अति सर्वत्र वर्जयेत

कविता बनती है,
करुणा दया ममता और प्रेम की-
अनुभूति से;  और-
उसी अनुभूति से अभिभूत होकर,
जन्म लेता है -
विज्ञान।

जन-जन की कठिनाइयां,
घोर परिश्रम,
दुष्कर कार्य स्थिति से जन्म लेते हैं,
तंत्र मन्त्र और यंत्र;
और वाहक बनते हैं, मानव की-
सुख समृद्धि और आनंद के।

शास्त्र,  काव्य, पुराण और-
वैज्ञानिक आविष्कार;
जन्म लेते हैं, करने को सुधार-
मानव जीवन का;
ताकि यह यात्रा हो पूर्ण सानंद,
मानव रहे सत् चित आनंद।

परन्तु जब यही शास्त्र,
वैज्ञानिक आविष्कार,
सामाजिक सरोकार,होजाते हैं-
अति सुख अभिलाषा के शिकार;
मानव के लिए हुआ था,
जिनका आविष्कार;
हो जाते हैं मानव के,
तन पर, मन पर सवार;
जनक पर पुत्र का अधिकार,
गुरु पर शिष्य सवार।
कर लेते हैं तब,
सभी सुख रूपी आविष्कार,
शास्त्र  विचार,
मानवता पर अधिकार।
मानव सिर्फ रह जाता है,
यंत्राश्रित, यंत्र मानव, एक यंत्र विचार।

मानव बांध जाता है,
यंत्र जंजाल में, माया के संजाल में।
सिर्फ यंत्रों को बनाने हेतु,
उपयोग में लाने हेतु,
रह जाता है उसका व्यवहार।

यंत्र हो जाता है,
सभ्यता पर सवार,
और युग-बोध होजाता है,
यन्त्रमेव जयते।
इसीलिये कहते हैं, शास्त्रकार-
करके पूर्ण प्रज्ञा विचार,
अति सर्वत्र वर्जयेत।

--डा श्याम गुप्ता