आबादी नियंत्रण कितना कठिन कार्य है इसका एक उदाहरण हमारे निकट संबन्धी 'अंगूठीदारपुच्छ लमूर' पर किये जा रहे प्रयोगों से स्पष्ट हो सकता है।इसका वर्णन 'प्रोसीडिंग्ज़ आफ़ रायक सोसायटी (२८ जुलाई १०) में प्रकाशित है।
लमूर 'प्राइमेट' है अर्थात 'नर-वानर' गण का है, जैसे चिम्पैन्ज़ी, गौरिल्ला आदि, इसकी प्रजातियों में वैविध्य है जैसे कि इसकी एक जाति का वजन मात्र ३० ग्राम होता है और एक अन्य का ७ कि.ग्रा।. तब भी अब यह केवल मैडागास्कर नामक द्वीप में ही पाए जाते हैं। यह हमारा निकट का ही संबन्धी है। इस पर किए गए प्रयोगों से हम अपने लिए कुछ सीख सकते हैं.
मादा लमूरों को 'हार्मोन – निरोध' दिये गए, जो उनके शरीर से निकलती गंधों को बन्द कर देते हैं। हार्मोन शरीर की विशेष ग्रन्थियों के कार्यों में परिवर्तन करते हैं यह हार्मोन उनकी यौन ग्रंथियों के कार्यों में बाधा उत्पन्न कर रहे थे । और यह हम जानते हैं कि नर जानवर, मादाओं पर बलात्कार नहीं करते वरन जब वे 'तैयार' होती हैं, तभी वे सम्भोग करते है। मादाओं की गंध उन नरों को इंगित करती है कि शारीरिक तथा मानसिक रूप से मादा कितनी और कितनी तीव्रता से तैयार है। उस हार्मोन- निरोध का परिणाम यह हुआ कि नरों ने उन विशेष मादाओं में कतई रुचि नहीं दिखलाई। यहां तक तो वही हुआ जो अपेक्षित था।
किन्तु यह भी देखा गया कि अब नर लमूरों में आक्रामकता बढ़ गई। यह चिन्ता की बात थी और लगा कि हो सकता है कि यह उन मादाओं को दिए गए हार्मोन निरोधों का परिणाम हो, क्योंकि आवश्यक यौन संतोष उन नरों को नहीं मिला और शायद उन मादाओं को भी। अब सही कारण का और इसके हमारे लिये प्रासंगिक होने का अनुसंधान ज़ारी है।