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भयभीत

विकास एक शब्द नहीं
एक पैना अस्त्र है
जिसने मानव जाति पर
सदियों से लदी गर्द को
छीलकर साफ कर दिया-

प्रगति विकास एक शब्द नहीं
एक तेज दौड़ है
जिसने मानव के मष्तिस्क को
एक दिशा देकर
उसे तेज दौड़ना सिखाया-

आज आदमी साफ सुथरा होकर
नये नियमों में आवृत्त
तेजी से आगे निकल गया
सबसे आगे
और आगे-

उसने सीख लिया
कि कैसे कम समय में
ज्यादा कमाया जाता है
कि कैसे मस्तिष्क के उपयोग से
प्यार किया जाता है
कि कैसे पिछड़े लोगो पर
हुकूमत की जाती है
कि कैसे बराबर के खिलाफ
आक्रामक हुआ जाता है-

वह उस मिट्टी को भूल गया
जिसने उसे जन्म दिया
वह उस प्रकृति को नहीं जानता
जिसने उसका पोषण किया
वह उस लक्ष्य को जानता है
जिसके आगे उसे जाना है
वह अब मानव नहीं रहा
अमरता की ओर चल पड़ा-

उसे आक्रमण करने का वरदान मिला
उसे न मरने का वरदान मिला
कोई नहीं मार सकता उसे
आदमी या देवता, अस्त्र या शस्त्र
दिन हो या रात हो
घर हो या बाहर हो
उसे मालूम है कि वह दुर्जेय तो है
किन्तु अजातशत्रु नहीं-

इसीलिए वह संध्या के समय
विचलित हो जाता है रोज
जब-जब घर के बाहर निकलता है
उसे लगता है कि नृसिंह रूप में
कोई उसकी प्रतीक्षा कर रहा है-



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by Dr. Radut.