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भारतीय वैज्ञानिकों ने खोजा प्लास्टिक पचाने का तरीका

प्लास्टिक भारत सरीखे देशों के लिये पर्यावरणीय समस्या बनती जा रही है। आसानी से इसका निष्पादन न हो पाने की वजह से यह एक गंभीर समस्या का रूप ले चुकी है। यूरोप के विकसित देशों मे तो घर से निकलने वाले कूडे के लिये उन्न्त व्यवस्था है -- जैसे यहाँ जर्मनी मे कूडा तीन हिस्सों मे बांट दिया जाता है। हर घर मे तीन कूडेदान होते है और सब नियमानुसार उसी मे करकट डालते हैं। प्लास्टिक इत्यादि को रिसाईकल कर लिया जाता है। भारत सरीखे देश के पास न तो उन्नत साधन हैं और न ही नागरिक किसी बात को ले कर जागरूक -- जहाँ देखिये लोगों ने कूडाघर बना रखा है।

प्रयासों के बावजूद भारत सरीखे बहुभाषीय, बहुजातिय, बहुसांस्कृतिक राष्ट्र (जिसमे एक सर्वमान्य भाषा तक को ले कर सहमति नही बन पा रही है और अंग्रेजी हावी है) मे अभी इस प्रकार के आदतें डालने मे बहुत समय लगेगा। यहाँ ऐसे उपायों‌ की जरूरत है जिससे प्लास्टिक सरीखा कूडा किसी प्रकार सड़-गल कर प्राकृतिक रूप से समाप्त हो जाये।

अभी अभी प्राप्त समाचार के अनुसार भारतीय मूल के वैज्ञानिक मुकेश डोबल तथा त्रिशूल अर्थम ने इस समस्या का उपाय खोज लिया है। जैसे पकाये जाने से भोजन के पाचन मे मदद मिलती है उसी प्रकार पालीकार्बोनेट प्लास्टिक को 'पकाने' से उसके निस्तारण मे मदद मिल सकती है।

भारतीय वैज्ञानिकों के अनुसार विभिन्न कंपनिया साल भर मे लगभग २.७ मिलियन टन प्लाटिक का उत्पाद करती हैं। इस प्लास्टिक मे बिस्फेनोल ए (बी.पी.ए.) भारी मात्रा मे होता है। पालीकार्बोनेट एक अड़ियल किस्म की प्लास्टिक है। इसका इस्तेमाल पेचकस, चश्मे के लेंस, डीवीडी इत्यादि के निर्माण मे होता है।

यह तो आप जानते ही है कि पालीकार्बोनेट प्लास्टिक मे पाया जाने वाला बिस्फेनोल ए ही समस्या की असली जड है। बहुत से शोधकार्यो मे यह पाया गया है कि पर्यावरण के अलावा इस बिस्फेनोल ए का स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पडता है। इसी के चलते इस दिशा मे खोज कार्य चल रहा है कि कूडे मे फेंकी गयी -- या अनुपयोगी -- प्लास्टिक का इस प्रकार निस्तारण हो कि उसमे से बिस्फेनोल ए  निकल कर पर्यावरण को प्रदूषित न कर पाये।

भारतीय वैज्ञानिकों ने पालीकार्बोनेट को पराबैगनी किरणों मे रखा, फिर उसे गर्म किया उसके उपरांत उसे तीन प्रकार की फफूंद मे डाल दिया। इन फफूंदों मे व्हाईट राट नामक प्रसिद्ध फफूंद भी शामिल है। व्हाईट राट फफंद का प्रयोग आम तौर पर प्रदूषकों के शुद्धिकरण के लिये किया जाता है।

वैज्ञानिकों‌ ने देखा कि पराबैगनी किरणों तथा गर्मी द्वारा 'पकाई' गयी प्लास्टिक पर यह फफूंद प्रभावी तरीके से उगी और पनपी। आश्चर्य की‌ बात यह कि इस फफूंद ने उस विनाशकारी (बी.पी.ए.) और प्लास्टिक मे मिले अन्य पदार्थो को अपने 'भोजन' (ऊर्जा) का स्रोत बना लिया और प्लास्टिक को गला दिया। आमतौर पर १२ महीने बाद भी बिना पकाई प्लास्टिक का जरा सा भी क्षय नही होता है।

इन दोनो भारतीय वैज्ञानिकों ने इस समस्या का प्रभावी हल निकाला है। अब काफी कुछ सरकारी विभागों तथा उद्योगों पर निरभर करता है कि वे किस प्रकार इस तकनीक का इस्तेमाल करके इस समस्या से भारत तथा अन्य देशों को मुक्त कराते हैं।

-- स्वप्निल भारतीय

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by Dr. Radut.