कम से कम चूहों में तो वैज्ञानिकों ने यही जाँच परखकर पाया है ! अभी तक तो हम तनाव को सर्वाधिक हानिकारक मानते आ रहे हैं, अब हमें अपनी सोच बदलना पड़ सकती है।
ओहायो स्टेट विश्वविद्यालय के कैन्सर केन्द्र के मैथ्यू ड्यूरिंग तथा उनके साथियों ने यह (सुखद) आश्चर्यजनक अनुसंधान किया है। कुछ चूहों को उऩ्होंने सामान्य स्थान में रखा और कुछ को अधिक चुनौतियों वाले स्थान में रखा, जिसमें उनकी संख्या तुलनात्मक रूप से बढ़ाई गई, उऩ्हें अधिक घूमने वाले चक्रों, सुरंगों, अन्य सामग्री, और पहेलियों आदि में उलझाया गया।फ़िर सभी चूहों को अर्बुद (ट्यूमर) कोशिकाओं वाली सुइयां लगाईं गईं। और आश्चर्य कि अधिक तनाव में रहने वाले चूहों में अर्बुद तुलनात्मक रूप में बहुत कम बढ़े !
यह भी प्रयोगों द्वारा निश्चित किया गया कि अर्बुदों की यह कम बढ़त उनके अधिक परिश्रम के कारण नहीं हुई। यह भी देखा गया कि इन चूहों में अधिक तनाव – हार्मोन उत्पन्न हुआ और उनके प्रतिरोधक तंत्र ने अधिक कार्य किया। एक मह्त्वपूर्ण हार्मोन 'लैप्टिन' की मात्रा में ९०% कमी पाई गई, इस लैप्टिन की मात्रा में मनुष्यों में कुछ प्रकार के कैन्सर और अन्य रोगों में सीधा संबन्ध देखा गया है। साथ ही 'तनाव हार्मोन की मात्रा में महत्वपूर्ण बढ़त पाइ गई।
देखा गया है कि उन पशुओं (हम भी एक पशु तो हैं) की हाइपोथैलैमस (अधश्चेतक) से जो अधिक चुनौतीपूर्ण वातावरण में रहते हैं, एक प्रोटीन अधिक निकलता है जो लैप्टिन की मात्रा को कम करता है, और प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाता है।
वैज्ञानिक अब ऐसी औषधि बनाने में लगे हैं जो अधश्चेतक से वह प्रोटीन बनाने में मदद करे। इससे एक सीख हम यह ले सकते हैं कि हमें अधिक आरामदेह और टीवीदर्शन जैसे निष्क्रिय जीवन से बचकर सक्रिय, चुनौतीपूर्ण तथा रचनात्मक कार्यों में समय लगाना चाहिये। और विद्यार्थियों को परीक्षा जैसी चुनौतियों से बचाने का प्रयास भी नहीं करना चाहिये।