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श्री सूर्य

आसमान ढका है बादलों के शामियाने से
जिसे ठीक से धो नहीं पाया मुहल्ले का धोबी
दिखाई दे रहे हैं काले-सलेटी धब्बे
सिलवटें और जँग लगी इस्त्री के दाग
कभी-कभी अकेले बूढ़े-सा सूरज
झाँक लेता है शामियाने के बाहर
खँखार कर गला फिर कर लेता है
उदास चेहरा सिलवटों के भीतर
कई कोशिशों के बाद
शाम तक थक जाता है लाचार

अंधेरे का पिशाच धीरे-धीरे लील लेता है सारा आकाश
कल फिर जन्म होगा सूर्य का
अगर ठीक रहा दिनमान...

-- राजेश्वर वशिष्ठ



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by Dr. Radut.