सागर की उत्ताल तरंगो, लहर लहर कर लहराती हो,
भारत मां की चरण-वन्दना में मधुरिम स्वर में गाती हो।
टकरा टकरा पवन तट से, जाती हो फिर फिर आती हो,
मातृभूमि की चरण धूलि पर लोट लोट कर हरषाती हो।
तुम्हें गर्व है, भारत माँ के चरणों के नित दर्शन पातीं,
मुझे गर्व है मैं भी तो हूँ, माता के ह्रदय का बासी।
तुम्हें हर्ष है तुम नित प्रति दिन , मातृभूमि के चरण पखारो,
मुझे हर्ष है दर्शन पाऊँ , सदा अयोध्या मथुरा काशी।
सत् तम् रज के तीन सिन्धु मिल,निशि दिन माँ के चरण धो रहे,
उठा तिरंगा भारत माँ के शीश-शिखर आकाश छू रहे।
इधर सिन्धु की फेनिल लहरें इठला इठला इतरातीं हैं ,
धवल तरंगें सिकता तट पर बलखातीं बलि बलि जातीं हैं।
उधर धवल किरीट धारण कर हिमगिरि भी तो मुस्काता है,
शीश उठा उत्तुंग शिखर के नीले नभ में इठलाता है।
रवि किरणें माँ के चरणों में स्वर्णाभूषण बिखरातीं हैं ,
हिमगिरि के उत्तुंग भाल पर स्वर्ण मुकुट भी पहनातीं हैं।
सागर की उत्ताल तरंगो इठलाती हो बलखाती हो ,
मातृभूमि-पदप्रक्षालन कर, धन्य धन्य तुम हो जाती हो।
मातृभूमि की चरण वन्दना करके मैं अति सुख पाता हूँ,
चरण धूलि को मस्तक पर ले धन्य धन्य मैं हो जाता हूँ।।
-- डा श्याम गुप्त