मुझे तो बहुत पहले से यह शंका थी कि आदमी के अनेक मस्तिष्क हैं क्योंकि मैं देखता हूं कि आदमी अपने अंदर बहुत बँटा बँटा-सा रहता है। मुझे लगता है कि अभी और भी मस्तिष्कों की खोज होगी।
पुरुष के हृदय का रास्ता पेट से होकर जाता है, यह कथन अब वैज्ञानिक भी गंभीरतापूर्वक ले रहे हैं। खोज से ज्ञात हुआ है कि पेट में भी न्यूरान होते हैं जो पाचन की पेंचीदी क्रिया पर तो नियंत्रण करते ही हैं, वे हमारी मनस्थिति का निर्माण भी करते हैं - खान पान में जो आनन्द आता है उसका निर्माण अन्ननाल और अँतड़ियों में स्थित न्यूरान ही करते हैं, यद्यपि स्वतंत्र रूप से नहीं वरन असली मस्तिष्क की सहायता से करते हैं। यह कहना तो सच नहीं होगा कि इस तरह हम दो बार सोचते हैं, एक बार पेट के मस्तिष्क के द्वारा और दूसरी बार असली मस्तिष्क के द्वारा, क्योंकि सोचने का काम, भगवान को धन्यवाद, तो केवल असली मस्तिष्क ही करता है। खान पान के नाटक में हम अभी भी बहुत समय खुशी खुशी लगाते हैं, यदि पेट महाराज स्वतन्त्र रहते तब तो शायद हम खाने के लिये ही जीवन जीते!
हमारी संवेदनाओं के अनेक कार्यकलाप, बहुत संभव है कि, प्रमुखत: हमारे पेट में स्थित न्यूरान सम्हालते हैं। किसी कठिन यात्रा पर जाना हो, किसी प्रतियोगिता में भाग लेना हो या परीक्षा देना हो, शारीरिक या मानसिक तनाव के परिणामस्वरूप हमारे पेटों में एक अजीब सी अनुभूति होती है। इन सारे कार्यों में हमारी अँतड़ियों और अन्ननाल के अस्तरों के निवासी तान्त्रिकी प्रेषित्रों सहित न्यूरानों का भी योगदान होता है।
न्यूरानों के इस तंत्र को डा. माइकैल जैर्शन 'द्वितीय मस्तिष्क' की संज्ञा देते हैं। द्वितीय मस्तिष्क में १० करोड न्यूरान होते हैं जिनकी संख्या बाह्यतांत्रिकीय तन्त्र (peripheral nervous system) या रीढ़-रज्जु (spinal cord) के न्यूरानों से भी अधिक है।
बाह्यतांत्रिकीय तन्त्र का काम, जो कि बहुत मह्त्वपूर्ण है, केन्द्रीय तांत्रिका तन्त्र (मस्तिष्क तथा रीढ़रज्जु में स्थित) तथा शारीरिक अंगों को जोड़ना रहता है। डा. माइकैल जैर्शन तांत्रिकीयजठरांत्रिकी (neurogastroenterology) के विशेषज्ञ हैं और न्यूयार्क प्रैसबिटीरियन अस्पताल/कोलम्बिया विश्वविद्यालय चिकित्सा केन्द्र के शारीर तथा कोशिका जैविकी विभाग के अध्यक्ष हैं। वे कहते हैं कि न केवल दूसरा मस्तिष्क पाचन तथा निष्कासन के जटिल तथा समय साध्य कार्य से प्रथम मस्तिष्क को मुक्त रखता है, वरन हमें रोगों से लड़ने की शक्ति भी देता और हमारे 'मूड' का नियंत्रण भी करता है। जब कि शरीर के अन्य अवयव मस्तिष्क से ही संकेत ग्रहण करते हैं, अंतरंग तंत्रिका (Primary Visceral) की ९०% नलिकाएं द्वितीय मस्तिष्क से संकेत प्रथम मस्तिष्क की ओर ले जाती हैं ! 'पेट का सवाल है' शायद इसीलिये सबसे बड़ा सवाल है जिसे हल करने के लिये ही प्रकृति ने पेट को स्वतंत्र मस्तिष्क दिया है ताकि प्रथम मस्तिष्क अपने सामान्य तथा उदात्त कार्य कर सके।