४ सितम्बर ०९ को एक ऐतिहासिक संगोष्ठी संपन्न हुई। स्थान था नई दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित पुस्तक मेले के ८वें हाल का सभागार। संगोष्ठी का विषय था 'भारतीय साहित्य में विज्ञान कथाएं', और यह आयोजित हुई थी अखिल भारतीय प्रसिद्ध संस्था 'आथर्स गिल्ड आफ इंडिया' के तत्वावधान में। संगोष्ठी की अध्यक्षता की विश्व प्रसिद्ध 'सुलभ संस्थान' के अध्यक्ष डा. बिन्देश्वर पाठक ने।
'आथर्स गिल्ड आफ इंडिया' के उपाध्यक्ष उपेन्द्र कुमार, महसचिव राजेन्द्र अवस्थी, तथा संपादक विश्व मोहन तिवारी मंच पर विराजमान थे। प्रसिद्ध सम्पादक एवं उपन्यासकार राजेन्द्र अवस्थी ने संगोष्ठी का शुभारम्भ करते हुए सभा को संबोधित किया, "आज की संगोष्ठी में आप सभी का स्वागत है। यह संगोष्ठी विशेष है क्योंकि इसमें साहित्यकार तथा विज्ञान क्थाकार आपसे चर्चा करेंगे। इस नवीन गोष्ठी के लिये चार विज्ञान लेखकों तथा क्थाकारों डा. रमेश दत्त शर्मा, श्री देवेन्द्र मेवाडी, डा. मनोज पटैरिया एवं एयर वाइस मार्शल विश्व मोहन तिवारी को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया है। विश्व मोहन तिवारी ने ऐसी संगोष्ठी की आवश्यकता की ओर इंगित किया था। अतः उनसे अनुरोध है कि वे आज की संगोष्ठी का संचालन करें। उपाध्यक्ष उपेन्द्र कुमार ने अनुरोध किया, "आप कृपया विषय प्रवर्तन से प्रारम्भ करें।"
विश्व मोहन तिवारी ने सभी का स्वागत करते हुए कहा, "आज की संगोष्ठी सचमुच में विशेष है क्योंकि हिन्दी साहित्य में शायद यह पहला अवसर है कि मुख्यधारा की संगोष्ठी में विज्ञान कथाकारों को विशेष आमंत्रण दिया गया है। और मुख्य धारा के साहित्यकार उनकी बातें सुनेंगे और अपनी प्रतिक्रिया उन्हें देंगे। मुझे प्रसन्नता है कि तीन विज्ञान कथाकार सम्मिलित हो सके हैं। मुझे खेद है कि साहित्य तथा विज्ञान लेखन की दुनियां में प्रसिद्ध डा. रमेश दत्त शर्मा को 'जैविक खेती' की एक अंतर्राषट्रीय संगोष्ठी में भाग लेने जाना पड गया। किन्तु उन्होने इस संगोष्ठी का सम्मान करते हुए अपना आलेख भेज दिया है जिसे समय मिलने पर मैं अवश्य पढना चाहूंगा।"
विषय प्रवर्तन करते हुए विश्व मोहन तिवारी ने कहा, "मेरे लेख का शीर्षक है, 'विज्ञान कथा भविष्य की कथा है।' यह दो अर्थों में सही है। एक तो यही कि भविष्य का साहित्य मुख्यतया विज्ञान कथा होगा। आज का जीवन कितना अधिक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी पर आधारित है हम जानते हैं। किन्तु कल का जीवन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी पर और अधिक निर्भर करेगा. यदि मानव ने विवेक का उपयोग कर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी पर नियंत्रण नहीं किया तब यह हो सकता है कि कल का जीवन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी द्वारा नियंत्रित होगा। साहित्यकार जीवन की अनुभूतियों को ही तो कथा या कविता आदि के रूप में अभिव्यक्त करता है.तब उसकी रचना में जीवन पर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का प्रभाव तो होगा ही। दूसरा यह कि विज्ञान कथा में भविष्य के जीवन का वर्णन होगा। यदि जीवन में विज्ञान के प्रभाव की चेतावनी देना है या उसकी दिशा सही करना है तब आज के विज्ञान का कल जो प्रभाव पडेगा वह दिखलाना है और तब उसके लिये कथाकार को आज के विज्ञान को देखकर कल के विज्ञान का आंकलन करना आवश्यक होगा. जैसे कि आज हमें विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के दुरुपयोग के कारण प्रदूषण भुगतना पड रहा है तो इसे रोकने के लिये हमें कल ही कुछ कर लेना था, आज हम जो करेंगे उसका असर तो कल ही दिखाई देगा। और इसके लिये कथाकार को आज के विज्ञान की स्थिति कल क्या होगी इसका सही आंकलन करना होगा। और उसे कल अर्थात भविष्य के आख्यान में अभिव्यक्त करना होगा। किन्तु यह भी सच है कि रामायण तथा महाभारत में भी विज्ञान कथाओं के अनेक बीज छिपे हैं। यह कार्ल सैगन तथा माननीय ए पी जे अब्दुल कलाम आदि ने कहा है।
आगे विश्व मोहन तिवारी ने कहा, "विज्ञान कथा की भारत में दुर्दशा है। इसके अनेक कारण हैं, जिनमें मुख्य है विज्ञान की दशा का भी भारत में खराब होना है, जिसका मुख्य कारण है शिक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी होना. अपनी भाषा, यदि वह समृद्ध है, तब उसमें प्राप्त किया ज्ञान आत्मसात होता है। विदेशी भाषा में प्राप्त ज्ञान कठिनाई से आत्मसात होता है. और जैसा कि माननीय ए पी जे अब्दुल कलाम ने कहा है आत्मसात ज्ञान ही आविष्कार में मदद कर सकता है, और यही तर्क विज्ञान कथा के सृजन के लिये भी लगता है.
एक संदेश देने में मुझे प्रसन्नता हो रही है कि मेरी एक समर्पित टीम ने भारत में हिन्दी में विज्ञान कथाओं की प्रथम मासिक जाल (वॆब) पत्रिका 'कैल्किओन.काम ' का प्रकाशन १५ अगस्त से प्रारम्भ किया है । इसमें विज्ञान कथाओं के साथ विज्ञान लेख्, कविताएं, ब्लाग (चिट्ठा), साक्षात्कार, समाचार, रिपोर्ट्, आदि रचनाएं होती हैं। सभी हिन्दी प्रेमियों से अनुरोध है कि वे इसे खोलकर पढें और इस शुभ कार्य में रचनात्मक सहयोग दें।
अंत में उन्होने कहा, "आज से पचास वर्ष पहले सी पी स्नो ने अपनी विश्वप्रसिद्ध पुस्तक 'द टू कलचर्स ' में चेतावनी दी थी कि यह दुर्भाग्य है कि विश्व दो संस्कृतियों के दो अभेद्य खन्डों में बँट गया है : कला तथा विज्ञान। इन के बीच सेतु बनाने की आवश्यकता है। "वह सेतु तो नहीं बन पाया किन्तु टीवी नामक कुसंस्कृति आ गई है। किन्तु यह सेतु बनाने का कार्य विज्ञान कथाकार कर सकता है, वरन कर रहा है। विज्ञान कथाकार इस तरह मानवता का संरक्षण कर सकता है।
इसके बाद विश्व मोहन तिवारी ने श्री देवेन्द्र मेवाडी को यह कहते हुए अमंत्रित किया कि देवेन्द्र मेवाडी एक सिद्ध हस्त विज्ञान कथाकार हैं और इसी विषय पर पी एच डी भी कर रहे हैं।
श्री देवेन्द्र मेवाडी ने सर्वप्रथम 'आथर्स गिल्ड आफ इंडिया' को ऐसी ऐतिहासिक संगोष्ठी में आमंत्रण के लिये धन्यवाद दिया, और कहा कि यह दिन यह संगोष्ठी उनके जीवन की यादगार र्होगी। उन्होने विज्ञान कथा की परिभाषा देने के बाद कहा, "कवि बायरन, शॅली, अन्य साहित्यकार अक्सर मिलकर साहित्य चर्चा किया करते थे। उन्होने तय किया कि विज्ञान कथा भी महत्वपूर्ण है और उन्हें भी लिखना चाहिये। और किसी ने तो नहीं, कवि शैली की पत्नी मैरी ने लिखी और वह अंग्रेजी की प्रथम विज्ञान कथा बनी, और कितनी अद्भुत ! उन्होने चेतावनी दी कि असावधानी के कारण विज्ञान मानव के स्थान पर एक दानव पैदा कर सकता है। अंग्रेजी विज्ञान कथा का संक्षिप्त इतिहास का वर्णन करने के बाद मेवाडी जी ने बांग्ला विज्ञान कथा के इतिहास का रोचक वर्णन किया। उन्होने कहा कि जगदीश चन्द्र बसु की कहानी 'पोलातोक तूफान' प्रथम विज्ञान कथा है। (देखिये hindi.kalkion.com का अगस्त अंक : अरविन्द दुबे इनसे असहमत हैं)। तमिल विज्ञान कथा के इतिहास की चर्चा करते हुए उन्होने 'स्वतः चालित ट्रेन' कथा का सारांश सुनाया। यह ट्रेन मात्र यात्रियों के मल से सारी ऊर्जा प्राप्त कर लेती है। किन्तु एक दिन वह चलने से इंकार कर देती है। खोजने पर पता चलता है कि एक यात्री ने तेज एन्टी बायोटिक्स ले लिये थे, जिसके मल के कारण ऊर्जा पैदा करने वाले सारे बैक्टीरिया मर गए। इसी तरह उन्होने असमी विज्ञान कथा का इतिहास बतलाया और दर्शाया कि वहां भी अच्छी विज्ञान कथाएं लिखी जा रही हैं। वे सभी भारतीय भाषाओं का इतिहास प्रस्तुत करने वाले थे किन्तु उसके लिये समय नहीं था।
तिवारी जी ने डा. मनोज पटैरिया को आमंत्रित करते हुए कहा कि इस समय समस्त विज्ञान संचार के लिये भारत में यदि कोई सर्वाधिक कार्य कर रहा है तो वह डा. पटैरिया हैं। वे राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद में निदेशक के पद का पूरा सदुपयोग कर रहे हैं.
डा. मनोज पटैरिया ने प्रारम्भ किया, "सर्वप्रथम मैं आथर्स गिल्ड आफ इंडिया को और तिवारी जी को ऐसी संगोष्ठी आयोजन करने के लिये बधाई और धन्यवाद देता हूं। वैज्ञानिक सोच तथा वैज्ञानिक ज्ञान में अन्तर समझाते हुए कहा कि वैज्ञानिक सोच एक बिना विज्ञान पढे लिखे व्यक्ति में हो सकती है और ज़रूरी नहीं कि वह सभी वैज्ञानिकों में हो। विज्ञान कथा वैज्ञानिक सोच पैदा कर सकती है। उन्होने अपने वैश्विक अनुभवों के आधार पर बतलाया कि विज्ञान लेखन की समस्या वैश्विक है। किन्तु भारत में हमारे माध्यम विज्ञान को मह्त्व नहीं देते। वे औसतन मात्र लगभग ३% ही स्थान या समय देते हैं। और यह भी बतलाया कि माध्यम मांग करता है रोचक विज्ञान लेखन की जो कि अधिकांश विज्ञान लेखक या कथाकार नहीं दे पाते। उन्होने अपने विभाग द्वारा किये जा रहे कार्य का संक्षिप्त वर्णन किया, कितनी संगोष्ठियां करते हैं, कितनी कार्यशालाएं करते हैं, कितने विश्वविद्यालयों के साथ कार्य करते हैं, आदि। उन्होने विज्ञान कथा के चार प्रकार बतलाए। एक तो वे जो स्वतः ही एक साहित्यकार के समान रचना कर सकते हैं। अन्य से हमें अपेक्षा रहती है कि वे भविष्य में जाकर आज और कल की समस्याओं को कारणों सहित उजागर करें, उनके प्रभाव दिखलाएं। और जैसा कि तिवारी जी ने कहा है कि प्रसिद्ध वैज्ञानिक कार्ल सैगन को नोबेल पुरस्कार के लिये इसलिये नहीं चुना गया क्योंकि वे विज्ञान लेखन तथा विज्ञान प्रसार के क्षेत्र में कार्य करने लगे थे। उसी तरह फ्रान्स के एक प्रसिद्ध् वैज्ञानिक को पिछले वर्ष लोकप्रिय विज्ञान लेखन के लिये 'प्रतिष्ठित 'कलिंग पुरस्कार' से सम्मानित किया गया है। वे भारत आए थे तब मैने उनसे पूछा कि उन्होने विज्ञान लेखन कब प्रारम्भ किया था। उन्होने उत्तर दिया कि यही कोई ५ या ६ वर्ष पूर्व। तब मैने उनसे पूछा कि पहले क्यों नहीं किया। तब उन्होने उत्तर दिया कि तब वे अपनी पदोन्नति चाहते थे। मैने फिर पूछा कि तब उन्होने ५ या ६ वर्ष पहले लिखना क्यों प्रारम्भ कर दिया। तब उनका उत्तर था कि तब तक जितनी पदोन्नति होना थी वह हो चुकी थी। विज्ञान लेखन के प्रति ऐसा सौतेला व्यवहार वैश्विक है।
भोजन का समय निकट आ रहा था अतः तिवारी जी ने श्रोताओं में बैठे बहुत प्रसिद्ध साहित्यकार डा. श्याम सिंह शशि को विनम्रतापूर्वक ५ मिनिट का समय देते हुए व्याख्यान के लिये आमंत्रित किया। डा. श्याम सिंह शशि ने सबसे पहले तो यह बतलाया कि हमारे अध्यक्ष डा. पाठक जी को सतॉकहोल्म स्वीड्न में एक बहुत ही सम्माननीय अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार 'Water Prize' अभी कुछ दिनों पहले मिला है. यह सुनकर सभागार तालियों की गड्गडाहट से गूंज गया. फिर उन्होने बतलाया कि वे विज्ञान के कार्य से परिचित हैं क्योंकि उन्होने सामाजिक विज्ञान पर अनुसंधान किया है, बीस पच्चीस खन्डों का हिन्दी में विस्तृत समाजशास्त्रीय एनसाइक्लोपीडिया तैयार किया है। वे आज के तीनों विज्ञान कथाकारों से सहमत हैं कि समाज के भविष्य की सुरक्षा के लिये विज्ञान कथाएं आवश्यक हैं।
तिवारी जी ने डा. बाछौतिया को विनम्रतापूर्वक ५ मिनिट के लिये आमंत्रण दिया। डा बाछौतिया ने बतलाया कि उन्होने हिन्दी में शास्त्रीय ज्ञान साहित्य का शोध करके पाया है कि हिन्दी साहित्य में कथा कविता आदि की तुलना में न केवल शास्त्रीय ज्ञान बहुत कम है वरन इसका सम्मान भी कम है। विज्ञान कथाओं की लोकप्रियता कम होने का कारण यह भी है। और वे मानते हैं कि विज्ञान का शिक्षण मातृभाषा में अधिक लाभदायक होगा। विज्ञान और विज्ञान कथा को लोकप्रिय बनाना ज़रूरी है।
तिवारी जी ने श्री दयानन्द वर्मा को भी विनम्रतापूर्वक ५ मिनिट के लिये आमंत्रण दिया। दयानन्द वर्मा ने भी संगोष्ठी की प्रशन्सा की और बतलाया कि उन्होने भी विज्ञान तथा साहित्य दोनों में कार्य किया है. उन्होने निस्संकोच कहा कि विज्ञान कथा का समाज के निर्माण में बहुत बडा हाथ है।
इसके बाद तिवारी जी ने उपाध्यक्ष श्री उपेन्द्र कुमार को भी विनम्रतापूर्वक ५ मिनिट के लिये आमंत्रण दिया। उपेन्द्र कुमार ने कहा, "रामायण तथा महाभारत के विषय में जो कहा गया है मैं भी उससे सहमत हूं। किन्तु मैं एक टिप्पणी करना चाहता हूं. आप कौन होते हैं किसी लेखक को आदेश देने वाले कि आप की उससे ऐसी अपेक्षाएं हैं। (डा. पटैरिया के कथन की ओर इशारा है) । एक रचनाकार स्वतंत्र व्यक्तित्व रखता है। वह जो उचित समझता है जिस शैली मैं उचित समझता है वैसा लिखता है। आप उसे आदेश नहीं दे सकते कि यह लिखिये, ऐसा लिखिये। वह तो माहौल देखकर लिखता है।"
इसके बाद तिवारी जी ने कहा, "उपेन्द्र जी आपके वक्तव्य के लिये धन्यवाद। एक टिप्पणी मेरी कि डा. पटैरिया जी का इशारा भी आदेश देने का नहीं वरन उसी माहौल की तरफ था जिसकी चर्चा आपने की थी. "तब डा. पटैरिया ने मंच से एक मिनिट का समय मांगा और कहा कि वे उपेन्द्र जी से सहमत हैं और उन्होने स्वयं कहा था कि कुछ साहित्यकार स्वतंत्र होकर रचना करते हैं।"
तिवारी जी ने कहा, "डा. पाठक और उनकी अंतर्राष्ट्रीय एवं क्रान्तिकारी संस्था को हम सभी जानते हैं। अब मैं उनसे निवेदन करता हूं कि वे आज की सभा के लिये अध्यक्षीय भाषण दें।"
डा. पाठक ने यह कह कर प्रारम्भ किया कि, "मैं जो लिखकर लाया था उसे पढने की ज़रूरत नहीं समझ्ता और इन विद्वानों को सुनकर जो मेरे मन में आया है वह बोलूंगा। मैं इन विद्वानों की बात बहुत ध्यान से सुन रहा था। मैं भी अपने साथियों को बधाई देता हूं कि उन्होने यह गोष्ठी आयोजित की। मुझे यह जानकारी बहुत अच्छी लगी जिसमें बतलाया गया कि वैज्ञानिक सोच के लिये वैज्ञानिक ज्ञान आवश्यक नहीं है। मैं विज्ञान का विद्यार्थी नहीं था किन्तु मुझमें वैज्ञानिक सोच है। मैं जो जब वह तमिल कहानी सुनाई गई जिसमें एक ट्रेन मल से चलती है। मेरी संस्था सुलभ यही कार्य वर्षों से कर रही है। और सारे विश्व में कर रही है। मैने विकसित देशों को समझाया कि न केवल विकासशील देशों को वरन विकसित देशों को भी मेरे सिस्टम की ज़रूरत है। वे तो फ्लश सिस्टम में एक बार में चार पाँच लिटर पानी खर्च करते हैं , जब कि मेरे सिस्टम में एक डेढ लिटर पानी ही लगता है। मेरे सिस्टम में सारा मल पूरा खप कर मीथेन गैस से ऊर्जा बनाता है, शेष से खाद बनता है। उनके सिस्टम में खाद तो बनती नहीं और प्रत्येक व्यक्ति ६ घनफुट मीथेन गॅस पैदा करता है। मीथेन गैस तेजी से वैश्विक ताप बढाती है जिससे ध्रुव प्रदेशों की हिम पिघल रही है, जलवायु बदल रही है, और प्रलय के होने की आशंका बढ्ती जा रही है। पता नहीं कितने हजारों करोड घनफुट मीथेन गैस उनका सिस्टम रोज पैदा करता है। पानी भी बहुत कीमती होता जा रहा है.मेरे सिस्टम में एक तो पानी कम लगता है और दूसरे इसमें पानी को शुद्ध भी किया जाता है। यह हुई न वैज्ञानिक सोच। यही संदेश मैने स्तॉकहोल्म में अपने संदेश में पढा था।
मैं तो आज की गोष्ठी से इतना प्रभावित हूं कि अगले वर्ष मार्च में एक राष्ट्रीय गोष्ठी इसी विषय पर कराई जाए। यदि शासन का अनुदान कम पड्ता है तब शेष मैं पूरा करने का वायदा करता हूं। डा. पाठक के इस प्रस्ताव से सभागार फिर तालियों से गूंज उठा।
इसके पश्चात आथर्स गिल्ड के महासचिव राजेन्द्र अवस्थी ने सभी को धन्यवाद दिया और भोज के लिये आमंत्रित किया और सभा के समापन की घोषणा की।
-- विश्व मोहन तिवारी