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दुःस्वप्न

जाने कैसे खंडहर कालेजों में
छात्रों का रूटीन लौट आया-
क्यों प्रेम की बातें
फिर सुनाई देती हैं
जबकि शहर की तबाही के बरे अक्स
भिखारियों को दूब की तरह
उगना जरूरी था हर जगह-

शहर में कमी है-
जिंस, रोजगार, ऊर्जा की
हस्पतालों में कमी है-
दवा, डाक्टर, बिस्तरों की
रेलवे स्टेशनों पर कमी है-
ट्रेन, यात्री, कुलियों की
कमी, कमी, कमी; कुछ भी इफरात नहीं-

कलाकार, अध्यापक, ईमानदार, ग्रामीण
पहले की तरह चुप हैं
पर गुंडे, नेता, पत्रकार, उद्योगपति
फिल्मकार, शहरी भी आज चुप हैं-
उन्हें अभी तक नहीं पता
ये शहर कितना मर गया
पलक झपकते खरबों की सम्पत्ति
राख में बदल गयी
लाखों की तादाद में आधे लोग
लाश में बदल गये-
बचे आधे खा रहे हैं
पुलिस की लाठियां
अपने पिघल चुके पैरों पर
हस्पताल में हर दिन-

नौजवान जिस्म में
बच्चे बनाने की ताकत चुक गयी
जिस दिन कोई बच्चा
आता है शहर में
अखबारों में छपते हैं
उसके मां-बाप के फोटो-

सब मरने के कगार पर हैं
फिर भी दूसरे का हाल पूछते हैं
इस तसल्ली के लिए
कि ये कितने दिन चलेगा-
डाक्टर चिल्लाते हैं उनसे-
तुम रुको, उसे देखने दो,
वह आज भर का मेहमान है-

पहले जो फाड़ खाने पर आमादा थे
आज दूसरे की भाषा समझना चाहते हैं-

पूछते हैं कि धमाके के पहले
तू कहां था
क्या करता था
कहां रहता था
आज कहां है
क्या करता है
कहां रहता है
कितनी तकलीफ है-

भई, कमाल हो गया
इतनी बड़ी तबाही के बाद
कुछ तो हाथ लगा तेरे
ओ मेरे अकिंचन देश!
आखिरकार तेरी बीमार औलाद
तेरी मिट्टी की भाषा समझने लगी-

पिछले दो दशकों से देश
कम कीमत का युद्ध लड़ रहा था-
मुझे नहीं मालूम कि विज्ञान में
इतनी ताकत है कि महापुरुष
जो हजार साल से न कर सके
वो काम महज हाइड्रोजन के
दो अणुओं ने कर डाला-

बेशक बिजली के बल्ब
अब कुछ धीमे जलते हों
शहर की रफतार सुस्त हो गयी
पिघले मकान, बाजार, इन्सान पर
जमीन से उठती चीखों ने
पाला मार दिया हो-



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by Dr. Radut.