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ईश्वर, विज्ञान व धर्म

जब् ईश्वर नहीं था,
कितना सादा था जीवन,
रहा करते थे हम-
पेडों पर, पर्वतों पर, गुफ़ाओं में;
कुछ उन्नत लोग
झौंपडी भी बना लिया करते थे।

तब हम पिछडे हुए थे,
जो भी हमें कुछ देता था , उसी को-
देवता मान लिया करते थे ।
चांद-तारे, आग-पानी, धरती -सागर,
पशु-पक्षी, पेड-पौधे, गगन-समीर,
हमारे वन्दनीय देवता हुआ करते थे ।
तब ईश्वर नहीं था,
कोई हिन्दू -मुस्लिम नहीं था;
मन्दिर-मश्ज़िद नहीं थे,
मज़हब दीन धर्म नहीं था ,
मनुश्य सिर्फ़ मनुश्य था ॥

फ़िर उसने ज्ञान  का फ़ल चखा,
उन्नति के दौर मै` अपना कदम रखा ।
प्रकृति की दैवी शक्ति के पीछे -
रहस्य क्या है ,
क्या इन सब् का भी , कोई एक-
संचालन कर्ता है ?
इस विचार में मनुष्य खोगया , और-
ईश्वर का जन्म होगया ॥

वह एकमात्र ईश्वर ही था, सर्वशक्तिमान
या भूत जाति का स्वामी महान,
देव,  प्रकृति , मानव को एक समान,
देता था अभय का वरदान ।
वही था सबका, एकमात्र 'भगवान';
इन्सान फ़िर् भी था इन्सान,
सादा जीवन उच्च विचार,
था मानव मात्र का आचार ॥

फ़िर् आया विज्ञान ,
 अर्थात विशिष्ट ज्ञान;
और प्रारम्भ हुआ, स्वयं  को
विशिष्ट समझने का अभियान ॥

हम देव , तुम दैत्य नादान ,
तुम असुर , हम मानव महान ,
हम आर्य तुम अनार्य संतान ,
हम यहूदी तुम कृस्तान
हम हिन्दू , तुम मुसलमान ;
और ईश्वर टुकडों में बंटकर होगया
अलग अलग भगवान ।। 

भूल गये वेद, बाइबल, कुरान,
अलग अलग धर्म, मज़हब् ईमान ;
न रहा ईश्वर सर्वशक्तिमान ,
बन गये बहुत से भगवान ;
इन्सान न रहा इन्सान , बन गया--
हिन्दू, ईसाई, मुसलमान ॥

जब् ईश्वर नहीं था -
कितना सुहाना था जीवन ;
अब भी ईश्वर नहीं है ,
पर, कितना बेगाना है जीवन ॥

--डा श्याम गुप्त



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by Dr. Radut.