मेरे घर के पिछवाड़े
ईसाइयों की सेमंट्री है
चारो ओर चारदीवारी से घिरा
बहुत बड़ा मैदान है
कंकरीली अनुपजाऊ मिट्टी
सैंजन के हजारों पेंड़
काफी दूरी पर एक मकान
गजब की मनहूसियत !
अभी मैं बत्तीस बरस की हूं
जब पिछले बरस मेरे
पति का देहान्त हो गया-
आठ बरस का बेटा दीपक
जब सो जाता था
मुझे समय काटने को दौड़ता था
टीवी, मैगजीन्स कभी मेरा
अकेलापन नहीं भर पाये !
दीपक के जन्म के पहले ही
हमने यह मकान खरीदा था
कितने खुश थे मेरे पति
मैंने सेमेंट्री का हवाला दिया
तो बोले कि इसी कारण
ये मकान सस्ता मिल गया
बेशक खिड़कियां सेमेंट्री की तरफ है
मगर हवायें तो आती हैं
बिल्कुल अलग सोच थी उनकी
कितना लगाव था सेमेट्री से उन्हें
कहते थे कि ये अंग्रेज
जो यहां सो रहे हैं
सबके सब महान सैनिक थे
जो 1857 की लड़ाई में
देसी फौज के हाथों
शहीद हुए थे-
उनका कहना था कि मृत
जीवित की तुलना में कम खतरनाक हैं
क्योंकि जीवित को
गिरने के अवसर प्राप्त हैं
मृतक की गिरावट तो
मरते ही रुक जाती है-
कि जहां मरघट या कब्रिस्तान है
वह शिव का निवास है
मुझे यह कभी अच्छा नहीं लगा
मैं दावा तो नहीं कर सकती
मगर दिल के किसी कोने में
एक शिकायत दबी है मेरे
कि मेरे पति की सड़क दुर्घटना में
इस सेमेट्री का कुछ न कुछ योगदान जरूर है
मगर वे मरने के बाद भी
पूर्व जैसे थे -सरल, हंसमुख, जोकिंग!
पिछले पांच वर्ष से
सेमेट्री मेरे जीवन का
हिस्सा बन गई
हम आज भी खाने के पहले
समस्त प्राणियों के भोजन के निमित्त
कुछ ग्रास खाद्यान लेकर
उन्हें अर्पित करते हैं
तब खुद खाते हैं
यह व्यवस्था उन्होंने मुझे
मनोवैज्ञानिक भय, अलगाव, सन्त्रास से
बाहर निकालने के निमित्त
की होगी, हालांकि ऐसा
उन्होंने कुछ नहीं कहा,
यह उनकी मानसिक प्रक्रिया थी
इसी कारण कभी-कभी उनके कार्यों की
कोई वजह नहीं मिलती थी।
आज सेमेट्री हमसे पृथक नहीं
हमारे परिवार का अंश है
वह भय या त्रास की नहीं
सम्मान या मनोरंजन का साधन है
दीपक के सो जाने के बाद
मैं घंटों देखती रहती हूं
नीम रोशनी में हिलते सैजन पेड़
एकान्त मकान के बरामदे में टिमकता बल्ब, सन्नाटा
कभी-कभी मुझे भय लगता था
लेकिन सेमेट्री से मेरी
एकात्मकता ज्यादे मजबूत थी
सेमेट्री के काने पर बने
घर में कुछ लड़के लड़कियां
अक्सर चान्दनी में बाहर निकलते थे
लम्बे, चौड़े, गोरे-चिट्टे अंग्रेज
शान्त, स्तब्ध भाव से प्रकृति को निहारते
पूरे चान्द की एक रात
इसी उजाड़ मकान के पास
अकस्मात तेज हवाएं चलने लगी
कंकरीली धूल का उठा गुबार
जब थमा तो लगा कि इस मकान का
कुछ हिस्सा नया बन गया हो
एक वलयाकार विराट सा चबूतरा
एक क्षण में मकान से सट गया
वे शान्त स्वभाव के लड़के लड़कियां
अब कुछ चहकने लगे
अकस्मात मैंने खिलखिलाहट की आवाज सुनी
मैं अवाक् रह गई-
इस आवाज को मैं पहचानती हूं
क्या यह मेरे पति की आवाज है?
इसे बारह वर्ष सुना है मैंने
और आज मरने के साल भर बाद भी
लेकिन ये कैसे हो सकता है
मृत व्यक्ति की आवाज कैसे
सुन सकती हूं मैं-
मैंने खिड़की से आंखे लगा दी
फिर एक अट्टहास गूंजा
यह निश्चय ही उनकी आवाज है
तो साल भर पहले क्या
धोखा हुआ था मेरे साथ
मेरी गोद में रखा उनका मृत शरीर
क्या किसी और का था
नहीं-नहीं, वह सच था
तो फिर सच ये भी है
तो फिर मैं क्या करूं
क्या मैं सेमेट्री जाऊं
या फिर कुछ प्रतीक्षा करूं
इसकी तसदीक करनी होगी।
सारी रात मैं सो नहीं पायी
सुबह दीपक को स्कूल भेजा
मैंने बाजार से एक
दूरबीन खरीदी और
सेमेट्री को दिन में देखा
तो रात के आश्चर्य की पुष्टि हुयी
उस मकान से सटी तश्तरीनुमा
आकृति खड़ी थी जो पहले नहीं थी
निश्चय ही इस उड़न तश्तरी से
कुछ लोग रात में आये होंगे
मगर वे फिर पृथ्वी के
हरगिज नही होंगे
तब फिर रवि की आवाज को
कैसे कापी कर लिया उसने
नहीं, नहीं, ये नहीं हो सकता
आज रात फिर देखूंगी उन्हें
रात हुयी, दुरबीन लेकर
मैं खिड़की पर बैठ गई
आधी रात को चहल-पहल
फिर वही हंसी
मैंने गौर से देखा
रवि का कद, वही तन
वही बिन्दास भाव, वही चश्मा उतारकर
उल्टे हाथ से आंख पोछने की आदत
मैंने कितनी ही रातें खिड़की पर
जागते हुए काट दी
अब इसमें मुझे कोई शक नहीं
कि रवि अभी जीवित है-
रवि अन्तरिक्ष वैज्ञानिक था
मुमकिन है किसी गुप्त मिशन के लिए
उसने अपनी मौत का
नाटक रचा हो
एक प्रश्न मगर अब तक
मेरे मिष्तष्क में अनुत्तरित था
इतने करीब रहकर उसने
सम्पर्क नहीं किया हमसे-
यदि आने में कोई मुश्किल थी
तो कम से कम मेरा
सेलफोन ही खड़का दिया होता
दिमाग भन्ना गया
कई रातों की अनसोयी मैं
विस्तर पर निढाल होकर गिर गई
आखिरकार तो वह आया
ठीक मेरे करीब वैसे ही हंसता
मैं उसकी बाहों में बेसुध हो गई
वैसे ही हाथों के गर्म स्पर्श
वैसा ही उन्मुक्त अन्दाज
वही कौशल, वही संचालन
सुबह उठकर देखती हूं
मन विस्मय से भर जाता है
सब कुछ अस्त व्यस्त
भीगा बिस्तर, ठंढी हवायें
मैंने कुण्डी खोलकर देखा
सूरज की साफ सुथरी किरणों नें
वृक्षों पर पडकर जैसे
अस्तित्व का आभास दिया
अकस्मात् मैं चौंकती हूं
मेरे ईश्वर
घर की कुण्डी रात को
मैंने ही बन्द की थी
और अभी अभी
मैंने ही खोली थी
तब रवि कैसे आया था रात
और सुबह कैसे गया !
यदि रात को कुण्डी भूलवश
खुली छूट गई
और रवि आया
तो उसने बन्द की होगी
मगर घर का कोना-कोना छान मारा
रवि नहीं था वहां
मगर यदि प्रात: वो चला गया
तो कुण्डी किसने बन्द की थी
आज मैंने निश्चय कर लिया
कि जब आधी रात के
कुछ पहले जब ये लोग
बरामदे में आयेंगे
तो मैं सेमेट्री के मुख्य द्वार से
भीतर जाकर रवि से मिलूंगी
वह चाहे जो भी हो
मुझे अपनी ओर खींचता है
यह ठीक है कि रवि
अभी तक अनाड़ी है
क्यों कि ज्यादेतर पुरुष
ऐसे ही होते हैं
मगर फिर भी यह उसका दोष नहीं
दोष उसके परिवेश का है
उसका परिवेश ही ऐसा था
जिसमें वह समाज से नहीं घुल पाया
यौवन के वे वर्ष, माह, दिन
जिनमें मानव सामाजिक बनता है
उसने रात-रात भर जागकर
फिजिक्स और मैथ्स के नाम
कुबाZन कर दिये थो
सामाजिक होने का नाम पर
वह अभी तक एक बच्चा था
जिसे मेरी जरूरत है
मेरे सारे वर्ष सुख के नहीं थे
कितनी बार मेरा झगड़ा हुआ
उसने मुझे धिक्कारा, हाथ उठाया
मैंने प्रताड़ित किया उसे
मगर वह पीड़ा सहकर भी अपने
लक्ष्य से डिगा नहीं कभी
न ही मैंने कभी उसमें
ऊर्जा का ह्रास देखा
वह नौकरी और किताबो के अलावा
कुछ नहीं जानता था
मैं उसकी मूर्खता पर खीजती थी
रोती थी, उसे टोकती थी, चिढ़ाती थी
उसे उस रास्ते पर ले जाने की
कोशिश करती थी,
जो मेरे हिसाब से सही था
मगर वह विचलित नहीं हुआ
वह स्वीकार लेता था
कि उसे लोगों के व्यवहार की समझ नहीं
जीवन बहुत छोटा है
इसे समझने में बहुत ऊर्जा व्यय होगी
मुझे लक्ष्य तक जाने दो
तुम यदि मेरी सहायता न कर सको
तो कम से कम
उसमें बाधा न दो
मैंने बहुत बाधा दी रवि
तुम्हारा लक्ष्य बहुत ऊंचा था
मेरा लक्ष्य तुम थे
तुमने मुझे समझने की
चेष्टा भी तो नहीं की
फिर भी तुम सलीके से रहो
स्वस्थ और खुश रहकर लक्ष्य तक पहुंचो
मात्र यही तो मेरा लक्ष्य था
तुमने अपना लक्ष्य पा लिया रवि
तुम मेरे पास रहो
या मंगल ग्रह पर
कितने भी रूप बदलो
मुझे छल नहीं सकते
मैं हर रूप में तुम्हें पहचान लूंगी
और आज कोई भी शक्ति
मुझे तुमसे मिलने से नहीं रोक सकती
आज अमावस्या की रात तारों की छांव में
मैं अपने हाथ में
शक्तिशाली टार्च लिय
घर से बाहर निकली नि:शब्द
मैंने बाहर से ताला लगाया
और सड़क पर चल पड़ी
मुझमें एक आक्रोश था
एक जिजीविषा थी।
मुझे आक्रोश था
कि इतने दिनों तक रवि
अपने घर पर नहीं आया
मुझको इतने प्यार करने वाले
तुम उस बच्चे को भी
एकदम भुला बैठे
जिसके लिए तुम कहते था
मैं दीपक के रूप में जीवित रहूंगा
कांपते हाथों से मैंने
सेमेट्री के मुख्य द्वार की कुण्डी खोली
और डगमगाते कदमों से
उस कंकरीले रास्ते पर चल पड़ी
जो एकान्त मकान की ओर जाता था
और जिसके सायवान में
मरियल सा बल्ब जला करता था-
अंधेरा जैसे गाढ़ा होने लगा
तेज हवायें चलने लगी
धूल का घना गुबार
मेरे करीब मण्डराने लगा
भारी शक्तिशाली यन्त्र के चलने की
गम्भीर घरघराहट सुनाई दी
उस अकेले मकान के सायवान में
जलता बल्ब अपनी डोर के साथ
पेण्डुलम सा झूलता, फीका सा दिखा
दस मिनट यह चला
धूल का गुबार और ऊपर उठ गया
सैंजन के नाचते पेड़ों की
गति सामान्य सी हो गई
उस मकान के पास
जो चबूतरा बन गया था अकस्मात्
उस पूरे चान्द की रात में
अब वहां नहीं था
सामान्य होने में दस मिनट और लगे
मैंने आगे बढ़कर
कालबेल पर हाथ रखा
भीतर कोई आवाज नहीं आयी
मैंने तीन बार दस्तक दी
कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई
ऐसा लगता था कि मुद्दत से
कोई यहां नहीं रहता
भयभीत सी मैं लौट पड़ी
बरामदे के बाहर मैंने
जैसे ही कदम रखा
मेरी निगाह अपने घर की
खिड़की की ओर उठ गई
मेरी सिसकारी निकल गई
कौन खिड़की से दुरबीन लगाकर
सेमेट्री की ओर देख रहा है
जब मैं चली थी
दीपक सोया पड़ा था
उसे इतनी गहरी नीन्द आती है
कि नगाड़े बजाने पर भी न खुले
फिर कौन इधर देख रहा है
मैं लगभग दौड़ती सी
सेमेट्री गेट से बाहर निकली
मुझे याद नहीं कि कैसे
घर के मुख्य द्वार का
ताला खोलकर मैं भीतर घुसी
अन्दर कमरे में दीपक
मेरी प्रतीक्षा कर रहा था
मैंने उसे गोद में उठा लिया
और फूटफूटकर रोने लगी
दीपक मौन मेरी आंखे पोछने लगा
"वो चला गया दीपक
वो चला गया
कभी लौटकर नहीं आयेगा वो
वो चला गया बेटे"
मेरी हिचकियां बंध गईं
आज मेरा धैर्य टूट गया था
लगता था किसी तेज धार चाकू ने
मेरे कलेजे को छलनी कर दिया
कोई कहीं नहीं गया मम्मी
यहीं पर कहीं हैं पापा
उसे गोद में उठाकर भी
आप उसे पहचान नहीं पायीं
बच्चे से यह सुनकर
मैं अवाक् रह गई
यह तो ठीक
रवि की भाषा बोलता है
"मैंने आपको कई रात
खिड़की पर बैठे देखा
नीन्द में बोलते सुना आपको
रवि की हंसी, रवि की बातें
आज फिर मेरी आंख खुली
उस तेज अंधड़, हवा, पेड़ों की खड़खड़ से
आप यहां नहीं थीं, दुरबीन थी
मैने लगाया तो आप को देखा"
हेमन्त द्विवेदी