बैलों वाली कार - Page 2


ये बीसवीं शताब्दी में प्रचलित बैलगाड़ी का संशोधित संस्करण मालूम देता था। धीरे-धीरे बहुत सारी बंद पड़ी चौपहिया वाहन निर्माता कंपनियॉं इस धंधे में आ गईं। 'बुलौक कार`  में नये-नये प्रयोग किये जाने लगे। अब चौपहिया वाहन निर्माता कंपनियॉं कार भी सप्लाई करती और इससे जुतने वाले बैल भी। इसमे जुतने वाले बैलों को चारा आदि देने की जरुरत नहीं थी। वैसे ही जानवरों का चारा जैसी फालतू की चीज उगाने के लिये उस बत्तीसवीं शताब्दी में जमीन कहां मिलती जबकि इन्सानों के भोजन की जरुरी चीजें उगाने भर की जमीन ही नहीं बची थी। इन जानवरों को भी भोजन के रुप में प्रयोगशालाओं में विकसित की गई विटामिन और पोशक तत्वों के 'क्न्सन्ट्रेट' से बनी 'लाइफ टैब्स' खिला कर ही पाला जाता था जो आसानी से हर जगह उपलब्ध थे।

इन बैलों या जानवरों के मस्तिष्क में एक छोटे से आपरेशन के जरिये एक कम्प्यूटर माइक्र्रोचिप फिट कर दी जाती थी। कार के अंदर भी एक लगा होता था। इस कम्प्यूटर से सिग्नल भेजकर कार में बैठे-बैठे ही उन बैलों के मस्तिष्क में लगी माइक्रोचिप की सहायता से उन्हें तेज चलने, धीमे चलने, रूकने, दाएंं या बॉयें मुड़ने के निर्देश दिये जाते थे जिनका वे सही-सही पालन करते थे। पर इस माइक्रोचिप का उनके पूरे मस्तिष्क पर नियंत्रण नहीं था। फिर भी वह थे तो जानवर ही, वे कभी- कभी  इस मिनी कम्प्यूटर के आदेशों को झुठला जाते। ऐसे में बैलों को वापस कम्पनी भेजना होता जहॉ या तो उनकी ये कम्प्यूटर माइक्र्रोचिप बदल दी जाती थी या फिर बैलों की नई जोड़ी ही सप्लाई कर दी जाती थी। ये बैलों वाली कारें, अब खूब प्रयुक्त होने लगीं थीं पर ये धनवानों तक ही सीमित थीं। आम आदमी में प्रचलित वाहन थी साईकिल - पैरों से चलाई जाने वाली या फिर विकलांगों द्वारा हाथों से चलाई जाने वाली साईकिल। लोग अब लम्बी यात्राएं कम ही करते। नाव यात्रा अब काफी विकसित होने लगी थी। पेट्रोलियम की समाप्ति ने लोगों के विकास के क्र्रम को पीछे की ओर, उल्टे पांव चलने को मजबूर कर दिया था।

राजू आज ऐसे ही बैलों वाली कार से अपने पिता के साथ अपने हॉस्टल से वार्षिक छुट्टी में घर लौट रहा था। सड़क थोड़ी खराब थी इसलिए उन्होंने कार में मिनी कंप्यूटर के जरिए बैलों को मध्यम गति से चलने के आदेश दे दिए थे। अचानक न जाने क्या हुआ? कार में जुते बैल भड़क उठे। इस उबड-खाबड़ सड़क पर वे बैलों वाली कार लेकर सरपट दौड़ने लगे। राजू के पिता कार में मिनी कंप्यूटर से जितना उन्हें नियंत्रित करने के आदेश देते तो वे उतना ही सरपट भागते। कार उलटने-उलटने को हो जाती। राजू के पिता के माथे पर पसीना चुहचुहाने लगा। राजू भी परेशान था। उसने घबराकर पूछा- `पापा यह सब क्या हो रहा है?

"मैं खुद भी नहीं समझ पा रहा हूंं बेटे। कंप्यूटर से कोई भी आदेश दो, कोई सिग्नल दो बस बैल भड़क कर भागना शुरू कर देते हैं। लगता है बैलों के मस्तिष्क में फिट माइक्रोचिप से सिग्नल लीक होने लगे हैं जिससे चिप के चारों ओर का उनका मस्तिष्क इन अनावश्यक सिग्नलों को ग्रहण करने लगा है।"
"पर ऐसा क्यों पापा," राजू काफी घबरा रहा था।
"माइक्रोचिप के आसपास के मस्तिष्क के ऊतकों में इनफेक्शन होने या सूजन होने से ऐसा हो जाता है और वे सामान्यत: माइक्रोचिप से निकलने वाले वीक सिग्नल, जिन्हें स्वस्थ दशा में वे जान भी नहीं पाते, को ग्रहण करने लगते हैं। इसलिए हमारे हर कमांड पर उनके मस्तिष्क के इस सूजे भाग को एक बिजली का सा झटका लगता है और वे बिलबिलाकर दौड़ना शुरू कर देते हैं।"
"अब क्या होगा पापा?"
"यही मैं भी सोच रहा हूंं बेटे। जब कार के निर्माता हमें बैल सप्लाई करते हैं तो वे दोनों बैलों के मस्तिष्क में फिट इन "माइक्रोचिप" को पूरी तरह सिनक्र्रोनाइज़ करते हैं ताकि हमारे मिनी कंप्यूटर पर दिए गए एक कमांड को दोनों बैल एक ही तरह समझें।"
"पर अब पापा?"
"राजू बेटे लगता है कि एक बैल के माइक्रोचिप के आसपास के मस्तिष्क के ऊतकों में इनफेक्शन होने से वह सिंक्रोनाइजेशन समाप्त हो रहा है।"
"इसका मतलब पापा?"
"इसका मतलब यह कि हमारे सिग्नल को एक स्वस्थ बैल एक तरह से ग्रहण कर रहा है और इनफेक्टेड मस्तिष्क वाला बैल दूसरी तरह से।"
"यह तो बहुत खतरनाक होगा पापा, एक बैल दौड़ना चाहेगा तो दूसरा धीमे चलेगा, एक दाएं जाएगा तो दूसरा बाएं...यानि की हमारी कार कभी भी पलट सकती है?
"हॉ," पापा ने चिन्तित स्वर में कहा।
"पापा अगर हम बैलों को कोई भी सिग्नल न दें तो?"
"राजू मैं ऐसा कर रहा हूंं, पर इनफेक्टेड बाएंं बैल की माइक्र्रोचिप से सिग्नल लीक होना रूक ही नहीं रहा।"
"हे भगवान अब क्या होगा?"
"पता नहीं पर मैं कोशिश करूंगा...अंत तक कोशिश करूंगा।"
"पर कैसे पापा?"
"सोचता हूँ कार के बोनट तक किसी तरह पहुंंच जाऊंं और बैलों को कार से जोड़ने वाली रॉड को काट दूंं।"
"पर ऐसी उछलती, सरपट दौड़ती कार में पापा...नहीं पापा बहुत खतरनाक है यह...नहीं पापा नही..."                                              
"नहीं बेटे मुझे ऐसा करना होगा...मैं तुम्हारा पापा हूंं न। यकीन करो मुझे कुछ नहीं होगा।"
             
राजू के पापा ने उस तेज और धक्के खाती कार का दरवाज़ा खोला फिर वे खिसक कर कार के बोनट की ओर बढ़े। तभी कार एक खड्डे में जा गिरी और उलट गई।
राजू तेजी से चिल्लाया, "पापा"
"क्या हूआ बेटे," पापा राजू के ऊपर झुके उसका सिर सहला रहे थे।
"..."
"क्या हुआ, क्या कोई बुरा सपना देखा?" पापा पूछ रहे थे।
राजू ने धीरे-धीरे ऑंखे खोली। सामने पापा थे। वह पापा से लिपट गया, "पापा आप ठीक तो हैं न?"
"हॉं बेटे मैं बिलकुल ठीक हुंं पर तुझे क्या हुआ है?
" पर पापा, वह बैल...वह बैलों वाली कार...वह दुर्घटना..."
"ओहो! तो जनाब ने आज फिर कोई बुरा सपना देखा। कितनी बार तुमसे कहा है कि सोते समय उल्टे-सीधे कॉमिक्स न पढ़ा करो। तो क्या देखा आपने आज के इस सपने में?"
    
 राजू ने अपने पिता को अपने सपने के बारे में पूरी कहानी सुनाई। कहानी खत्म होते-होते राजू के पिता ने राजू के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए।
"पापा मुझे तो यकीन ही नहीं आ रहा है कि ये सब सिर्फ एक सपना था," राजू कह रहा था।
"सच कहते हो राजू सचमुच ये सपना नहीं था। तुमने बंद ऑंखों से हमारा आने वाला कल देखा है...ऊर्जा के संसाधनों के साथ जो अति हम आज कर रहे हैं उसका दुष्परिणाम देखा है...शायद प्रकृति तुम्हारे माध्यम से हमें चेतावनी दे रही है," पापा कहीं दूर देख रहे थे।
"मैं समझा नहीं, क्या कह रहें हैं आप?"
"राजू जिस रफ्तार से ये दोपहिये और चौपहिये वाहन बढ़ रहे हैं, अगर वही रफ्तार जारी रही तो क्या होगा? कहां से आएगा उनके लिए इतना पेट्रोल, इतना डीजल?"
"..."
" हमें थोड़ी दूर जाना हो तो क्या जरूरी है कि हम बाइक से ही जाएंं...कार से जाएंं? साइकिल पर भी जा सकते हैं...जैसे कि तुम अपने स्कूल।"
"समझा पापा, समझा, इससे पेट्रोल बचेगा और कसरत भी होगी।"
"हॉं, आज लोग कार से जाते भी हैं तो हर कार में सिर्फ एक आदमी। ऐसा भी तो किया जा सकता है कि एक ही जगह जाने वाले ऐसे पांच-छ: लोग बारी-बारी से किसी एक की कार में एक साथ जाएंं। लोग कार और मोटर साइकिल पर हवाखोरी और टहलने के लिए निकलते हैं। अरे ये कैसी हवाखोरी, टहलना हो तो पैदल जाओ।"
"मैं तो पापा अब साइकिल से ही स्कूल जाया करूंगा। हॉस्टल से स्कूल है ही कितनी दूर," राजू ने उत्साहित होकर कहा।
" और क्या साइकिल चलाना कोई शर्म की बात तो है नहीं। चीन में तो अस्सी प्रतिशत लोग साइकिल का ही प्रयोग करते हैं," पापा ने जानकारी दी।
"इससे तो पेट्रोलिंयम की कितनी सारी बचत होगी, है न पापा?"
"हॉं आज लोगों को मालूम है कि 'जेट्रोफा' जैसे पौधों से वाहनों में प्रयोग किया जाने वाला डीजल बनाया जा सकता है पर आम आदमी की तो इसमें रूचि ही नहीं। अगर ये चीजे हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में प्रवेश न पा सकी तो न जाने कल क्या होगा," पापा ने गहरी सॉंस ली।
"मैं बताऊंं पापा, बैलों वाली कार होगी पापा बैलों वाली कार," राजू ने कहा और दोनों खिलखिला कर हंस पड़े।

-- डॉ. अरविंद दुबे