मेरे आंगन में जो पौधा
रोपा था तुमने
निरे बचपन में
आज हवा की सिहरन के साथ
अपनी विशाल भुजाएं फैलाकर
दे रहा सुख के संकेत
दिशाओं को!
मगर मैंने
अपने आंगन के सभी द्वार
कस के बन्द कर लिए
क्योंकि धरती की पीठ को
नंगा करते लोग
कुल्हाड़ी लिए
हवा में चारो ओर घूम रहे हैं
और वायुमंडल के ओजोन-छिद्रों से
अपना काला अंतरिक्ष भविष्य
साफ दिखायी देता है
मुझे....!
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