हिन्दी के सुप्रसिद्ध विज्ञान-कथा लेखक डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय ने अपने नये संग्रह : 'वैज्ञानिक पुरा कथाएँ' में हमारे पौराणिक वांग्मय से चुनकर 40 पुरा कथाओं को, वैज्ञानिक व्याख्या सहित प्रस्तुत किया है। यह प्रस्तुति इन पुरा कथाओं का न तो पुनर्पाठ है और न ही उनकी पुर्नरचना। लेखक ने कथाओं के मूल स्वरूप को सुरक्षित रखते हुए उनमें विन्यस्त वैज्ञानिक आशयों एवम् रूपाकारों की व्याख्या की है। लेखक ने प्रत्येक कथा के आरम्भ में उसमें अन्तर्निहित वैज्ञानिक तथ्यों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया है और इन विज्ञान-सम्मत संदर्भों के परिप्रेक्ष्य में इन कथाओं का एक नया ही अर्थ और स्वरूप हमारे सामने स्पष्ट होता है।
भारत की समृद्ध वैज्ञानिक परम्पराएँ अत्यन्त प्राचीन हैं और उससे भी कहीं ज्यादा प्राचीन हैं वांग्मय में अन्तर्गुम्फ़ित वे वैज्ञानिक तथ्य जो अनुभूति के स्तर पर हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा देखे गये और जो उनके द्वारा काव्याख्यात्मक संरचनाओं में अभिव्यक्त हुए। इस प्रकार ये पुरा कथाएं निसृत हुईं। इन कथाओं की पौराणिकता, भाषा की अलंकारिक भव्यता, और उनमें रचे-बसे विलक्षण तथ्य-सब एक विराट रूपकीय आख्यान के रूप में हमें चमत्कृत करते रहे हैंं। डॉ. उपाध्याय ने इन कहानियों के विलक्षण तथ्यों की सटीक वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत कर हमें पुन: चमत्कृत किया है। हमारे वैदिक मनीषी मूलत: कवि थे उन्होंने अपनी विराट कल्पनाशीलता में विज्ञान के उन सत्यों का साक्षात्कार प्रज्ञा के उच्चतम स्तरों पर किया, जिन तक पहुँचने में विज्ञान को शताब्दियाँ लग गयीं। ये कथाएँ भारत के प्राचीन मनीषियों की अद्भुत मेधा और सृजनात्मकता की प्रतीक हैं। इनमें रचे गये कथा-रूपकों के साथ विज्ञान की अवधारणाओं का सामंजस्य देख सकने के लिए भी गहरी अन्तर्दृष्टि और कल्पनाशीलता की आवश्यकता है।
इन कहानियों का वैज्ञानिक-फलक अत्यन्त व्यापक है। इनमें शल्यक्रिया, अमरत्व और सुदीर्घ यौवन प्रदान करने वाले रसायन, कृत्रिम गर्भाधान, क्लोनिंग, भू-गर्भीय परिवर्ततन के साथ गणित और खगोल की अनेक अधुनातन अवधारणाओं का आद्य-स्वरूप देखा जा सकता है।
त्रिशंकु की कथा से हम सब भली-भाँति परिचित हैं। राजा त्रिशंकु ने सशरीर स्वर्ग जाने की इच्छा की थी। ऋषि विश्वामित्र ने अपने तपोबल के प्रभाव से उन्हें स्वर्ग भेज दिया। परन्तु इन्द्र ने उन्हें स्वर्ग से नीचे गिरा दिया। विश्वामित्र ने गिरते हुए त्रिशंकु को अंतरिक्ष में स्थिर कर दिया। माना जाता है कि वे आज भी उसी जगह अधोमुख किये स्थिर हैं। पढ़ने पर कथा में विन्यस्त किसी वैज्ञानिक तथ्य का आभास नहीं होता -पर यथार्थ में यह एक वैज्ञानिक सत्य पर आधारित अद्भुत कथा है। सुप्रसिद्ध फ्रांसीसी गणितज्ञ लाग्रांज (1736-1813) ने सिद्ध किया कि पृथ्वी, सूर्य और चन्द्रमा से बने त्रिकोण में एक बिन्दु ऐसा है जहाँ इन तीनों का गुरुत्त्वाकर्षण शून्य हो जाता है। इसे लाग्रांज बिन्दु कहते हैंं। त्रिशंकु की कथा इसी का विस्तार और मानवीकरण हैं। त्रिशंकु अंतरिक्ष में लाग्रांज बिन्दु पर लटके हुए हैं। इस व्याख्या से यह प्रतीति भी होती है कि भारतीय मनीषियों ने अपनी अनुभूति में अंतरिक्ष में गुरुत्त्वाकर्षण विहीन क्षेत्र की कल्पना की थी और उसके रूपकीय आख्यान को कथा के रूप में प्रस्तुत किया। सदियों बाद वैज्ञानिकों ने उनकी इस कल्पना की पुष्टि की।
इसी प्रकार ध्रुव की कथा गणितीय-ज्योतिष पर आधारित एक सुन्दर रूपक है। पौराणिक मान्यता है कि राजा ध्रुव का शासनकाल 36,000 वर्षों का है। आकाश में स्थित ध्रुव तारा एक राशि पर 3,000 वर्षों तक रहता हैं इस प्रकार बाहर राशियों पर इसकी कुल अवधि 36,000 वर्षों की होगी- यही राजा ध्रुव के राज्यकाल की अवधि है। 36,000 उपरान्त कोई दूसरा तारा ध्रुव तारा बनेगा। ध्रुव की पत्नी भूमि (पृथ्वी) है- जो 365 दिनों में सूर्य की परिक्रमा करती हैं पृथ्वी की इस गति को वत्सर कहते हैं, जो संवत् से मिलकर संवत्सर हो गया- यह राजा ध्रुव का ज्येष्ठ पुत्र है। सूर्य का अपने अक्ष पर घूम कर पुन: उसी स्थान पर आना एक कल्प कहलाता है। यह कल्प ही राजा ध्रुव का दूसरा पुत्र है। ध्रुव की कथा नारद-विष्णु पुराण में है।
इसी प्रकार श्रीमद् भागवत् पुराण में विर्णत राजा ककुघ्न की कथा में काल सम्बन्धी गणनाओं के संकेत हैं। ब्रह्मा का एक कल्प अर्थात् 432 ×107के एक वर्ष में हमारे 311040× 108 वर्ष होते हैं। ये सब गणित-ज्योतिष के काल-गणना सम्बन्धी तथ्य हैं- और इन्हीं के तानों-बानों से रची गयी है राजा ककुघ्न की कथा।
द्रोणाचार्य के जन्म की कथा में आज की वीट्रो-फर्टीलाइजेशन प्रविधियों की प्रतिछवि देखी जा सकती हे। कभी एडुलस इक्सले ने कृत्रिम गर्भाधान की कल्पना की थी- जिसे जैव-प्रौद्यौगिकी ने मूर्त रूप दिया है। निश्चेषित डिंबाणुओं को एक माइक्रोचिप अथवा ऑयल-ड्रापलेट पर चिपकाकर उन्हें विकसित किया जाता है और कोशिका-विभाजन प्रारम्भ होने पर उन्हें पुन: गर्भाशय अथवा कृत्रिम गर्भाशय में स्थापित किया जाता है। यह तकनीक जापान के वैज्ञानिकों ने विकसित की है। इन्हीं परिष्कृत तकनीकों का आद्य-स्वरूप-घृत के माध्यम से कोशिका संवर्धन के प्रयासों की कथा कौरवों के जन्म की कहानी हैं आज से लगभग पाँच हजार वर्ष पूर्व-हमारे चिंतनशील ऋषियों द्वारा-कृत्रिम वातावरण में कोशिका-विभाजन का जो स्वप्न देखा था, उसे अब जापानी वैज्ञानिकों ने साकार कर दिखाया है। इस दृष्टि से कौरवों के जन्म की कथा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
मानव और जीवों की क्लेनिंग से अर्धमानव-पशु के निर्माण की विलक्षण कल्पना में नृसिंह अवतार की कथा का उत्स ढूँढा जा सकता है। मानव शरीर विज्ञानी अब यह स्वीकार करते हैं कि पुरुष स्तनाग्रो में भी दूध का स्त्राव प्रोलैक्टिन नामक हारमोन की अधिकता से सम्भव है। एनामेलीज एंड क्यूरोसिटीज ऑफ मेडीसिन (1896) नामक ग्रन्थ में इस प्रकार की कई घटनाओं का सप्रमाण उल्लेख है। योरोजिन और डायगोिक्सन नाम की औषाधियों के प्रभाव से भी पुरुषों में दूध-स्त्राव सम्भव है। राजा मान्धाता और युवनाश्व की कथा इसी वैज्ञानिक तथ्य का रूपक है।
अमरत्व और दीर्घ यौवन अब कोरी कल्पना नहीं है। शीघ्र ही जीव-विज्ञानी ऐसे प्रभावकारी रसायन खोजने में सफल होंगे। महर्षी च्यवन और राजा ययाति की कथाओं में ऐसी ही औषाधियों का स्वप्न हमारे मनीषियों ने देखा था। लिंग-परिवर्तन का उल्लेख शिखंडी की कथा में है तो गणेश की कथा में अंग प्रत्यारोपण की शल्य क्रिया का संकेत हैं।
पृथ्वी पर हो रहे भू-गर्भीय परिवर्तनों पर आधारित है महर्षी अगस्त्य और विंध्याचल पर्वत की कथा! ऋग्वेद में भी पर्वतों की ऊँचाइयों में परिवर्तन का उल्लेख पाया जाता है। पृथ्वी के गर्भ में टेक्टानिक प्लेटो के सिकुड़ने और दक्षिण से उत्तर की तरफ खिंचने से हिमालय ऊँचा हो गया और विंध्य पर्वत माला नीची होकर स्थिर हो गयीं महर्षी अगस्त्य- ऋग्वेद के मन्त्रों के सृष्टा, शस्त्र-विद्या में निपुण एक प्रसिद्ध आचार्य थे। वे उत्तर और दक्षिण भारत की संस्कृतियों के प्रथम समन्नवयक थे। सम्भवतया-दक्षिणी गोलार्ध में में स्थित केनोपस नामका तारा-ईसा से 12,000 वर्ष पूर्व अपने 25,725 वर्षों के 5-80 अक्षांश पर दिखने के चक्र में, महर्षी अगस्त्य को उनकी दक्षिण यात्रा के समय पहली बार दिखा होगां यह तारा अगस्त्य की दक्षिण यात्रा का प्रतीक है और इसीलिये भारतीय साहित्य में इसे अगस्त्य के नाम से पुकारा जाता है। इसी घटना का काव्यात्मक आख्यान हमारे पुराणों में विंध्यगिरि की कथा के रूप में विर्णत है। ब्रह्मा के आदेश से सूर्य सुमेरु पर्वत की परिक्रमा करते थे। विंध्य ने उसकी भी परिक्रमा करने की प्रार्थना की। सूर्य के मना करने पर -विंध्य सूर्य का मार्ग अवरुद्ध करने के लिये ऊपर की ओर बढ़ने लगा। तब देवताओं ने अगस्त्य से प्रार्थना की। अगस्त्य अपनी पत्नी लोपामुद्रा के साथ विंध्य के पास गये और कहा कि,`हे पर्वतराज! मैं दक्षिण की ओर जाना चाहता हूँ तुम मुझे जाने का मार्ग दो और जब तक मैं नहीं लौटता, तुम मेरी प्रतीक्षा करो। विंध्य ने अपनी ऊँचाई कम कर अगस्त्य को जाने का मार्ग दिया और तब से आज तक उसी प्रकार उनके लौटने की प्रतीक्षा कर रहा है।
इसी प्रकार अन्य कथाओं में-जो वैज्ञानिक तथ्य छिपे हैं, डॉ. उपाध्याय ने उनकी ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया है।
पुस्तक की भाषा पौराणिक आभा और वैज्ञानिक अभिव्यंजना लिये हुए है। लेखक का मानना है कि विज्ञान-कथाओं का उद्गम-स्थल भारत है। इन पुरा कथाओं को पढ़ने के बाद इस निष्कर्ष से असहमत होने का कोई कारण नहीं दिखाई पड़ता।
समीक्षक: प्रो.महेश दुबे
पुस्तक : वैज्ञानिक पुराकथाएं
लेखक : डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय
प्रकाशक : आर्य प्रकाशन मंडल, गांधीनगर दिल्ली-31
संस्करण : प्रथम 2009, पृष्ठ संख्या : 104
मूल्य : 130.00 रूपये