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यदि पुरुष मदिरा पान कर सकते हैं तो हम क्यो नहीं??

यह तो 'बराबरी' का ज़माना है, हम पुरुषों से पिछड़े क्यों रहें??

जब पुरुष मदिरा की मस्ती ले सकता है तब हम क्यों नहीं?
हम जब सिगरैट पीते हैं तो पुरुष हमारी तरफ़ क्यों घूरता है?
आधुनिक कहलाए जाने वाले समाज विज्ञानी तो इस तर्क से सहमत थे, और अभी भी हैं।

अब विज्ञान ने इस विषय पर अन्वेषण किये हैं। उऩ्होंने पाया है कि महिलाएं कहीं अधिक जल्दी नशे के प्रति व्यसनी  (एडिक्ट) हो जाती हैं। मस्तिष्क में एक् 'पुरस्कार परिपथ' होता है जो उसे अच्छी लगने वाली क्रिया को पुरस्कार देता है, अर्थात मन फ़िर उस क्रिया की और मांग करता है। और बढ़ते बढ़ते यही व्याहार व्यसन का रूप धारण कर लेता है। किन्तु महिलाओं के मस्तिष्क में यौन हार्मोन मस्तिष्क में स्थित 'पुरस्कार परिपथ' को प्रभावित करता है, अर्थात उनका पुरस्कार परिपथ पुरुष के पुरस्कार परिपथ से अधिक्स शक्तिशाली हो सकता है। जिसके फ़लस्वरूप उनकी अल्कोहल या तम्बाकू आदि व्यसनी वस्तुओं के प्रति अनुक्रिया अधिक प्रभावित होती है।

मादा चूहे नर चूहों की अपेक्षा अधिक व्यसनी पाईं गईं। मादा चूहों के अंडकोष निकाल देने के बाद उनमें कोकेन या एम्फ़िटेमिन जैसे व्यसनी पदार्थों में रुचि कम हो गई। और इऩ्हीं चूहों को जब 'ईस्ट्रोजैन' ( मादा हार्मोन) दी गई तब वे शीघ्र ही अपनी व्यसनी इच्छाओं पर वापिस आ गईं। निष्कर्ष यही निकलता है कि यह ईस्ट्रोजैन मस्तिष्क के पुरस्कार पथ को सुदृढ़ करता है।

महिलाओं में ईस्ट्रोजैन की मात्रा उनके मासिक रजस्राव के अनुसार घटती बढ़ती रहती है। ताजा अनुसंधानों से यह भी देखा गया है कि मासिक ऋतुस्राव का महिलाओं की व्यसनी पदार्थों की अनुक्रिया पर प्रभाव पड़ता है।

यह 'यौन बराबरी' शब्द गह्री समझ की मांग करता है, राजनैतिक या समाजशास्त्रीय  अर्थ पर्याप्त नहीं है। 'बराबरी' में जो प्रतिस्पर्धा का भाव है वह भी विचारणीय है।

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by Dr. Radut.