बचाने वाला

"हमें यह काम हर हाल में करना होगा। इसके अलावा इस प्राबलम का और कोई हल नहीं है।" ब्रिटिश वैज्ञानिक मि. हिल्ड्रिच ने अपना चश्मा रूमाल से साफ करते हुये कहा। उन्होंने यह बात जापानी वैज्ञानिक मि0 ओसाका के समर्थन में कही थी। जबकि दूसरे साईटिस्ट इससे सहमत नहीं थे।

ये लगभग बीस विकसित देशों के वैज्ञानिकों का सेमिनार था और ये लोग इस वक्त एक गंभीर समस्या पर विचार करने के लिये एकत्रित हुये थे। पूरी मानव जाति इस समस्या से भयभीत थी और इसका कारण भी ठोस था। क्योंकि इस समय पूरी पृथ्वी का जीवन खतरे में था। पृथ्वी की आयु केवल तीन वर्ष रह गई थी। ठीक पाँच वर्ष बाद कोमेटिव नामक एक विशाल पुच्छल तारा पृथ्वी से टकराने वाला था और यह निश्चित था कि इस टक्कर के बाद पृथ्वी का समस्त जीवन नष्ट हो जाता।

प्रत्येक देश इस टक्कर को टालने की जी तोड़ कोशिश कर रहा था, और इसी सम्बन्ध में विश्व के चोटी के वैज्ञानिको का यह सेमिनार पेरिस में आयोजित हुआ था।

इस सेमिनार में पहले दिन सर्वप्रथम जापानी वैज्ञानिक मि. ओसाका ने अपने विचार रखे। उन्होंने पृथ्वी पर उपस्थित एटम बम्बस को इस्तेमाल करने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि एटम बम्बस को अंतरिक्ष यानों की मदद से कोमेटिव के तल में फिट करके विस्फोट द्वारा छोटे छोटे टुकड़ों में बाँटा जा सकता है। इस प्रकार जब ये छोटे टुकड़े पृथ्वी से टकराएंगे तो कोई विशेष हानि नहीं होगी।

इस प्रस्ताव का समर्थन दो तीन वैज्ञानिकों ने किया किन्तु अमेरिकन वैज्ञानिक प्रोफेसर हिल ने इसको विरोध करते हुये कहा,"यह संभव नहीं है। क्योंकि इस तरह के विस्फोट से घातक रेडियोएक्टिव किरणें पृथ्वी के आसपास फैल जायेंगी और इसका जो असर पृथ्वी के पर्यावरण पर पड़ेगा वह किसी भी प्रकार कोमेटिव की टक्कर से कम नहीं होगा।

"हम हाईड्रोजन बम का प्रयोग करें तो कैसा रहेगा ?उसमें रेडियोएक्टिविटी का कोई खतरा नहीं होगा।" एक फ्रांसीसी वैज्ञानिक ने मि0 ओसाका के पक्ष में अपनी बात रखी।

"यह भी संभव नहीं है।" रूसी वैज्ञानिक ने कहा, "वास्तव में कोमेटिव पृथ्वी के इतना करीब है कि हम ये उपाय नहीं अपना सकते। अगर हाईड्रोजन बम इस्तेमाल होगा तो उसके विस्फोट से उत्पन्न ऊर्जा पृथ्वी के वायुमंडल से ओजोन परत नष्ट कर देगी। फिर सूर्य से आने वाली परबैगंनी किरणें तथा कास्मिक किरणें बगैर किसी रूकावट के पृथ्वी के जीवों को नष्ट कर देंगी।"

फिर काफी देर तक इस समस्या पर विचार विमर्श होता रहा किन्तु कोई ठोस हल नहीं निकल सका। फिर यह मीटिंग अगले दिन के लिये स्थगित कर दी गयी। इस तरह पृथ्वी के जीवन में एक दिन और कम हो गया।

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होटल पैराडाइज़ के एक कमरे में भारतीय वैज्ञानिक प्रोफेसर भटनागर का निवास था। प्रोफेसर भटनागर अभी अभी सेमिनार में शामिल  होकर आये थे। दूसरे वैज्ञानिकों की तरह इनके मस्तक पर भी चिंता की रेखायें साफ दिख रहीं थीं। कमरे में पहुँचकर वे एक कुर्सी पर बैठ गये और कुछ सोचने लगे।

अचानक उनकी नज़र दायीं ओर रखी कुर्सियों पर पड़ी और वे चौंक उठे। क्योंकि उनमें से दो कुर्सियों से रौशनी फूट रही थी। अजीब तरह की रौशनी थी। लगता था जैसे रौशनी को इन्सानी जिस्म में ढालकर कुर्सी पर रख दिया गया है।

"यह क्या है ?" आश्चर्य के साथ उनके मुँह से निकला। उन्होंने देखा कि कुर्सियों के प्रकाश पुंज हिल डुल रहे थे। लेकिन उनका आकार नहींं बिगड़ रहा था। लगता था कुर्सी पर बैठे मानव हिल डुल रहे हों।

वैज्ञानिक होने के नाते प्रोफेसर भटनागर भूत प्रेतों को नहीं मानते थे। पहले तो उन्होंने उसे अपनी आँखों का भ्रम समझा लेकिन जब रौशनी  का दायरा काफी देर तक स्थिर रहा तो वे सच्चाई जानने के लिये कुर्सियों की तरफ बढ़े। उसी वक्त उन्हें लगा कि कोई उन्हें पुकार रहा है। " प्रोफेसर भटनागर !"

वे चौंक कर इधर उधर देखने लगे, लेकिन आसपास कोई नहीं था। कमरे में पूरी तरह सन्नाटा छाया था। लेकिन तभी फिर किसी ने उन्हें सम्बोधित किया। इस समय उन्हें आभास हुआ कि यह आवाज़ उनके मस्तिष्क में गूंजी थी।
"यह आवाज़ कैसी है ?" वे बड़बड़ाये।

"यह मैं बोल रहा हूँ। जिसे तुम कुर्सियों पर बैठा देख रहे हो।" आवाज़ ने कहा।

"कुर्सियों पर ?लेकिन कुर्सियों पर तो सिर्फ रौशनी का दायरा है ?" प्रोफेसर भटनागर आश्चर्य से बोले।

"वह रौशनी का दायरा  नहीं है, बल्कि मेरा प्रक्षेप्य है। और उसी के माध्यम से मैं तुमसे बात कर रहा हूँ ?"

"लेकिन तुम कौन हो ?" प्रो0 भटनागर ने पूछा।

"मैं भी इसी पृथ्वी का प्राणी हूँ। किन्तु ऐसा प्राणी जिसे पृथ्वी के किसी भाग में नहीं खोजा जा सकता। दरअसल मैं इस युग का नहीं हूँ।"

"क्या मतलब ?मैं समझा नहीं।" प्रो0 भटनागर बोले।

"मैं पूरी बात बताता हूँ। बात यह है कि मैं भविष्य से आया हूँ अर्थात तुम्हारे समय से डेढ़ हज़ार वर्षो बाद मेरा जन्म हुआ है और मैं समय यात्री हूँ।" उसने कहा।

"तुम्हारा मतलब है कि तुम इस समय से डेढ़ हज़ार वर्ष बाद के प्राणी हो।"

"हाँ ! तुम्हारे समय में भी टाइम मशीन बनाने की कोशिश की जा रही है। जिसके द्वारा इस युग के वैज्ञानिक भविष्य तथा भूतकाल की यात्रा करने की सोच रहे हैं। तुम यह समझ लो कि हमारे युग में टाइम मशीन का आविष्कार किया जा चुका है और उसके द्वारा हम भूतकाल की यात्रायें भी कर सकते हैं। जैसा कि इस समय हम मौजूद हैं।"

"लेकिन तुम कहाँ से बोल रहे हो ? सामने क्यों नहीं आते। "प्रो0 भटनागर ने पूछा।

"मैं तुम्हारे सामने नहीं आ सकता। क्योंकि मेरा वास्तविक शरीर तुम्हारे युग से लगभग डेढ़ वर्ष भविष्य में है। वास्तव में मेरे युग में जो टाइम मशीन बनाई गयी है उसके द्वारा वास्तविक शरीर समय की यात्रा नहीं कर सकता। बल्कि केवल उसका प्रकाशीय प्रतिविम्ब ही समय यात्री बन सकता है। इस समय वही प्रतिविम्ब तुम्हारे सामने कुर्सियों पर उपस्थित है। ये प्रतिविम्ब मेरे व मेरे साथी के हैं।

अब ये सब बातें छोड़ो ! तुम यह ज़रूर जानना चाहोगे कि मैंने तुमसे क्यों सम्पर्क स्थापित किया। क्योंकि इससे पहले भी हम समय यात्री रहे हैं किन्तु किसी प्राचीन मनुष्य से यह हमारा पहला सम्पर्क है।" उस अज्ञात व्यक्ति ने कहा।

"हाँ। मैं यह ज़रूर जानना चाहूँगा कि तुमने मुझसे क्यों सम्पर्क स्थापित किया।" प्रो0 भटनागर ने पूछा। अब उनके चेहरे पर विस्मय की रेखायें नहीं थीं।

समय यात्री ने जवाब में कहा, "तुमसे सम्पर्क स्थापित करने का कारण वह समस्या है जो तुम्हारे काल में पूरी पृथ्वी के सामने विकराल रूप में खड़ी है, अर्थात कोमेटिव की पृथ्वी से टक्कर। जिसके बाद पृथ्वी नष्ट हो जायेगी। यह समस्या हमारे लिये भी गंभीर है, क्योंकि यदि यह टक्कर हो गयी तो सम्पूर्ण पृथ्वी का जीवन नष्ट हो जायेगा और फिर हम लोग भी पैदा नहीं हो सकेंगे। इसीलिये इस समस्या का हल अति आवश्यक है।"

"क्या तुम लोंगो के पास इस समस्या का कोई हल है ?" प्रो. भटनागर ने पूछा।

"हाँ ! और वही मैं बताने जा रहा हूँ। तुम्हारे पास ऐसे उपकरण और राकेट मौजूद हैं। जो किसी छोटे मोटे ग्रह को कुछ देर के लिये उसकी कक्षा में स्थिर कर दें। मेरी योजना यह है कि पृथ्वी के उपग्रह अर्थात चंद्रमा को इन राकेटों की सहायता से कुछ देर के लिये उसकी कक्षा में स्थिर कर दिया जाये। इस प्रकार हम चन्द्रमा को उस समय कोमेटिव के सामने ला सकते हैं जब वह पृथ्वी से टकराने वाला हो। इस प्रकार कोमेटिव पृथ्वी से टकराने के बजाये चन्द्रमा से टकरा जायेगा और पृथ्वी को कोई हानि नहीं पहुँचेगी।" उस भविष्य के मानव ने कहा।

"तुम ठीक कहते हो। लेकिन चन्द्रमा को कितनी देर के लिये कक्षा में स्थिर किया जाये, इसमें सटीक गणना  की ज़रूरत होगी। और इस गणना में एक सूक्ष्म गलती भी पृथ्वी को प्रलय से नहीं बचा सकेगी।" प्रो0 भटनागर ने अपनी शंका सामने रखी।

"इसके बारे में पूरी कैलकुलेशन हमारे समय में की जा चुकी है और जो निष्कर्ष निकाले गये हैं वह मैं तुम्हें बता रहा हूँ। इसे तुम अपनी नोटबुक पर लिख लो।" उस अज्ञात भविष्यात्री ने कहा और प्रो0 भटनागर ने अपनी नोटबुक उठा ली। फिर वे भविष्यात्री के बताये हुये निष्कर्ष लिखने लगे।

"इन्हें तुम्हारे युग के वैज्ञानिक अपने कम्प्यूटरों पर चेक कर सकते हैं। उन कम्प्यूटरों पर भी इसी प्रकार के निष्कर्ष मिलेंगे।" गणनाएं लिखवाने के पश्चात भविष्यात्री ने कहा। "और अब मैं वापस जा रहा हूँ क्योंकि मेरा यहाँ आने का उद्देश्य पूरा हो गया है। लेकिन तुम्हें यह वादा करना होगा कि तुम इस मुलाकात को गुप्त रखोगे।" समययात्री ने कहा।

"लेकिन मुझे यह गणनायें लोगों के सामने रखनी होंगी और उस समय मुझे बताना होगा कि यह गणनायें तथा निष्कर्ष मैंने किस प्रकार प्राप्त किये।" प्रो0 भटनागर ने कहा।

"तुम यह कह सकते हो कि यह गणनायें तुमने खुद की हैं।" इसी के साथ कुर्सियों पर दिख रही प्रकाशीय आकृतियां गायब हो गयीं। प्रो0 भटनागर ने अपनी आँखों को मला। उन्हें यही लग रहा था मानो वे सपना देखते देखते अचानक जाग उठे हों।

अगले दिन सेमिनार में प्रो0 भटनागर ने भविष्य यात्री द्वारा बताया गया हल वैज्ञानिकों के सामने प्रस्तुत किया। वह एक अछूता विचार था और दूसरे वैज्ञानिक इसको स्वीकार करने में असमंजस में थे।

"प्रोफेसर भटनागर, क्या आपको पूरा विश्वास है कि आपकी गणनायें शत प्रतिशत सही हैं ?" अमेरिकन वैज्ञानिक प्रो. हिल ने पूछा।

"इन गणनाओं पर मुझे उतना ही विश्वास है, जितना इस बात पर कि मेरे दो हाथ हैं। अगर आप लोगों को इस बारे में कोई शंका हो तो आप इन्हें अपने कम्पयूटरों पर परख सकते हैं।" प्रो0 भटनागर ने कहा।

आपका सोल्यूशन सभी में बेस्ट है। हम लोग इन गणनाओं को परखने के बाद इनका इस्तेमाल करेंगे।" ब्रिटिश वैज्ञानिक ने कहा और मीटिंग समाप्त हो गयी।

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फिर विश्व के पाँच देशों में चन्द्रमा को स्थिर करने के समय की गणना हुई और सभी स्थानों पर पर समान परिणाम आया जो प्रो. भटनागर के हल के पूरी तरंह अनुरूप था। उसी समय से चन्द्रमा को स्थिर करने के लिये तैयारियाँ शुरू हो गयीं। थोड़े समय पश्चात पाँच बड़े अन्तरिक्ष यान तैयार हो गये जिन्हें चन्द्रमा के पास भेजा जाने वाला था। एक निश्चित समय पर इन्हें चन्द्रमा की कक्षा में भेज दिया गया। फिर लोगों ने विज्ञान का एक और चमत्कार देखा। इन अन्तरिक्ष यानों ने अपनी आकर्षण शक्ति से चन्द्रमा को उसकी कक्षा में स्थिर कर दिया था और ऐसा इतिहास में पहली बार हुआ था।

एक निश्चित समय तक चन्द्रमा को उसकी कक्षा में स्थिर कर दिया गया फिर अन्तरिक्ष यानों को पृथ्वी पर वापस बुला लिया गया। अब वैज्ञानिक कोमेटिव के पास आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। बड़े देशों सहित प्रत्येक देश की वेधशालाओं द्वारा कोमेटिव की एक एक हरकत पर नज़र रखी जा रही थी।

फिर वह भयंकर दिन आ गया जब कोमेटिव चन्द्रमा से टकराया। यह एक भीषण टक्कर थी जिसके फलस्वरूप चन्द्रमा दो टुकड़ों में बंट गया। इस टक्कर में कुछ छोटे टुकड़े पृथ्वी के वायुमंडल में भी पहुँचे किन्तु घर्षण के कारण जल गये।पृथ्वी पूरी तरह बच गयी। लोग सड़कों पर निकलकर जश्न मनाने लगे क्योंकि उनपर आने वाली प्रलय टल गयी थी। पूरा विश्व प्रो. भटनागर का आभारी था और प्रो. भटनागर स्वयं उन भविष्ययात्रियों के आभारी थे।