हमें बाजार में कोई नई वस्तु दिखती है तो हम एकदम आकर्षित हो जाते हैं; और यदि वह वस्तु नई प्रौद्योगिकी की हुई तब तो मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। टैफ़्लान विलेपित बर्तन देखते ही महिलाएं तो क्या पुरुष भी विमोहित हो जाते हैं। और यदि वे मोटापे से डरे बैठे हैं तब तो कुछ और सोचना ही नहीं, बस खरीद लो ।
टैफ़्लान बनाने वाली फ़ैक्टरियों के पास जो रसायन फ़ेके जाते हैं वे विषैले तो होते ही हैं, किन्तु उनमें से एक परफ़्लोरोआक्टैनाइक अम्ल तो विषों का राजा है। यह कबाड़ में से रिसकर भूमिगत जल में चला जाता है और वहां से पेय जल में। अध्ययनों से पता चला है कि यह अम्ल मनुष्यों में बाँझपन, प्रतिरोध शक्ति का क्षीणन, गर्भावस्था में शिशु के विकास में अवरोध पैदा करता है और यह कैंसरमित्र भी है।
पश्चिम वर्जिनिया (यूएसए) स्थित टैफ़्लान बनाने वाली विशाल द्युपां कम्पनी के पड़ोस में मनुष्यों विशेषकर महिलाओं मे उपरोक्त रोग पाए गए। द्युपां कम्पनी इन आरोपों को नकारती रही, तब उन पर पर्यावरण संरक्षक एजैन्सी ने मुकदमा ठोका और उन पर एक करोड़ पैंसठ लाख डालर का जुर्माना लगाया गया, जो एक रिकार्ड राशि है। यह परफ़्लोरोआक्टैनाइक अम्ल की दुर्घटना अकेली या दुकेली नहीं है, ऐसी अनगिनत दुर्घटनाएं हो चुकी हैं, हो रही हैं। जंक फ़ूड क्या कम हानि पहुँचा रहा है!!
'आज की प्रौद्योगिकी हमारी सुविधा के लिये सारी वस्तुएं बना रही है', यह एक भयंकर गलत फ़हमी है। वह मात्र अपने लाभ ही लाभ के लिये यह कर रही है। उसमें यदि हमारा नुकसान हो रहा है तो उऩ्हें चिन्ता नहीं। तब हम क्या करें, क्योंकि नए उत्पाद पर सबसे पहली जानकारी उत्पादक कम्पनी ही देती है जो 'स्वभावतया' बुरी तरह से उनके पक्ष में होती है। और जब तक हमें पता लगता है तब तक देर हो चुकी होती है। जब तक किसी नए उत्पाद का, विशेषकर बहुत ही आकर्षक वस्तु का, दूसरा पक्ष भी हमें नहीं ज्ञात हो तब तक उस उत्पाद को नहीं खरीदना चाहिये। कहना बहुत सरल है; कितु क्या हम उनके हाइवोल्टैज सैक्सी विज्ञापन के मोह जाल से बच सकते हैं??
यदि बच सकते तो क्या हम अभी भी जंक खा रहे होते, जंक पी रहे होते, जंक सोच रहे होते और जंक देख रहे होते!!