जब भी हम चाँद की तरफ़ देखते हैं मन मे यह सवाल ज़रूर उठता है कि क्या चाँद पर पानी है? वैज्ञानिक इसी खोज मे दिन-रात एक किये हुए है। सबका कहना है -- मुझे चाँद चाहिये! एक पुराना रूमानी गाना है "मैने पूछा चाँद से कि देखा है कहीं मेरे यार सा हसीं, तो चाँद ने कहा चाँदनी की कसम नहीं नहीं ऩहीं. . . " काश आनंद बक्शी साहब ने पानी के बारे मे पूछ लिया होता -- चाँद तो जवाब देने के लिये तैयार बैठा ही था, जब उनकी माशूका के बारे मे बता सकता था तो पानी का पता देने मे क्या समस्या थी? कौन सी हमारी सरकार वहाँ कुआँ खुदवाने जा रही थी! खैर ये तो बीते दिनों यानी रफ़ी साहब की बातें हैं।

नासा के वैज्ञानिक बक्शी साहब की तरह रूमानी मिज़ाज नही थे -- आज से ४० साल पूर्व जब अपोलो यान के यात्री चाँद से पत्थर के टुकडे लाये थे, तो सबसे पहला सवाल यह उठा था कि क्या चाँद पर पानी है? यह सवाल आज तक दोहराया जा रहा है। अभी हाल ही मे भारत के ईसरो ने चन्द्रयान भेजा था। दुर्भाग्यवश मिशन पूर्णत: सफ़ल न हो सका (हालाकिं अन्य देशों द्वारा किये गये प्रयासों की तुलना मे यह अत्यंत सफ़ल मिशन कहा जायेगा), लेकिन उसने चाँद की सतह की लगभग ८७% मैपिंग तो कर ही दी थी। सारे आंकडे इसरो के पास हैं और शीघ्र् ही अध्यन के परिणाम आना शुरू हो जायेंगे और हम जान पायेंगे की चाँद कितने पानी मे है।
तो बात हो रही थी नासा की और बीच मे आ गया इसरो, ख़ैर नासा के मामले मे गडबडी तब हुई जब चाँद् से लाये गये सील बंद बक्सों मे पानी के चिन्ह पाये गये। सभी उत्साहित हो गये । लेकिन जल्द ही यह पाया गया कि चाँद से सील करके लाये गये बक्से, जिनमे चन्द्र लोक के पत्थर थे, रिस रहे हैं। इससे वैज्ञानिको ने यह संदेह जताया कि उनमे पाये गये पानी के चिन्ह शायद रिसाव की वजह से है -- और यह पानी चाँद् से नही बल्कि प्रथ्वी से है जो रिस कर उन् बक्सों मे चला गया है। इस वजह से यही माना जाता रहा कि चाँद पर पानी नही है।
चालीस साल बाद (यह किसी हिंदी हारर फ़िल्म का नाम लगता है) वैज्ञानिकों के एक दल ने पता लगाया है कि पुराने आकलन शायद गलत थे। इसकी पुष्टि के लिये उन्होने चाँद के इर्द गिर्द चक्कर लगाने वाले एक उपग्रह पर अत्याधुनिक उपकरण लगा दिया।
"कुछ् हद तक हम मूर्ख बन गये थे।' चाँद् पर शोध कर रहे वैज्ञानिक लैरी टेलर ने कहा, 'चुंकि बक्से रिस रहे थे अत: हमने यह मान लिया कि यह पानी प्रथ्वी के वातावरण से उन् बक्सों मे गया है।"
और यहाँ प्रवेश होता है भारत का। लैरी का वह आधुनिक उपकरण लगा था भारत के चन्द्रयान -१ पर। लैरी के दल मे भारत द्वारा प्रक्षेपित चन्द्रयान-१ पर नासा के एक उपकरण मून मिनरालोजी मैपर -एम ३ - लगाया था। एम ३ चन्द्रमा से परिवर्तित होने वाले सुर्य के प्रकाश का अध्यन करके यह जानने की कोशिश करता है कि वहां पर किस प्रकार के पदार्थ या खनिज हैं।
अब आती है चौकाने वाली बात। चन्द्रयान-१ पर लगे नासा के उपकरणों ने सूरज से परिवर्तित होने वाले चाँद कि रोशनी मे एक ऐसे रसायन का संकेत दिया जो कि आक्सीजन व हाईड्रोजन से मिल कर बनता है। और पानी का प्रसिद्ध रसायनिक, एच टू ओ, वैज्ञानिको को उत्तेजित करने के लिय पर्याप्त है।
यह उपकरण चन्द्रमा की मिट्टी की सिर्फ़ ऊपरी परत ही देख सकता था, लेकिन जो कुछ भी इसने देखा वह, वैज्ञानिकों के अनुसार, पानी ही है। चन्द्रमा पर मुखयत: दो प्रकार के पानी पाये जाते है (हमारे वहाँ कहावत है न, घाट घाट का पानी पीना) -- एक्सोजेनिक, अर्थात बाहरी स्रोतों - जैसे धूमकेतु- से आया हुआ पानी तथा एन्डोजेनिक, यानी वह पानी जो चन्द्रमा पर ही पला बढा! इसे हम घरवाली और बाहर वाली भी कह सकते है (महिला पाठक नाराज ना हो 'घरवाला और बाहरवाला' भी कहा जा सकता है)
टेलर के दल के अनुसार चन्द्रमा पर जो पानी उन्होने अपने उपकरणों से देखा वह एन्डोजेनिक, या घरवाला पानी है। तथ्य यह है कि चन्द्रमा की मृदा (मिट्टी) मे ४५% आक्सीजन होती है, तो सवाल यह उठता है कि एम्-३ द्वारा देखे गये पानी मे पाया जाने वाला हाईड्रोजन कहाँ से आया? उनका मानना है कि शायद यह एक खगोलिय घटना 'सार्य हावाओं' (सोलर विंड) से आया है।
खैर अध्यन चलता रहेगा और जैसे जैसे तथ्य सामने आते जायेंगे हम आपकॊ कल्किआन द्वारा सूचित करते रहेंगे, लेकिन यह एक बडी खोज है और भारत का इसमे विशेष योगदान रहा है -- अत: चन्द्र्मा पर पानी की खोज मे योगदाने के लिये सभी भारतवासियों को बहुत् बहुत् शुभ् कामनायें।