वैश्विक तापन से बचने के लिये प्राचीन राज्य लद्दाख पृथ्वी का उच्चतम आबादी वाला क्षेत्र है, जो शीतमरुस्थल है। यह चारों तरफ़ हिमालयी पहाड़ों से घिरा है। आठवीं शती के कुमार पद्मसम्भव की कृपा से इसमें अधिकांश आबादी तान्त्रिक बौद्ध है।
जब तक मानसून यहां पहुँचते हैं, उनका सारा जल उसके दक्षिणी भाई निचोड़ लेते हैं, अत: यहां वर्ष में मात्र पाँच से. मी. वर्षा होती है जो सहारा मरुस्थल के बराबर है ! किन्तु लद्दाख हिमालय की पूजा करता है क्योंकि उसका सारा जल उसे हिमालयी हिमनदों तथा हिमपिघलन सॆ मिलता है, जिसकी कृपा से वह वर्ष में जौ आदि की एक फ़सल भी ले लेता है।
यद्यपि अनेक लोगा वैश्विक तापन को नही मानते किन्तु लद्दाख में पिछले पन्द्रह वर्षों में अधिकांश हिमनद पीछे हटते हटते लुप्त हो गए हैं। हिमपात भी कम हो गया है। कुछ हिमनद बचगए हैं किन्तु वे गाँवों से इतनी दूर तथा ऊँचाई पर हैं कि उपयोगी नहीं रह गए हैं। जो भी थोडा बहुत जल आता है वह भी मई के अन्त या जून प्रारंभ तक आता है जो फ़सल को पकने के लिये बमुश्किल समय दे पाता है, किसान ने यदि बोवाई में थोड़ी भी देर कर दी तो फ़सल नहीं पकती।
कठिन समय में ही महान व्यक्ति अवतरित होते हैं, स्तकमो ग्राम के ऐसे एक व्यक्ति हैं चेवंग नार्फ़ैल। स्तकमो पर तीस वर्ष पूर्व तक तीन हिमनदों की कृपा होती थी, किन्तु अब तो वे हिमनद रुष्ट होकर लुप्त ही हो गए हैं। चेवंग नार्फ़ैल एक इंजीनियर थे, सेवा निवृत्ति के बाद उऩ्होंने इस दुख से मुक्ति का मार्ग सोचा कि कृत्रिम हिमनद का निर्माण किया जाए। उऩ्होंने गाँव के लोगों से चर्चा की और वे कठिन परिश्रम के लिये सहमत हो गए।
उऩ्होंने पुराने सूखे जलमार्गों की ढ़लान पर छाहों में इकट्ठा करने के लिये बाँध तथा जलाशय बनाना प्रारंभ किया। उनमें जो भी जल शीतकालीन वर्षा का आएगा वह इकट्ठा होकर शीत ऋतु में हिम के रूप में जम जाएगा। और बहार का मौसम आते ही पिघलना प्रारंभ कर गाँव को जल देना प्रारंभ कर देगा !!
अब चेवंग नार्फ़ैल की रचनाशीलाता, समाजसेवी भावना तथा ग्रामीणों के कठिन परिश्रम की कृपा से स्तकमो ग्राम वर्ष में निश्चित् दो फ़सलें लेता है और ग्राम तथा वहं के निवासी समृद्ध जीवन जी रहे हैं, इस विश्वतापन के बावजूद।