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युवाओं की दुस्साहसी प्रवृत्ति

मनोवैज्ञानिको के अनुसार युवाओं की दुस्साहसी प्रवृत्ति का कारण  मुख्यतया उनके मस्तिष्क के उस भाग का अपूर्ण विकास है जो मनोवेगों पर नियंत्रण करता है। किन्तु अन्नेनबर्ग पालिसी सेंटर तथा फ़िलाडेल्फ़िया स्थित किशोरों के हास्पिटल में किये गए अनुसंधान इस विषय पर कुछ और प्रकाश डालते हैं। इऩ्होंने पिछले चार वर्षों में विभिन्न जातियों तथा पृष्ठभूमि वाले ४०० युवाओं पर अध्ययन किये हैं।

इऩ्होंने पाया कि कार्यगत स्मरण शक्ति तथा युवाओं की दुस्साहसी प्रवृत्ति में गहरा संबन्ध है।विशेषकर वे जो बिना सोचे विचारे ही दुस्साहसी कार्य कर बैठते हैं, उनकी स्मरण शक्ति कमजोर होती है। किन्तु ऐसे भी युवा हैं जो उत्तेजनात्मक अनुभवों के लिये दुस्साहसी कृत्य करते हैं, और यह युवा यथाशक्ति ऐसा सोचते समझते हुए ऐसा करते हैं, तथा इनकी स्मरण शक्ति बेहतर पाई गई।
अर्थात ऐसे अनेक युवा हैं जिनमें दुस्साहस या जोखिम लेने की प्रवृत्ति पर नियंत्रण करने की क्षमता है।

बस आवश्यकता यह है कि युवाओं को सावधानी के प्रति, सोच समझकर साहसी कृत्य करने की शिक्षा दी‌ जाए।  

यह कोई बहुत कठिन कार्य नहीं है। आखिर अनेक खेलकूद (शायद टैनिस, बैडमिंटन, क्रिकैट आदि इसके अपवाद होंगे क्योंकि इनमें खतरनाक दुस्साहस करने की गुंजाइश बहुत कम है) जैसे पर्वतारोहण,  साहसिक नौकायन, पर्वतीय साइक्लिंग, गुफ़ानुसंधान आदि हैं, जिऩमें युवा को जागरूक जोखिम लेना सिखाया जा सकता है।

जोखिम लेना, जागरूक या अन्य, एक ऐसा गुण है जिसकी कृपा से आदिमानव आफ़्रिका से निकलकर सारे विश्व में फ़ैला, हिमालय पर चढ़ा, चन्द्रमा पर कदम रखा, और निकट भविष्य में वहां पहुँचेगा कि जहां अभी तक कोई नहीं पहुँचा है; और यह शायद अतिशयोक्ति नहीं होगी कि ऐसे ही दुस्साहसी २६ वर्षीय युवा अल्बर्ट आइन्स्टाइन ने अपने 'विशेष आपेक्षिक सिद्धान्त' की‌ घोषणा की थी, फ़िर पुन: निर्विशेष आपेक्षिक सिद्धान्त की घोषणा की थी; और शायद इसी दुस्साहस की कमी के कारण वही साहसी किन्तु (अब दस वर्ष कम युवा) ३६ वर्षीय आइन्स्टाइन ने प्रसारी ब्रह्माण्ड के स्थान पर ब्रह्माण्ड का प्रचलित 'स्थायी अवस्था सिद्धान्त' ही प्रतिपादित किया था। और दस वर्ष बाद जब हबल ने ब्रह्माण्ड के प्रसारी होने का प्रमाण दिया तब आइन्स्टाइन ने अपनी उस घोषणा को अपने जीवन की सबसे बड़ी गलती‌ मानी थी।

सोच विचार कर किए गए दुस्साहसी कार्यों की कृपा से ही मानव जाति ने तेज प्रगति की‌ है।
 

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by Dr. Radut.