अगर कोई और कहता तो शायद रूबी खुद भी भरोसा नहीं कर पाती कि ऐसा हो सकता है। पर ऐसा हुआ और उसी के साथ हुआ, बेहद शर्मनाक और दुखद।
कल ही वो बात है पर ऐसा लगता है कि युग बीत गये। करीब एक बजा होगा रात का। रूबी को जल्दी सोने की आदत है इसलिये रूबी को सोये करीब चार घंटे हो चुके थे। अपने इस सरकारी अपार्टमेंट में रूबी अकेले ही रहती है। कभी-कभार उसका बेटा आ जाता है, कालेज की छुटिटयों में। तब इस घर में दो प्राणी हो जाते है।
"बेटा," आज ये शब्द दिमाग में आते ही उसका मुंह कडुवाहट से भर जाता है। हां तो कल एक बजा होगा रात का, उसके बेड़रूम के दरवाजे पर खट-खट हुई।
"कौन?" उसने अन्दर से पूछा।
"दरवाला खोलो," ये उसके अपने बेटे आर्यन की आवाज थी।
"आर्यन," वह ताज्जुब में थी कि आर्यन की आवाज को क्या हुआ? अजीब बदली सी आवाज थी आर्यन की।
रूबी तेजी से उठी और नाईटी पहने पहने ही उसने दरवाजा खोल दिया। आर्यन सामने खड़ा था।अजीब हुलिया था, लाल आंखे, बिखरे बाल।
"आर्यन, क्या बात है? "
आर्यन कुछ बोला नहीं। उसे आर्यन को, अपने बेटे को, देख कर डर सा लगने लगा। 18 साल का करीब 6 फुट लम्बा आर्यन खड़ा था, दरवाजे के बीचों बीच।
"आर्यन बात क्या है बोलते क्यों नहीं?"
आर्यन अभी भी रूबी को घूर रहा था।
रूबी को लगा कहीं आर्यन बीमार तो नही? नहीं....नहीं कहीं.... ये कोई नशा तो नहीं करने लगा। आज इस तेइसवीं शताब्दी में नशीली दवाइयों की भरमार थी। इंटरनेट के जरिये दवायें घर बैठे आर्डर की जा सकती थीं। चूंकि जीवन मूल्य धीरे-धीरे बिखर रहे थे अत: बीस के होते-होते अमेरिका के करीब पचास प्रतिशत नौजवान इन दवाओं के आदी हो जाते थे।
रूबी भले ही पिछले 25-30 वर्षों से अमेरिका में थी पर थी तो भारतीय। इस तेईसवीं शताब्दी में भी भारत उन गिने-चुने देशों में था जिनमें नैतिक मूल्यों का उतना विनाश नहीं हुआ था जितना कि इन योरोपीय देशों में या अमेरिका में। अपनी व्यस्त दिनचर्या के बीच भी उसका प्रयास हमेशा यही रहा कि आर्यन को भी वह वे नैतिक मूल्य सिखाये। पर आर्यन उसके पास रहता ही कितना है सिर्फ छुटिटयों में, कुछ दिनों के लिये।
"आर्यन तुम बीमार हो गया", रूबी ने कहा और वह आगे बढ़ी ताकि वह आर्यन का माथा छूकर देखे कि उसे कहीं बुखार तो नहीं। उसने पास पहुंच कर आर्यन की ओर हाथ बढ़ाया। आर्यन उसे अभी भी विचित्र नजरों से घूर रहा था। उसने आर्यन के माथे को हाथ लगाया ही था कि आर्यन ने उसके सीने पर हाथ रखा। एक दम से न जाने क्यों रूबी को कुछ अजीब सा लगा। हाथों का ये स्पर्श उसके बेटे जैसा नहीं था। ये स्पर्श तो एक दम अजीब था, सख्त किसी और तरह की अनुभूति जगाता, सिहराता सा। उसने घबरा कर आर्यन के हाथों को अपने सीने से हटाना चाहा पर आर्यन के हाथों की पकड़ और सख्त होती जा रही थी।
वह घबरा कर चिल्लाई, "आर्यन!"
आर्यन ने जेसे मानो कुछ सुना ही न हो।
अपने बचाव में रूबी ने पीछे हटना शुरू कर दिया पर उसके सीने पर आर्यन की पकड़ अभी भी सख्त थी। वह कुछ नहीं बोल रहा था। ऐसा लगता था कि अर्धचेतना की अवस्था में हो।
"आर्यन........लीव मी.............लीव मी........आर्यन", वह चीख रही थीं।
पर आर्यन मानों कुछ सुन ही नहीं रहा था।
पीछे हटने के प्रयास में वह पीछे और पीछे चलती गयी। आर्यन उसी अनुपात में उसके साथ आगे बढ़ रहा था। उसके सीने पर आर्यन की पकड़ वैसी ही थी, सख्त और विचित्र।
रूबी अपने बिस्तर के किनारे से टकराई और बिस्तर पर गिर गई। आर्यन उसके ऊपर लद गया। अब उसके हाथों में हरकत होने लगी थी। उसके हाथों ने रूबी केशरीर को टटोलना, नोचना और झिंझोड़ना शुरू कर दिया। रूबी बुरी तरह डर गई थी।
वह वहीं से सहायता के लिये चिल्लाई, "हेल्प, हेल्प!" पर इतनी रात को उसकी आवाज कौन सुनता और सुनता तो क्या कोई मदद को आता। ये तेईसवीं सदी थी कोई चार सौ साल पहले की उन्नीस सदी नहीं जहां एक गुहार सुनने पर लोग मदद के लिये घरों से बाहर निकल पड़ते थे।
आर्यन अब रूबी के ऊपर चढ़ा था। वह उसके कपड़े फाड़ने की कोशिश कर रहा था। अब रूबी को अपने सामने आर्यन नहीं एक बलात्कारी दिख रहा था। रूबी शिथिल पड़ती जा रही थी आखिर 52 वर्ष की अधेड़ औरत एक 18 साल के युवक के सामने कब तक टिकती। उसने नीचे दबे-दबे ही फोन करने की कोशिश की पर आर्यन ने फोन उसके हाथ से छीन कर दूर फेंक दिया। अब तक वह कुछ नहीं बोला था। सिर्फ उसके हाथ थे जो रूबी के शरीर पर हरकत किये जा रहे थे।
घबराहट और बेचारगी के उन क्षणों में न जाने कैसे रूबी को याद आया कि उसे सिरहाने बिस्तर के नीचे उसकी बेहद छोटी गन रखी है और नीचे दबे-दबे उसने निर्णय ले लिया। पलक झपकते ही गोली की आवाज गूंजी। अगले ही क्षण आर्यन बिस्तर से नीचे लुढ़क गया।
रूबी झटके उठी। आर्यन धीरे धीरे उठ कर खड़े होने की कोशिश कर रहा था। उसने अपनी बाई जांघ को थाम रखा था। गोली उसकी बाई जांघ में लगी थी या यूं कहिये रूबी ने जानबूझ कर मारी थी।
आर्यन के मुंह से घुटी सी चीख निकली थी वैसी जैसा कि जिबह होते समय किसी जानवर के गले से निकलती है। रूबी वहीं खड़ी कांप रही थी। आर्यन ने जोर लगा कर अपने को खड़ा किया और रूबी की ओर बढ़ा।
"रूक जाओ आर्यन वहीं रूक जाओ" पर आर्यन मानों कुछ सुन ही नहीं रहा था। वह आगे बढ़ा
"आई विल शूट यू," रूबी चिल्लाई।
आर्यन ने मानों कुछ नहीं सुना।
इससे पहले कि आर्यन के हाथ एक बार फिर रूबी तक पहुँचते एक गोली और चली। आर्यन गिर गया पहली बार वह चीखा, "यू पिग हेडेड ओल्ड वोमेन, यू स्लट...."
पर इन सबको सुनने के लिये रूबी वहां नहीं थीं। वह तो ड्राइंग रूम के फोन पर पुलिस कंट्रोल रूम को घटना का विवरण बता रही थी। उसके बेडरूम का दरवाजा बाहर से बंद था और बेडरूम के अंदर से आर्यन के चीखने की आवाजें आ रही थी।
रूबी ने फोन रखा और फफक कर रोने लगी।
अगले दिन अखबारों की हेड लाइन थी "एक सोलह वर्षीय पुत्र द्वारा अपनी मां के साथ बलात्कार का प्रयास", "सिक्सटीन ईयर ओल्ड रेप्ड हिज ओन मदर।
नीचे रूबी और आर्यन की तस्वीरें छपीं थीं।
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