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भारतीय योगदान भी है सांश्लेषित जीव का निर्माण मे

विश्व प्रसिद्ध जीवाणु वैज्ञानिक क्रैग वैन्टर के दल ने सर्वप्रथम किसी जैव का 'जिनोम' तैयार किया था। जिनोम को हम बोलचाल की भाषा में 'कुण्डली' बोल सकते हैं। जिनोम किसी जीव के डीएनए (गुणसूत्रों का तंत्र) का या वाइरस के आरएनए का लेखा जोखा है। वास्तव में यह उस जीव की समस्त आनुवांशिक जानकारी का दस्तावेज होता है। इसमें जीन्स के साथ डीएनए के अ-कूटलेखन (नान कोडिंग) अनुक्रम भी होते हैं।

अब क्रैग वैन्टर के दल ने फ़िर एक सर्वप्रथम उपलब्धि प्राप्त की है - सांश्लेषित जीव का निर्माण। उनके इस दल में १३ वैज्ञानिक हैं जिनमें तीन भारतीय हैं - प्रशान्त परमार, संजय वाशी और राधाकृष्णकुमार। उऩ्होंने जो बैक्टीरिया का निर्माण किया है वह प्राकृतिक विधि से नहीं किया है। पहले उऩ्होंने एक बैक्टीरिया का जिनोम लिया, उसके आनुवांशिक कूट में उऩ्होंने कुछ वांछित परिवर्तन किये और इस तरह एक नवीन जिनोम (कस्टम मेड) का संश्लेषण किया। फ़िर इस नवीन जिनोम को बैक्टीरिया की एक कोशिका में डाला। उस कोशिका ने इस नवीन जिनोम को पढ़ा और वह कोशिका उस नवीन जिनोम के अनुसार एक नवीन बैक्टीरिया बन गई। दूसरे शब्दों में कहें तब उस कोशिका ने उस नवीन जिनोम का 'साफ़्टवेअर' पढ़ा और उसके अनुसार उसने अपना निर्माण कर लिया। इस तरह हम देखते हैं कि वास्तव में सांश्लेषित जीव का निर्माण नहीं हुआ है वरन सांश्लेषित जिनोम का निर्माण हुआ है। अर्थात अब मनचाहे जीवों की उत्पत्ति बहुत दूर नहीं‌ है। इस प्रक्रिया को कृत्रिम निर्माण नहीं कहना चाहिये क्योंकि इस प्रक्रिया में समस्त जैव अंगों का ही उपयोग हुआ है, प्रयोगशाला में अकार्बनिक रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा बनाए गए यौगिकों का उपयोग नहीं किया गया।

इसमें संदेह नहीं कि यह एक क्रान्तिकारी कार्य हुआ है; इतना कि कुछ लोग कहते हैं कि क्रैग वैन्टर इस कार्य के द्वारा ईश्वर का कार्य कर रहे हैं। क्योंकि अनेक लोग जीव निर्माण को ईश्वर का विशेष कृत्य मानते हैं।

अब निकट भविष्य में फ़्लू के टीके, तेल खाने वाले बैक्टीरिया, कार्बडाइआक्साइड खाने  वाले बैक्टीरिया, लकड़ी या कूड़े से पैट्रोल बनाने वाले बैक्टीरिया आदि का निर्माण होगा। अब पुन: बैक्टीरिया से हम क्या क्या जादू करवा सकते हैं यह हमारी कल्पना शक्ति तथा रचनाशीलता पर निर्भर करेगा। यह भी संभव है यह आविष्कार जैव आतंकवाद को जन्म दे। यह तो हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी द्वारा प्राप्त शक्ति का उपयोग कितने विवेक से करते हैं।

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by Dr. Radut.