यह प्रथ्वी का भाग्य

क्षितज छोर पर चमका मधिम सा एक गोला
पर्वत, टीलों, गड्ढों को किरणों से तोला
उसके पीछे क्रोधित अंधी फिर फुफकारी
अट्टहास करती भीषण भवरों के धुधकारी
धरती की सूखी घटी पर घूम रही है
मौत हठीली यम् तांडव में झूम रही है

वह दिनकर उठकर लटक गया सीने में नभ के
आग बरसती धरती की नंगी छाती पे
सूखे बदल सूखी नदियाँ सूखे सागर
तपते पत्थर, जलती धरती, जलता अम्बर
पर्वत नंगे, धरती बंजर, जीवन ओझल
कंकालों के ढेर, बिची मुंडो की चादर

सूरज थक कर डूब रहा है एक कोने में
पीली चादर खींचे जाता फिर वो सोने
रेत उडाती आंधी अब भी कौंध रही है
रेतों से बनते टीलों को रौंद रही है
फिर धीरे धीरे वह भी थक कर है रुक जाती
सूरज के पीछे पीछे वह भागी जाती

तब निकला एक शांति दूत पूरब के घर से
उसके साथी अनुचर सारे डरते डरते
तपती रेत ठिठुरने लगती धीरे धीरे
ठंढे गड्ढे, ठंढे पर्वत, ठंढे टीले
फिर, आंधी दिखत लगी लौटती अपनी राव में
रेत उडी फिर से नभ के सीने को छूने

वह दूत छिप गया धुल अँधेरे गुबारों में
अनुचर साथी डूबे काले अंधियारे में

बस यही चक्र अब सदा ही चलता जाता है
यह धरती का भाग्य न बदले पाटा है
जीवन के रंगों में डूबी हुई बेरंगी
पड़ी आदम के हाँथ हुई वह फिर से नंगी.