Jump to Navigation

सामाजिक जिम्मेदारियाँ नारी-पुरूष हिंसा को जन्म दे सकती है

नारी व पुरूष के सामाजिक जिम्मेदारियो मे बदलाव हिंसा को बढावा दे सकती है। पुरूष को जब इस बात का एहसास होता है कि उनकी शक्ति तथा अधिकार पर खतरा मंडरा रहा है तो वे हिंसा का सहारा ले कर अपनी खोई शक्ति को वापस पाने की कोशिश करते हैं।

यह पुरूष खतरे मे पडी अपनी शक्ति को नियंत्रित करने तथा उसे पुनः स्थापित करने के लिये हिंसा को एक माध्यम के रूप मे इस्तेमाल करते हैं। बदलते समय मे पुरूष नारी के साथ अपने संबंधों‌ मे आये परिवर्तन को ले कर भयभीत है और इसे अपने लिये खतरा मान रहा है। मौजूदा समाजिक व्यवस्था मे, जो नारी‌ को बराबरी का दर्जा प्रदान करती है, पुरूष के लिये नारी के साथ सहज संबंधों‌ को समझ पाना दुरूह काम लग रहा है।

यह निस्कर्ष, ग्रेनेडा विश्वविद्यालय की‌ प्रो. कार्मेन हरेरा इन्रिक्यूज, ने निकाले। इस शोध का अधार यह प्रश्न था कि "क्यों कुछ विशेष पुरूष कुछ विशेष नारियों को प्रताडित करते है, या अपनी हिंसा का शिकार बनाते है?"

नारियाँ आमतौर पर अपनी महत्वाकांक्षाओं, सपनों की तिलांजली दे देती है। शोध के अनुसार इसका एक कारण अपने पुरूष साथी के साथ टकराव, या संघर्ष की स्थिति को टालना है।

जिन नारियों‌ को यह डर लगता है कि यदि उन्होने अपनी महत्वकाक्षांओ से पल्ला नही झाडा तो उनके पुरूष उनके साथ हिंसक व्यवहार करेंगे, और वे अपनी सुरक्षा के बदले अपने सपनों‌ की बलि दे देती हैं।

भारत सरीखी नये राष्ट्र जो अभी भी‌ पुरानी, सडी‌ गली मान्यताओं‌ मे आडंबरी पुरूषों‌ की वजह से फंसा हुआ है, वहाँ‌ यह स्थिति आम है। बहुत से तथा-कथित अधिकारी/'वैज्ञानिक' मिल जायेंगे जिनकी पत्नियों‌ ने आज तक कंम्प्यूटर का 'क' तथ न देखा होगा। कुंठित वैज्ञानिक महोदय से शोध तो होने से रहा; शोध तो तब हो जब सोच वैज्ञानिक हो। रात भर बैठ कर ब्लागिंग करेंगे और पत्नी या तो खाना बनायेंगी‌ या बच्चे पालेंगी। आस पास यदि कोई महत्वाकांक्षी महिला दिख भी जाये तो उसका जीना हराम कर देंगे। साम, दाम, दंड भेद -- सबका इस्तेमाल होगा नारी की महत्वाकांक्षा को कुचलने के लिये। यहाँ नारी को क्या पहनना चाहिये, उसका चरित्र, उसकी 'जिम्मेदारियाँ' सब गिनायी जायेंगी -- क्या यह हिंसा नही है?

विषय: 


Main menu 2

by Dr. Radut.