शाकनाशकों ( खरपतवार नाशकों के रूप में) का प्रचार १९७० में खूब जोर शोर के साथ किया गया था जब मान्सैन्टो ने ग्लाइफ़ोसेट नामक शाकनाशक बनाया था। किन्तु थो.डे ही वर्षों में देखा गया कि उसकी उपयोगिता कम होने लगी थी, क्योंकि खरपतवार ने उसके लिये प्रतिरोधकता पैदा कर ली थी। गायत्री वैद्यनाथन साइंटिफ़िक अमेरिकन (१४ एप्रिल १०) में लिखती हैं कि 'नेशनल रिसर्च काउन्सिल' की जाँच समिति की रिपोर्ट लिखने वाली ला रीसा बर्जर ने प्रमाण दिये हैं कि अब खरपतवार में शाकनाशकों के प्रति इतनी अधिक तीव्रता है कि जौर्जिया में बीटी कपास नहीं बोया जाता ! इस समिति ने यह भी चिन्ता प्रकट की है कि जीएम फ़सलों के १४ वर्षों के अनुभव के बाद भी उनके प्रभाव पर पर्याप्त शोध नहीं हुए हैं।
१९८५ के तुरंत बाद ही पैदा किया गया बहुचर्चित बीटी (बैसिलस थुरिन्जिएन्सिस) एक आविष (टाक्सिन) है क्योंकि यह कुछ विशेष कीटों पर बहुत प्रभावकारी है, और लगा था कि अन्य कीड़ों तथा मानव सहित अन्य प्राणियों पर कोई दुष्प्रभाव नहीं करता है। अत: यह मान लिया गया था कि बीटी बीजों के उपयोग से सामान्य, अर्थात जो अनेक जातियों के कीटों का नाश करते हैं, कीटनाशकों का उपयोग कम हो जाएगा, क्योंकि कीटनाशक अन्तत: हानिकारक तो हैं।
किन्तु अभी (२००८-२०१०) ४२ क्षेत्रों में किए गए ताजे अनुसंधानों से यह ज्ञात हुआ है कि जिन खेतों में बीटी फ़सल पैदा की गई उनमें उन विशेष कीटों को छोडकर अन्य कीटों की संख्या कहीं अधिक थी। अत: बीटी बीजों की उपयोगिता कम तो हुई क्योंकि उन कीटों के लिये सामान्य कीटनाशकों का उपयोग आवश्यक होगा।
उस समिति का कथन है कि यह आवश्यक नहीं है कि जीएम प्रौद्योगिकी से उपज में वृद्धि होगी ही। क्योंकि बेहतर उपज के लिये बेहतर मिट्टी अधिक महत्वपूर्ण है। समिति की चिन्ता यह भी है कि इस पद्धति में बीजों पर कम्पनियों का एकाधिकार हो जाता है। अतएव यह अत्यंत आवश्यक है कि इस विषय पर व्यापक तथा गहन अनुसंधान हो। गायत्री वैद्यनाथन तो कहती हैं कि आनुवंशिकी इंजीनियरी खरपतवार प्रतिरोधकता के तीव्र विकास का मुकाबला नहीं कर सकती!