नाते ये सारे चेहरे मेरे जाने-पहचाने थे। ये ल्यूवैनहाक जिसने सबसे पहले सूक्ष्मदर्शी में शुक्राणु के दर्शन किए थे। फिर सर्वप्रथम जैव रसायन का संश्लेषण करने वाले वूहलर और लीबिंग, देह की इकाई-"कोशिका" के खोजी श्लाइडन और श्वान, "जीवन से ही जीवन पैदा होता है", इस सिद्धान्त को स्थापित करने वाले पाश्चर, आनुवंशिकताके नियम खोजने वाले मैण्डेल और मोर्गन। आनुवंशिकता में कृत्रिम रीति से उत्परिवर्तिन पैदा करने में सबसे अगुवा-मुलर।
फफून्दियों में आनुवंशिकता के खोजी बीडल और टाटम। जीवन के भूल यौगिक डी एन ए की संरचना के खोजी क्रिक और वाटसन तथा आर एन ए का रहस्य खोलने वाले-ओकोवा और कोर्नबर्ग, प्रौटीनों के भेदिया सांगर और पॉलिंग। इन्हीं में एक दूसरी कतार थी हाल्डेन, बर्नार्ड, कल्विन्, ओपारिन और फॉक्स की जिन्होंने जीवन के उद्भव सम्बंधी सिद्धान्तों की परिकल्पना की थी। रूस में ओपारिन ने प्रयोगशाला में जीवन के आदि रूप के निर्माण की घोषणा की और अमरीका में फॉक्स ने। इन्हीं के साथ भारत के दो वैज्ञानिक कृष्ण बहादुर और ओंकारनाथ पर्ती भी विराजमान थे, जिन्होंने प्रयोगशाला में कुछ रसायनों की सहायता से "जीवाणु" का निर्माण कर दिखाया था। यहां प्रथम टेस्टट्यूब बेबी का निर्माता एडवर्ड भी विराजमान था, सबसे अलग और भी बहुत से वैज्ञानिक दीवार से लगे चित्रों में सुशोभित हैं।
अब हम रेडीमेडशिशु-उत्पादक फैक्टरी के प्रमुख निर्माण-कक्ष में आ गए हैं, उसी लिफ्ट से एक दूसरे विशाल भवन में पहुंचाने के बाद गाइड ने बताया।
ये विविध जीनों के मिश्रण हैं। आप शिशु का उपयोग किस क्षेत्रा में करना चाहते ळें, हम आधार पर जीनों यानी वंशाणुओं के मिश्रण तैयार किए जाते हैं। सैनिक बनाना है, तो वीरता और हिंसक भावना वाले जीन! मजदूर बनाना है तो परिश्रमी और दासवृत्ति वाले जीन वैज्ञानिक बनाना है तो अत्यन्त प्रतिभाशाली जीन-इस तरह सैकड़ों किस्म के जीन-मिश्रण हैं।
गाइड आगे बताती है, "अब मान लीजिए आपने जीन मिश्रण चुन लिया तो हम उस जीन मिश्रण को तेईस पैतृक गुणसूत्रों (क्रोमोसोमों) और तेईस मातृक गुणसूत्रों में व्यवस्थित करके भ्रूण का निर्माण शुरू कर देंगे। हर सप्ताह भ्रूण असैंबली लाइन में आगे चलता रहेगा और उसकी परिवर्तन सम्बंधी आवश्यकताओं के अनुसार हर चरण पर उसको अपेक्षित पोषक द्रव्य तथा एंजाइम वगैरह मिलते रहते हैं। देखिए...।
मैंने देखा एक कतार में खिसकती हुई बातलें और हर बोतल में पलता हुआ भ्रूण!
देह का रंग कैसा हो, बाल कैसे हों, आंखें कैसी हों, नाक-कान कैसे हों...सब कुछ पूर्व निर्धारित होता है। गाइड बताए जा रही है।
"कितने दिन लगते हैं पूरा शिशु बनने में!" पूछती हूं मैं।
"पहले तो हमने वृद्धि की गति तीव्र करके तीन-चार महीने में पूरा शिशु तैयार करना शुरू कर दिया था।" पर उन शिशुओं के बारे में बाद में शिकायतें आने लगीं तो अब 9 से 11 महीने की प्राकृतिक अवधि ही प्रयोगशाला में भी आजमाई जा रही हैं।
जहां नवजात शिशुओं का परिचर्या-कक्ष बना था-वहां से हम लोग बाहर निकले तो मैंने देखा मां बार-बार रूमाल से आंखें पोंछ रही हैं।
क्या हुआ मां, बताओं न क्या बात है! मैं उन्हें इस तरह बच्चों की तरह रोते देखकर असमंजस में पड़ी हूं कि आखिर क्या बात हो सकती है।
"लिआना तुम नहीं जानती लिआना मेरा हैरिस! मेरी कौख से नहीं पैदा हुआ, वह इस कंपनी से खरीदा गया रेडीमैड बच्चा है। उसके पिता ने मेरे बहुत मना करने पर भी उसके जीन-मिश्रण में से वह जीन ही गायब करवा दिया था, जिसके होने पर प्राणी में विपरीत सैक्स के प्रति झुकाव पैदा होता है-उसके मस्तिष्क में यौन-उत्तेजना का केन्द्र ही नहीं है, लिआना। वह एक संवेदनहीन वैज्ञानिक है, जिसके लिए सभी मानव स्तनधारी जीव हैं। उसमें प्रेम नाम की कोई चीज है ही नहीं-मैं तरसती रही कि कभी मां-मां कहकर मेरे गले से लिपट जाएगा। अपनी छोटी-छोटी बांहों में मुझे बन्दी बना लेगा। पर वैसा कुछ भी नहीं हुआ। मैं जानती थी और मन ही मन डरती रहती थी, उस अभागिन लड़की के बारे में सोच-सोच कर जो कभी, जीवन के किन्हीं उत्ताप-क्षणों में इस प्रेम-ग्रन्थि से विहीन प्राणी के सामने प्रेम-निवेदन कर बैठेगी।"
"....बस करो मां, बस करो! पंक्तिबद्ध भ्रूण मेरे चारों और चक्कर काट रहे हैं, और उन भ्रूणों में से अचानक एक शिशु की आकृति उभरती है, बिल्कुल हैरिस की शक्ल का, मगर जब मैं उसको चूमने के लिए अपना मुख उसके मुख के पास ले जाती हूं तो वह थूक देता है। अचानक मुझे लगता है जैसे मेरा माथा नहीं यह बाईसवीं सदी के सितम्बर का आकाश है और उस पर लगा थूक का गोला ही सूरज बन गया है, जिसकी रोशनी अंधा किए दे रही है-मेरी आंखें मुन्द जाती हैं...।
-- डा रमेशदत्त शर्मा