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उदास प्रतिमा

वो कहता है कि उसके कम्प्यूटर की
हर फाइल के पीछे उसे एक
बेचैन आदमी दिखता है
और वह सिर थाम लेता है
कि आज किसके ऊपर
बास की कैंची चलने वाली है-

उसने देखा कि जब कभी
भारत का नक्शा
स्क्रीन पर उभरता है
तो उससे उठती चीखें सुनकर
वह अक्सर डर जाता है
और विन्डो क्लोज कर देता है-

जब कभी स्क्रीन पर
तेज चलती कार दिखती है
उसे लगता है कि हो न हो
ये कार विस्फोटक से लदी है
और दस मिनट में ही
कहीं न कहीं धमाका करेगी
फिर शुरू होगा चीख, पुकार का
एक लम्बा सिलसिला-

उसे लगता है
कि सारी सावधानी के बावजूद
गणतंत्र दिवस की परेड में
आम लोगों के बीच
कुछ फिदायीन जरूर हैं
और कुछ ही पलों में
मैदान पर कत्लेआम दिखायी देगा-

वह जानता है कि स्क्रीन पर
आत्मविश्वास से लबरेज
जो लड़की मुस्करा रही है-
शाम के बाद सड़क पर
मुस्कराना तो दूर अकेले चलने की
उसकी मजाल नहीं है-

उसने बड़ी बड़ी कान्फ्रेंसें देखीं
मगर हर बार की तरह
उसे मालूम है कि इस बार भी
इन लोगों का हमला
आम आदमी पर ही होगा
पर कितनी बार विन्डो बन्द की जाये

वह कहता है मुझसे-
तुम कहते हो कि यदि एहसास न होता
तो शायद हम इन्सान न होकर
कोई तस्वीर, मूर्ति
या आदमकद प्रतिमा होते-

मगर ये कैसा एहसास है
कि तस्वीर, मूर्ति या आदमकद
प्रतिमा जैसे ही तो हैं हम
फर्क सिर्फ इतना है
कि आदमकद प्रतिमा को सिरदर्द है-

वह कहता है कि इसमें
मशीन का कोई दोष नहीं
दोष तो उस आदमखोर
प्रवृत्ति का है जो कि
घटनाओं को जन्म देकर
मूर्तियों में उदासी भर जाती है-



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by Dr. Radut.