'स्वप्न देखो और बड़े स्वप्न देखो' यह सलाह बहुत दी जा रही है। और यह अच्छी लगती भी है क्योंकि मनवांछित स्वप्न देखने का अपना सुख है। जनतंत्र में तो स्वप्न दिखाए जाते हैं, रंगीन और स्वर्गिक ! नए नए स्वप्न दिखाए जाते हैं, पुराने किसको याद रहते हैं, इस जानकारी की भीड़ भरी दुनियां में जहां माध्यम, विशेषकर टीवी रंगीन से रंगीन, सपने दिखाता रहता है। इस सब सपनों के बाजार में माध्यम का, उद्योगपति का और राजनेता का लाभ ही लाभ है। किन्तु शेखचिल्ली के दिवास्वप्न की कहानी हमेंयाद रखना है, क्योंकि दिवास्वप्नों को दु;स्वप्न बनने में बह्त देर नहीं लगती।
इस लेख में तो हम स्वप्नों पर किये जा रहे कुछ वैज्ञानिक अनुसंधानों की संक्षिप्त चर्चा कर रहे हैं। फ़्रायड यद्यपि आउट आफ़् डेट सिद्ध हो चुके हैं किन्तु लोक में अभी भी उनकी अवधारणाएं प्रचलित हैं, जिनमें अतृप्त यौन तथा आदिम भय ही अधिकांश स्वप्न निर्धारित करते थे। अब वैज्ञानिक स्वप्न के उपयोग भी खोज रहे हैं। यह तो अब सभी वैज्ञानिक मानते हैं कि पर्याप्त निद्रा से स्मरण शक्ति का समुचित विकास होने में बहुत मदद मिलती है। अब स्वप्नों के समस्याओं के हल करने की क्षमताओं पर अनुसंधान हो रहे हैं।
हार्वर्ड मैडिकल स्कूल के बैथ इज़्राएल डीक्नैस मैडिकल केन्द्र के 'निद्रा एवं संज्ञान (कग्निशन) केन्द्र' में कालेज के ९९ विद्यार्थियों का इस विषय पर केन्द्रित अध्ययन किया गया। इस केन्द्र के निदेशक डा. राबर्ट स्टिकगोल्ड ने लिखा, “ इन विद्यार्थियों को कहा गया कि वे कम्प्यूटर में दी गई त्रिआयामी भूलभुलैयां को हल करें। लगभग एक घंटे के हल करने के बाद उन विद्यार्थियों को कहा गया कि वे ९० मिनिट या तो हल्की निद्रा लें, या टीवी या वीडियो देखते हुए विश्राम करें। इसके बाद इनके अनुभवों की रिपोर्ट ली गई।"
"अल्प निद्रा वाले विद्यार्थियों को गहरी (रैपिड आइ मूवमैंट) निद्रा में नहीं जाने दिया गया, क्यों कि गहरी निद्रा का शिक्षण तथा प्रश्न हल करने की क्षमता तो ज्ञात ही है।
पहले परीक्षण के ५ घण्टे बाद सब की उस कम्प्यूटर पहेली पर पुन: परीक्षा ली ग ई। उन अल्पनिद्रावालों ने जिऩ्होंने उस विषय संबन्धी स्वप्न देखे थे, उनके हल करने की योग्यता में, उन विद्यार्थियों की अपेक्षा जिऩ्होंने संबन्धित स्वप्न नहीं देखे, दसगुनी उन्नति पाई ग ई!!
इस तरह स्टिकगोल्ड का निष्कर्ष है कि स्पष्ट ही निद्रित मस्तिष्क स्मृतियों पर अनेक स्तरों पर कार्य कर का समस्याओं के हल करने में समुन्नति दिखलाता है।
साथ में इस प्रयोग में यह भी देखा गया कि प्रेरणा का इस समुन्नति में स्पष्ट हाथ नहीं दिखता। अर्थात किसी में कार्य करने की बहुत इच्छा हो या नहो अल्पनिद्रा मस्तिष्क पर अपना कार्य तो करती है। यदि कार्य करने वाले को समस्या का हल करना है और कार्य कठिन है, यह पद्धति कारगर होगी।
कठिन समस्याओं को हल करने के लिये यह पद्धति उपयोगी हो सकती है।