पांडियन ठीक कहता है - Page 2

रूबी हमेशा से खुले विचारों की रही है। यूं तो रूबी के बहुत सारे मित्र रहे हैं। पुरूष भी, स्त्रियां भी। उनके साथ उसके अंतरंग सम्बन्ध भी रहे हैं। पर किसी के साथ किसी बंधन में बंधना उसे कभी रास नहीं आया। तभी तो रूबी आज अकेली हैं। सक्षम और अपनी मर्जी की मालिक। जब वह किशोरी थी तब भी अपनी मर्जी से चलने की कोशिश करती थी। जवान हुई तब भी उसने किसी को भी अपने पर हावी नहीं होने दिया। उसकी इच्छायें शुरू से ही आसमान छूती थीं। कालेज के बाद उसने अपने सारे परिवार की मर्जी के खिलाफ इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने का फैसला किया। इंजीनियरिंग के पाठयक्रम में जब उसने 'एयरोनौटिकल इंजीनियरिंग' को चुना तो सबको बड़ा ताज्जुब हुआ। सबने उसे समझाया कि ये तो ऐसी ब्रांच है जिसमें पुरूषों का वर्चस्व है। इसमें महिलाओं के लिए कोई भविष्य नहीं हैं।  पर रूबी तो जिद की पक्की। उसने इसी विषय को चुना और यूनीवर्सिटी में प्रथम रही।

रूबी के माता पिता चाहते थे कि और लड़कियों की तरह रूबी शादी करे। वे भी  उसकी शादी करके अपने कर्तव्यों से मुक्त हो जायें। पर रूबी तो आजाद चिड़िया थी वह पर कटा कर बंधनों में बंध कर कैसे रहती? उसने शादी से साफ मना कर दिया।

सचमुच अपने देश में रूबी के लिये कोई भविष्य नहीं था इसलिये उसने विदेश की राह पकड़ीं वहां `एयरोस्पेस इंजीनियरिंग´ में उच्च शिक्षा प्राप्त करके उसे `नासा स्पेस रिसर्च सेन्टर´ में काम मिल गया।  आज वह एक वरिष्ठ वैज्ञानिक है और उन सम्भावित उम्मीदवारों में से है, जिन्हें अंतरिक्ष यात्रा पर जाने का अवसर मिल सकता है।
 
कैरियर के पीछे भागते भागते समय कब रूबी की पकड़ से फिसल गया, पता ही नहीं चला। रूबी अब 35 वर्ष की हो गयी है। अब तो उसे तरह से रूबी में कोई रूचि भी नहीं लेता। हर चीज का एक वक्त होता है।

अचानक इतने वर्षों बाद ये इच्छा न जाने कहां से सिर उठाने लगी, रूबी में। एक बच्चे की इच्छा (वह भी वैसा, जैसा वह चाहती है। स्ट्रॉंग, इंटेलीजेन्ट, टॉल, क्यूट और नीली आंखों वाला पुरूष बन सके, ऐसा बच्चा। कहां दबी पड़ी थी ऐसी इच्छा, मन के किस कोने में? इस आयु में ऐसी इच्छा का काई औचित्य भी नहीं है। पर क्या करे रूबी? हर रात उसे सपनों में दिखता है, एक गोल मटोल नीली आंखों वाला बच्चा.........मुस्कुराता उसकी ओर बांहें फैलाये।

इस आयु में बच्चा पालना वैसे किसी झंझट से कम नहीं होता पर रूबी हर हाल में इस झंझट को उठाने के लिये तैयार है।  रूबी के सामने अब दो विकल्प है। इस आयु में रूबी या तो किसी अधेड़ से शादी रचाये या फिर इस 23वीं शताब्दी की "एडवांस्ड रिप्रोडक्शन टेक्नोलोजी" की मदद ले।

रूबी को ये तो कभी रास आ ही नहीं सकता था कि किसी का उस पर अधिकार हो, कोई उस पर प्रतिबंध लगायेंं इसलिये रूबी के लिये एक ही रास्ता था "एडवांस्ड रिप्रोडक्शन टेक्नोलोजी" इससे वह अपना मनचाहा शिशु पा सकती थी।

इसमें एक लम्बी फार्म भरना होता था कि आपके शिशु में आप क्या क्या चाहते है? उसकी आंखे कैसी हों- नीली भूरी या काली, उसका रंग कैसा हो- गोरा, डार्क या गेहुंआं, उसकी वयस्क आयु की सम्भावित लम्बाई कितनी हो, उसका आई क्यू कितना हो वगैरह वगैरह।

जितने अधिक गुण आप चुनते थे उतने अधिक डॉलर आपको खर्च करने होंगे । शिशु इसमें शिशु न होकर एक "कमोडिटी" बन गया था कि बाजार गये और अपनी पसंद का खरीद लाये। `जेनेटिक इंजीनियरिंग´ के जरिये ग्राहक द्वारा चुने गये गुणों के जीन फ्र्रेगमेन्ट करके एक सब्सट्रेट क्रोमोजोम में फिट कर दिये जाते हैं। इस क्रोमोजोम को डुप्लीकेट करके ग्राहक स्त्री के खाली किये अंड में प्रवेश कराकर एक जायगोट तैयार किया जाता है जिसे या तो कृत्रिम यूटरस में विकसित किया जाता है या फिर उसी स्त्री के गर्भाशय में स्थापित कर दिया जाता है। बाकी की प्रक्रिया फिर सामान्य गर्भ धारण और प्रसव जैसी ही होती है।

अधिकतर स्त्रियों की पसंद होती है नेचुरल यूटरस में जायगोट स्थापित कराना क्योंकि इस प्रक्रिया में जायगोट के नष्ट होने या विकृत होने के खतरे काफी कम हैं। दूसरे वैज्ञानिक ये भी मानते हैं कि इस तरह से भविष्य में मां और बच्चे के बीच  इमोशनल बान्डिंग अच्छी होती है यानि उनके बची भविष्य में सम्बन्ध मधुर रहते हैं। वैसे यदि किसी स्त्री का अपना यूटरस इस कार्य के लिये उपयुक्त न हो तो वह किसी अन्य स्त्री का यूटरस किराये पर ले सकती है। पर इस दशा में पूरे गर्भ-काल भर उसे इस सरोगेट मदर की पूरी देख-भाल करनी होती है। अगर सेरोगेट मां आदत की ठीक हुई तो अच्छा वरना बहुत सारी मुसीबतें पैदा हो जाती हैं। कई बार तो आपस में झगड़ा होने पर ये सरोगेट मातायें बेहद शराब ओर सिगरेट पीनी शुरू कर देती हैं या फिर चुपके से उन दवाइयों का सेवन करने लगती हैं  जिससे बच्चे में स्थाई विकृति आ जाये।  ऐसे में या तो स्त्री को उस सरोगेट मां का गर्भ गिरवाना होता जिसके लिये वे उसे तरह तरह से ब्लैकमेल करातीं या फिर राजी ही न होतीं।  कभी-कभी पूरे गर्भ काल में सरोगेट मां की सुरक्षा करने, उसका पूरा खर्च उठाने के बाद भी सरोगेट मां उस बच्चे को अपने से अलग करने को राजी ही न होती।  ऐसे बहुत सारे मामले अदालत में पहुंचते जिसमें जीत अक्सर सरोगेट मां की ही होती । इसलिये ये सरोगेट मां वाला विकल्प चुनने के लिये स्त्रियां अक्सर तैयार ही नहीं होतीं हैं। अधिकतर स्त्रियां या तो गर्भ खुद धारण करतीं हैं या फिर कृत्रिम यूटरस वाला विकल्प चुनती हैं।

रूबी जिसे किसी के नखरे सहना मंजूर ही नहीं था वह भला सरोगेट मां वाला विकल्प कैसे चुन उसकती थी।  डाक्टरी जांच ने सिद्व कर दिया था कि उसका अपना यूटरस जायगोट स्थापित करने के लिये उपयुक्त नहीं था।

रूबी के सामने दो ही विकल्प थे एक क्लोनिंग और दूसरा आर्टीफिशियल यूटरस। क्लोनिंग से उसे अपने बच्चे में वहीं गुण मिल सकते थे जो खुद उसमें थे यानि कि दूसरी रूबी बनाई जा सकती थी।  यदि उसे अपने बच्चे ने अपनी पसंद के गुण चाहिये थे तो अंतत: उसके लिये एक ही विकल्प था और वह था कृत्रिम यूटरस। हांलांकि इसमें बच्चे के विकृत, परिवर्तित व बांडिग डिफेक्ट के खतरे थे पर रूबी तो रूबी, जो सोच लिया सो सोच लिया।

और बच्चा पैदा हो गया या दूसरे शब्दों में कहूं कि 'मेन्यूफैक्चर' हो गया क्योंकि बच्चे की पैदायश में रूबी कहीं भी शामिल नहीं थी। एक खरीदी जा सकने वाली चीज की तरह उसने सेन्टर के बिल अदा किये और बच्चे को ले आई।  हां बच्चे का नाम उसने खुद रखा 'आर्यन', श्रेष्ठ आर्य जाति का श्रेष्ठ नुमांइदा।