(कुण्डली छंद )
१. राक्षस नाश.....
विविध रूप बहुभाव युत, असुर किये संहार,
यह लीला कर 'श्याम ने, समझाया यह सार।
समझाया यह सार, नगर गृह वर्ग ग्राम में,
अनाचार पल्लवित,प्रकृति शासन जन मन में।
मिटे अनैतिकता, अक्रियता, फ़ैली बहु विधि,
जन जन मन हर्षाय,विकास नित होय विविध विधि।।
२. तृणावर्त असुर वध ...
अनृत अकृत अपभावों की थी आंधी आई,
तृणावर्त धर रूप-भाव, चहुँ दिशि थी छाई ।
चहुँ दिशि छाई, भाव राक्षसी था अपनाया ,
कृष्ण कन्हैया ने क्या उसको नाच नचाया ।
आसमान में ले कान्हा को हुआ नृत्य रत,
सुर-पुर भेजा कान्ह,रहा जो अकृत अनृत रत ।।
३.पूतना -
दुष्ट अप्राकृतिक कुटिल भाव मय नारी प्रतिकृति,
बनी पूतना रूप , घूमती ग्राम नगर नित ।
लीलीधर की लीला, जो पहुँची कान्हा घर,
लिए रूपसी भाव, वेष वह ममता का धर ।
आँचल रूपी, द्वेष-द्वंद्व का, भाव जटिल यह ,
चूस लिया कान्हा ने, सारा भाव कुटिल वह ।।
४. चीर हरण -
चीर मांगतीं गोपियाँ,करें विविध मनुहार,
क्यों जल में उतरीं सभी, सारे वस्त्र उतार ।
सारे वस्त्र उतार, लाज अब कैसी मन में ।
वही आत्मा, तुझमें मुझमें सकल भुवन में ।
कण कण में, मैं ही बसा, मेरा ही तन नीर,
मुझसे कैसी लाज लें ,तट पर आकर चीर ।।
उचित नहीं व्यवहार यह नहीं शास्त्र अनुकूल,
नंगे हो जल में घुसें, मर्यादा प्रतिकूल ।
मर्यादा प्रतिकूल,श्याम ने दिया ज्ञान यह,
दोनों बांह उठाय बचन दें सभी आज यह।
करें समर्पण पूर्ण , लगाएं मुझ में ही चित,
कभी न हो यह भूल,भाव समझें सब समुचित।।
कोई रहा न देख अब, सब है सूना शांत,
चाहे जो मन की करो, चहुँ दिशि है एकांत ।
चहुँ दिशि है एकांत,करो सब पाप-पुन्य अब,
पर नर की यह भूल, देखता है ईश्वर सब ।
कण कण बसता ईश, हर जगह देखे सोई,
सोच-समझ, कर कर्म, न उससे छिपता कोई ।।
--डा श्याम गुप्त.