उसे एक बडे चोरी के सिलसिले में गिरफतार किया गया था । रकम इतनी बडी और चोरी का तरीका इतना बुद्धिमता भरा था कि यह दुनिया भर की जॉंच एजेन्सियों को मुंंहं चिढा रहा था। साथ ही साथ उन सभी लोगो को अपने उस निर्णय पर सोचने को विवश कर दिया जो नवीन तकनीकों को चार कदम आगे बढ कर अपनाते हैंं।
चोरी एक बैंक में हुई थी। यह एक अन्तर्राट्रीय बैक था। बैंक के प्रबन्धन तन्त्र ने बैंक को अत्याधुनिक तकनीकों से युक्त कर रखा था। बैंक में कोई भैतिक ताला नहीं लटकता था। सारे दरवाजें और लाकर इलेक्ट्रानिक कोड से संचालित होते थे। बैंक बंद होने के बाद भी बैंक में कोई चौकीदार नहीं होता था बल्कि बैंक की सुरक्षा खुफिया कैमरे और प्राणधतक किरणों के हवालें कर दिया जाता था। खुफिया कैमरों की मदद से केन्द्रीय कक्ष में बैठे सुरक्षाकर्मी कई बैंको की गतिविधियो की निगरानी एक साथ करते थे।
परन्तु चोर इससे भी ज्यादा उच्च तकनीक का इस्तेमाल करने वाले निकले। चोरों ने घातक किरणों को उत्सजित वाली मशीन के लिये एक ऐसा साफ्टवेयर उपयोग किया जो बंद होने पर भी यह संकेत देती रही कि वह लगातार किरणें उत्सजित कर रही है। कैमरों को उन लोगो ने ऐसे रिकार्डिग से जोड दिया जा हू-ब-हू बैंक के लाकर को दिखा रहा था। कमाल तो यह था कि वे इसके लिये बैंक के उन उपकरणे से काई छेड-छाड नहीं की बल्कि यह सारा काम उच्च तकनीक कम्पयूटर को सेटेलाइट से जोड कर अंजाम दिया। उसके बाद चोरों ने बैंक के कोड को बडी आसानी डिकोड करके बैंक में आसानी से प्रवेश कर गये।
वह नवम्बर की कोई तारीख थी जब पवन को गिरफ्तार किया गया था। उसे चारी से पहले बैंक के पास संदिग्ध अवस्था में कई बार शाम के वक्त टहलते हुए कैमरे की रिकार्डिग में देखा गया था। उसे मात्र शक के आधर पर पूछ-ताछ के लिए गिरफ्तार किया गया था। पवन पेशे से शिक्षक था पर पिछले चार वर्षों से वह विद्यालय जाना लगभग छोड दिया था। यदि कभी -कभार विद्यालय चला भी जाता तो बच्चो से दूसरी दुनिया (परिष्कृत समाज) और भविष्य की बात करता था। और लोगो से भी उसका व्यवहार इन पिछले चार सालो में सामान्य नहीं रह गया था। अपनी पत्नी से भी उसका लगभग अलगाव हो गया था। पुलिस द्वारा पूछ-ताछ में भी पवन या तो प्राय: शान्त ही बना रहा या अनभिज्ञयता जताता रहा। तब अधिकारियों ने उसके ब्रेन मैपिग करने का निण्रय लिया।
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ब्रेन मैपिग वह तकनीक है जिसके द्वारा किसी के मस्तिष्क को पढा जाता है कि उस अपराघ से उसका संबन्द्ध है अथवा नहीं जिस अपराध में उसे आरोपित किया गया है। मानव मस्तिष्क अपने सामने हुई किसी भी घटना को रिकार्ड के रूप मेअपनी मेमोरी में संग्रहित कर लेता है। जब किसी घटनाक्रम के बावत उस व्यक्ति से पूछताछ की जाती है और यदि उस घटनाक्रम सें उसका संबन्द्ध रहता है तो संग्रहित जानकारी उसके मस्तिष्क में चलचित्र की तरह तैरने लगता है। यह स्थिति ब्रेन मैपिंग तकनीक में कम्पयूटर की सहायता से उजागर हो जाती है।
जॉंच के दौरान कथित अपराधी के सिर पर ई.ई.जी. सेंसर लगाकर कुर्सी पर बैठा दिया जाता है। यह सेंसर कम्पयूटर से जुडा होता है। तत्पश्चात उस व्यक्ति के सामने रखे मानिटर या पर्दे पर अपराध से संबन्धित दृश्य चलाये जाते हैं। दृश्य के साथ ही एक व्यक्ति कथि अपराधी की मातृभाष में कमेंट्री भी करता चलता है। जहिर है जब सामने बैठे व्यक्ति की आँखें जाने-पहचान व्यक्ति, घटना, दृश्य, या आवाज को देखेगा-सुनेगा तो मस्तिष्क में एक खास तरह की तरंग पैदा होगी। यदि सामने बैठा व्यक्ति का उस अपराध से कोई वास्ता होगा तो अवश्य ही उससे जुडे दृश्यो, व्यक्तियों, घटनाओं या आवाजों से उसके मस्तिष्क में प्रतिक्रिया होगी। उसके माथे पर चिपके सेंसर इस प्रतिक्रिया को दर्ज कर कम्पयूटर पर डिस्पले कर देंगें।
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बाहर से वह गुफा सा दिखाई दे रहा था। उसका संंकरा प्रवेश द्वार घुप्प अंध्कारमय था। लगभग 200 मीटर टेडे-मेढे रास्ते से गुजरने के बाद उनकी ऑंखें फैल गयी, मुंंह से अक्स्मात ही बोल फूट पडे- अदभुत ! वाकई नजारा ही कुछ ऐसा था। वे कुछ उंचाई पर खडे थे। उनके सामने से चौडी सीढी नीचे उतर रही थी, जहॉं दो फुटबाल के मैदान जितना स्थान था। मैदान के बाद एक अत्याधुनिक कालोनी थी। परन्तु यह सब किसी भी तरह से इस धरा की कृति नहीं लग रहा था। ऊपर आसमान में तारें और निहारिकाओं की टिमटिमाहट बडी अलौकिक थी। पूरा आसमान मंद गति से तैरता हुआ प्रतीत हो रहा था। वातावरण में खुशबू और धीमा मधुर संगीत विद्यमान था। उन दोनो ने महसूस किया कि इस युगंधित एवं संगीत मय वातावरण में एक मदमस्त खुमारी सी है जिसकी गिरफ्त में वे जकडते जा रहे हैं।
उनके सोचने की क्षमता भी शिथिल पडती जा रही थी। मैदान के पूर्वी छोर पर एक टावर नुमा निर्माण था जो किसी भी दृष्टि से इस धरा के निर्माण से मेल नहीं खा रहा था। टावर के शीर्ष भाग पर रह-रह कर सतरंगी प्रकाश पुजं झलक उठता था। उसी से सटे धनाभ के आकार के कुछ और निर्माण थे। उसमे हल्का नीला दुधिया प्रकाश तैर रहा था। उसके आस-पास कुछ मानव आकृतियाँ भी गतिशील थी पर उनका कद साढे तीन फुट ही था। उन दोनो के लिए यह बिलकुल रहस्मय संसार था। उनके शरीर में झुरझुरी सी होने लगी। तभी कुछ प्रकाश पुजं आसमान से उतरते हुए टावर में समा गए। उनके आने से क्षण भर के लिए तेज प्रकाश हुआ था जिससे उस संसार के कुछ और नजारे उन्हें क्षण भर के लिए दिखा था। उन्के शरीर में कंपकपाहट होने लगी। लगभग इसी तरह का सारा दृश्य तो उन लोगो ने पवन के ब्रेन मैपिंग के आधर पर निर्मित फिल्म में देखी थी। वे विस्मय से एक दूसरे का मुंंह देखने लगे। वे एक दूसरे से कुछ कहने ही वाले थे कि उनके सामने पवन आ खडा हुआ। उनके मुहंं से एक तेज चीख निकली और वे अचेत हो गए।
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"मैं यह कैसे विश्वास कर लूंं कि आप जो कह रहे हैं वह ठीक है जबकि न तो आप अपने पक्ष में कोईसबूत दे पाये हैं और न ही उस स्थान को ही चिन्हित कर पाये हैं, जबकि इसके लिए आप तीन बार प्रयास कर चुके है। " लम्बे कद-काठी का एक आकर्षक व्यक्तित्व का धनी दो व्यक्तियो को लगभग डाटने वाली मुद्रा में बात कर रहा था।
वह चार सदस्यीय उस जॉंच दल का मुखिया था जिसका गठन उस को सुलझाने के लिए किया गया था। दरअसल उस बैंक डकैती के बाद पुलिस अपने अथक प्रयास के बाद भी को नतीजा नहीं दे पायी थी जिस कारण यह केस देश के सबसे प्रतिष्ठित जॉंच एजेन्सी को सौंप दिया गया। इस जॉंच दल में चार सदस्य थे जिसमं से एक मनोविज्ञानी होने के साथ-साथ ब्रेनमैपिंग का विशेषज्ञ भी था। चीफ, डिप्टी कमिश्नर रैक का अधिकारी था और शेष दो उसके अधिनस्थ अधिकारी थे जिनको अपने क्षेत्र का व्यापक अनुभव था। टीम ने सबसे पहले पवन के ब्रेन मैपिग के आधार पर निर्मित फिल्म देखी और निर्णय लिया कि पवन की हर गतिविधि पर नजर रखी जाय। ऐसे में एक दिन जब वे दोनो पवन के पीछे लगे थे तो ऐसी जगह पहुंंच गए जो उनके लिए अनदेखी और अनोखी दुनिया थी। उस दुनिया में पहुंंच कर वे कुछ समझ पाते कि...।
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जब उन्हें होश आया तो वे एक व्यस्त सडक से सटे एक निर्जन पार्क में थे। कुछ बदहवास, कुछ नीम बेहोशी की हालत में वे घन्टो पार्क में बैठे सुस्ताते रहे। सामान्य होने में के बाद कार्यलय पहुंंच कर उन्होंने सारी बातें चीफ को बताई। चीफ ने पहले उन्हें आग्नेय नेत्रों से घूर देखा फिर उन्हें इस बात का प्रमाण लाने को कहा। उन्होंने यह भी जोडा कि वे उस स्थल को भी खोज कर बतायें। चीफ के लहजे से साफ झलक रहा था कि वे उन दोनो को किसी नमूने की तरह ले रहे थे। चीफ के आदेशानुसार वे काफी मनन-चिंतन के बाद भी उस स्थान का कोई अनुमान नहीं लगा पाये, जबकि उन्हें यह ठीक से याद था कि पवन पर निगरानी रखने के दौरान उन्हें शहर से दूर पठारी इलाके तक जाना पडा था। जब उतरते पठारी ढलान के दायी ओर उठे नुकीली चोटी की ओट में पवन ने अपनी गाडी रोक दी तो मजबूरन उन्हें भी अपनी गाडी रोक कर पैदल ही चलना पडा। लगभग दो किलोमीटर चलने के बाद वे पवन के पीछे-पीछे गुफा में घुसे थे। परन्तु बाद में बार-बार खेजने पर भी उन्हें वह गुफा नहीं मिली। उन्होंने जहॉं गाडी खडी की थी उसके आगे वे भटक जा रहे थे। अपनी असफलता की कहानी जब उन दोनो ने चीफ से कही तो वे भडक उठे और उन दोनो को लगभग डॉटने वाली मुद्रा में बोल रहे थे।
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चीफ की ऑंखें हैरानी से फैलती चली जा रही थी। वह अपने अधिनस्थ उन दोनो अफसरों की ब्रेन मैपिंग की फिल्म देख रहा था। वह यह फिल्म चौथी बार देख रहा था। वह इस बात को लेकर हैरान ही नहीं बल्कि आतंकित भी था कि क्यों और कैसे उन अफसरो की ब्रेन मैपिंग हू-ब-हू पवन की ब्रेन मैपिंग से मेल खा रहे थे और उन अफसरो द्वारा जो कुछ भी देखा, बताया गया वह सत्य है। एक से एक जटिल मामले की गुत्थी सुलझा लेने वाले चीफ के माथे पर पसीना चुहचुहा आया। दरअसल उन अफसरो के दिमाग पर वह घटना इस कदर हावी था कि वे समय बेसमय उसी की बात करते हुए उसमे डूबे से रहते। इसी कारण से चीफ ने उनकी ब्रेन मैपिंग करा के उसकी सत्यता जानने का ठोस निर्णय लिया। और जब चीफ ने रिपोर्ट देखी तो ...। चीफ ने सिस्टम आफ कर दिया। सारी बत्तियॉं बुझवा दी। मन में अजीब बवंडर चल रहा था। पैर फैलाकर कुर्सी पर उतान होकर वे उस बवंडर को गुजर जाने के लिये बैठ गए। पर हफ्तो गुजर जाने के बाद भी उस वैचारिक बवंडर और झंझवातो से उन्हें छुटकारा नहीं मिला तो वे अपने एक मनो चिकित्सक मित्र से परामर्श किया। उसने उन्हें कुछ दिन प्राकृतिक सौन्दर्य से ओत-प्रोत जगह पर छुट्टी बिताने की सलाह दी।
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फूस और बॉस से बने गोल छप्पर के नीचे आराम कुर्सी पर लेटे कर लगभग घंटे भर से चीफ समुन्द्र का नजारा ले रहा था। धूप सुखद थी। समुन्द का नीला, साफ जल अपेक्षाकृत शान्त था।
"हैलो, कैसे है?" बगल में छांव के लिए छतरी लगा रहे व्यक्ति ने पूछा तो उनकी तन्द्रा भंग हुई। "वैचारिक झंझवातो से जूझते आ रहे है। " उसने आगे जोडा।
चीफ की भवें तन गयी। मन में घूम रहे बवंडर ने दिशा बदल ली। "कौन हैं आप?" चीफ ने कुछ अधीरता से पूछा।
व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान थिरक आयी। "कूल डाउन, कूल डाउन......मैं कोई जादूगर नहीं हूंं,आप ही की तरह का इंसान हूं। "
"पर...." चीफ अब भी असमंजस में था।
"किसी के मस्तिष्क को पढना कोई मुश्किल काम नहीं है। यह ठीक वैसे ही विज्ञान है जैसे नाडी देख कर कोई वैध किसी मरीज के शरीर का पूरा हाल जान लेता है। " उस व्यक्ति ने बडी सहजता से कहा। चीफ उसकी बात पर हतप्रभ था। तीन चार घंटे क सानिघ्य के बाद चीफ उस व्यक्ति से खासा प्रभावित हो गया।
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शाम को पूर्व योजना के तहत वे होटल के बार में मिले। दोपहर के चार पॉंच घंटे का उसका सानिध्य चीफ पर बडा जबरदस्त प्रभाव छोडा था। वह अपने कमरे में लौटने के बाद से ही शाम होने का इंतजार करने लगे थे। पैग के साथ शुरू हुआ हल्के बात-चीत का दौर दो पैग तक आते-गभीरता में बदलने लगा।
"दोपहर से ही तुम मेरे बारे में जाना चाहते थे। मै अपने बारे मे सब कुछ बताऊँगा। " दूसरे पैग का आखरी घूंंट गले से नीचे उतारते हुए उसे कहा। "शुरू से ही मैं स्वतंत्र प्रवृत्ति का बडा जिज्ञासु व्यक्ति थ। अपनी इसी प्रवृति के कारण्। में लेखन और पत्रकारिता के क्षेत्र में कैरियर बनाया। सफल भी रहा। पर दस साल पहले एक दिन अचानक मुझे अपने इस प्रोफसन से ऊब सी हो गयी। " बालते हुए उसने एक पैग के लिए इशारा किया। "लिहाजा मैने कुछ नया करने को ठाना। मैने उन रहस्यो को वैज्ञानिक तरीके से सुलझाने की बात सोची जो अब तक अनसुलझे थे। यह करने के पीछे एक कारण यह भी था कि मैने एक पुस्तक लिखी थी- 'अनुसुलझे रहस्य'। इस पुस्तक को लिखने के लिये मुझे सबसे ज्यादा मेहनत करनी पडी थी और सबसे ज्यादा रोमांच भी इसी को लिखने में मुझे हुआ था। " उसने चीफ की ओर देखा। चीफ पूरे मनोयोग से उसे सुन रहे थे। उसने चीफ से अपना गिलास उठाने का इशारा किया और स्वय अपना गिलास उठाकर दो घूंंट हलक से नीचे उतरने दिया।
"मै इसके लिए उन-उन जगहों पर जाने का विचार बनाया जहॉं से ये रहस्य जुडे थे। सबसे पहले मै दक्षिणी अमेरिका के उस वर्षावन की ओर गया जहॉं के बारे में मैने अपनी पुस्तक में लिखा था कि यहॉं इस दुनिया से परे एक दूसरी सभ्यता का अस्तित्व है। हालॉंकि अपनी लिखी बात पर मुझे भी भरोसा कम ही था। पर वहॉं के स्थानीय मूल निवासियो द्वारा इस बात की पुष्टि के कारण मन के एक कोने में यह भी रहता था कि हरता था कि हो सकता है, ऐसा हो। मै महीनो उस वर्षावन मे भटकता रहा। एक दिन एक तीखे मोड वाले पहाडी ढलान से उतरते हुए मैने सामने की पहाडी पर कुछ बच्चों करे चढते हुए देखा। पीछा करते हुए जब वे एक संकरी गुफा मे घुसे तो साहस करके मै भी उसमें प्रवेश किया। लगभग 20 मीटर घुप्प अंधेरे मे चलने के बाद रोशनी नजर आने लगी।
गुफा पार कर लेने के बाद काफी ऊंंचे पहाड और हरियाली का पसरा साम्राज्य मिला। पर वह यह दुनिया नहीं थी, एक दूसरी ही दुनिया थी वह। सुगन्धित एवं संगीतमय उस वातावरण को आज तक भूल नहीं पाया हूंं मैं। मैं खुशी से पागल हो गया था-एक रहस्य को सुलझा लेने वाली खुशी से, एक नई दुनिया को खोज लेने की खुशी से। " इस कथन के साथ उस व्यक्ति के चेहरे पर खुशी साफ-साफ झलकने लगी थी। पर चीफ की बडी असमंजस एव विस्मयपूर्ण स्थिति थी। जिन बातो से पीछा छुडाने के लिए वह यहॉं एकान्त में भाग कर आया था, वे बातें भी साथ-साथ चली आयी। चीफ के चेहरे पर असमंजस का भव देख कर उस व्यक्ति ने पूछा-"क्या हुआ?"
"कुछ नहीं.........कुछ नहीं" चीफ ने कुछ हडबडा कर कहा।
"पर मेरी वह खुशियॉं क्षणिक थी। अगले ही पल चार-सवा चार फुट के, अच्छी शारीरिक सैष्ठव वाले पचास लोगो ने मुझे घेर लिया। फिर मुझे पता नहीं कि आगे क्या हुआ। ऑंख खुली तो मुझे लगा कि महीनो बीत चुके है। मैं किसी बंधन में नहीं रखा गया था पर मुझे लगता कि एक पहरा सदैव मेरे साथ रहता है। मैं हमेशा वहॉं से भागने के फिराक में रहता और मौके-बेमौके कई प्रयास भी किया पर पर नतीजा हमेशा सिफर ही रहा। वह न जाने कैसी दुनिया थी कि कितना भी भागते जाओ रास्ता वहीं पहुच जाता था जहॉं से आप चले थे। थक हार कर मैंने भागने का फैसला छोड दिया। अब मेरे पास बहुत ही सीमित विकल्प थे। मैंने यह तय किया कि उनके साथ रहते हुए उनकी तथा उनकी दुनिया को समझू फिर कोई निर्णय लूंं।
"मेरे अंदर यह साहस इसलिए भी आया क्योकि वे किसी तरह भी स्तर पर हिंसक नहीं थे। उनके बीच रहते हुए बहुत जल्दी ही मैंने दो बाते महसूस की। पहला कि उनका आपस में कोई संवाद नहीं होता है। कभी-कभी उनके मुहंं से हल्की सी अस्पष्ट आवाज निकल जाती थी। दूसरा यह कि मैं उनके लिए गिनीपिग था। वे सब मेरे व्यवहार, मेरे तौर-तरीकों का परीक्षण कर रहे थे। परन्तु बहुत जल्दी ही मुझे पता चल गया कि उनका आपस का संवाद का तरीका बडा परिष्कृत है। वे एक दूसरे के मन में उठने वाले विचारो को पढने में सक्षम थे। एक तरह से कहें तो वे मन को पढने में सक्षम थे। यहॉं तक कि वे मेरे मन में उठने वाले विचारो से भी परिचित हो जाते थे। जब उन्होंने मुझे मानस संवाद के लिए प्रशिक्षित करना शुरू किया तो, धीरे-धीरे उनसे मेरा भावनात्मक लगाव होता चला गया। पर शीध्र ही मुझे यह ज्ञात हो गया कि यह प्रशिक्षण मुझे अपनाने के लिए नहीं अपितु मुझ पर यह एक प्रयोग है। लेकिन सच्चाई एकदम एसी नहीं थी। वे बहुत ही अच्छे और भले लोग थे। यह बात मुझे तब पता चली जब मैं उन्हीं के सिखाये गये विद्या से उनके मन के अंदर झॉंका।"
चीफ का रोमांच बढता जा रहा था। पर असमंजस की स्थिति अब भी बरकरार थी। जबकि वह व्यक्ति प्रसंग सुनाते हुए उन समयो में आ-जा रहा था। उसने तासरे पैग का घूंट लिया। चीफ ने भी दो घूंट लिया-"फिर आप आये कैसे?"
चीफ के इस प्रश्न पर उस व्यक्ति ने गहरी सांस ली। "यही तो अच्छाई है उस सभ्यता की कि, वे 'जीयो और जीने दो के सिद्धान्त पर विश्वास करे हैं। वे मुझे मेरी दुनिया में वापस भेजना चाहते थे पर मैं लौटना नहीं चाहता था। उन सबने इसके लिए कई जतन किये पर सब बेकार गया क्योकि उनके मन की बात मै बहुत आसानी से जान लेता था। अत: एक दिन जब मै सो रहा था तो मुझे कुछ सुंघा कर बेहोश कर दिया गया, फिर मुझे मेरी दुनिया में वापस छोड दिया। होश आने पर मै यह समझ चुका था कि वे अपने मकसद में कामयाब हो गए हैं पर मैने भी हिम्मत नहीं हारी। मै लगातार दो महीने तक पुन: उनकी दुनिया में जाने के लिए हाथ पैर मारता रहा पर सब बेकार रहा। मुझे दोबारा वह रास्ता नहीं मिला।" अपनी बात समाप्त करते करते उस व्यक्ति ने चेयर पर बैठे-बैठे ही अंंगडाई ली और आगे बोला-"कहो क्या खाओगे?"
चीफ ने जबाब में असहमति में हल्का सा सर हिलाया। कुछ शराब का सुरूर और कुछ शाम का रोमांच, चीफ पर कुछ इस तरह हावी था कि, वह उस रूमानी संसार में ही विचरण करते रहे। बार से डाइनिंग टेबल पर खाना समाप्त होने तक उनके बीच कोई संवाद नहीं हुआ। खाने के बाद चांदनी रात में समुद्र तट पर टहलते हुए उस व्यक्ति ने कहा-" काश वह दुनिया एक बार फिर मुझे मिल जाए। " और अंतिम संवाद था उन दोनो के बीच।
छुटिटयों से लौटकर चीफ ने बैंक चोरी की फाइल पर अंतिम रिर्पोट लगाकर फाइल पर लिख दिया 'अन्साल्वड मिस्ट्री` और फाइल बन्द कर दी।
-- अमित कुमार