पिछले हफ़्ते नासा ने चांद पर दो मानव निर्मित उपकरण गिराये थे, जिनमे से एक था राकेट और दूसरी थी एक प्रयोगशाला। इस मिशन का उद्देश्य वहाँ पानी की खोज था। रिपोर्ट के अनुसार शोधकर्ता अब इस टक्कर द्वारा एकत्रित आकडों का अध्यन कर रहें है और किसी भी रिपोर्ट के आने मे लगभग २ हफ़्ते का समय लग जायेगा, और तब तक कयास ही लगाया जा सकता है।
पालोमार वेधशाला (आब्जरवेट्री) के वैज्ञानिक इस घटना का अध्यन पृथ्वी से कर रहे है और उन्होने एक २०० इन्च की हेल दूरबीन से इस घटना को अंकित (रिकार्ड) किया और उस गढ्ढे की तस्वीरें लीं । यही गढ्ढा ही इस पूरे मिशन का केन्द्र बिन्दु है। इस गढ्ढे का चुनाव इस लिये किया गया था क्योकि ऐसा माना गया था कि यहीं पर जमी बर्फ़ होने की संभावना है।
पाठकों के लिये कल्किआन ने उस दुर्लभ घटना के चित्र भी यहाँ प्रस्तुत किये हैं।
नासा के मिशन दल द्वारा यह माना जा रहा था कि इस टकराव से वहाँ धूल व बर्फ़ की एक विशाल फ़ुहार वातावरण मे उडेगी, जिसका अध्यन यहाँ पृथ्वी से भी किया जा सकेगा। लेकिन ऐसा कुछ भी नही हुआ। नासा का कहना है कि लोगों ने जरूरत से ज्यादा उम्मीदे लगा रखी थी और हालीवुड की किसी फ़िल्म जैसे नजारों की अपेक्षा कर रहे थे। वहीं दूसरी तरफ़ मीडिया का आरोप है कि नासा ने स्वंय ही इस बात को बढा चढा कर बताया था।
नये पाठकों के लिये इस घटना की पृष्ठभूमि:
10 अक्टूबर २००९: शाम लगभग ७.३० बजे एक दो टन का राकेट चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव के एक क्रेटर (गढ्ढे) से टकरायेगा। इससे उठने वाले गुबार -- जो कि गैस और धूल से भरा होगा -- मे वैज्ञानिक चन्द्रमा पर बर्फ़ या पानी की मौजूदगी का पता लगाने की चेष्ठा करेंगे।
यह मिशन नासा के लूनर क्रेटर आबजर्वेशन एन्ड सेन्सिन्ग सैटेलाईट मिशन (एल.सी.आर.ओ.एस.एस) का हिस्सा है। एल.सी.आर.ओ.एस.एस नासा द्वारा संचालित एक रोबोटिक अन्तरिक्ष यान है जो प्रथ्वी के चक्कर लागाने के बाद अब आज चन्द्रमा से टकरायेगा। एल.सी.आर.ओ.एस.एस मिशन का उद्देश्य चन्द्रमा पर पानी की खोज है। इस यान को १८ जून सन् २००९ मे प्रथ्वी से छोडा गया था।
इस मिशन के दो अव्यव हैं -- एक हमलावर राकेट और दूसरा उस राकेट का नियंत्रक यान जो अपने आप मे एक आधुनिक प्रयोगशाला भी है। जहाँ एक राकेट चन्द्रमा को टक्कर मारेगा, वहीं वह नियंत्रक यान उस बमबारी वाले क्षेत्र की तरफ़ बढ्ता हुआ इस बमवर्षा की तसवीरें लेगा और उठने वाले गुबार का अध्यन करता हुआ उसके बारे मे सटीक आंकडे प्रथ्वी को भेजेगा।
हमले की सटीक रणनीति:
योजना के अनुसार तीन अन्तरिक्ष यान एक साथ चन्द्रमा की तरफ़ भेजे गये थे -- जिनमे प्रमुख है एल. आर. ओ. (लूनर रिकोनेसेन्स आर्बिटर) या चंद्रमा टोही यान। अन्य दो हिस्से, जैसा की पहले बताया गया हैं 'द शेफ़र्डिग स्पेसक्राफ़्ट' या हांकने वाला यान तथा सेन्टुआर राकेट। यह तीनों यान एक दूसरे के सम्पर्क मे हैं और मिशन के लिये आकडे जुटा रहे हैं।
द शेफ़र्डिग स्पेसक्राफ़्ट द्वारा संचालित सेन्टुआर राकेट बंदूक की गोली की दो गुनी रफ़्तार से चन्द्रमा की सतह से टकरायेगा और एक बडा गढ्ढा निर्मित करेगा। इस टकराव की वजह से बहुत सी धूल, गैस तथा उष्मा की वजह से शायद वाष्पिक्रत जल या बर्फ़ भी वातावरण मे उडेगी। तो द शेफ़र्डिग स्पेसक्राफ़्ट इन टक्कर की तस्वीरें वा आकडे इक्ट्ठा करके प्रथ्वी को भेजता रहेगा, लेकिन खुद भी सेन्टुआर राकेट के रास्ते पर अग्रसर रहेगा -- अर्थात ठीक चार मिनट बाद वह भी चन्द्रमा से जा टकरायेगा। उसी स्थान पर यह हुई यह दूसरी टक्कर एक और विशाल गढढा निर्मित करेगी।
यह दूसरी टक्कर इस लिये जरूरी है क्योंकि द शेफ़र्डिग स्पेसक्राफ़् पर बहुत से वैज्ञानिक उपकरण लगे हुए है जिन्हे पानी का पता लगाने के लिये राकेट की टक्कर से उठने वाली धूल का रासायनिक विश्लेषण करना होगा और उसका एक ही रास्ता है -- धूल से हो कर गुजरना। इस खोज के लिये द शेफ़र्डिग स्पेसक्राफ़् को यह कुर्बानी देनी होगी।
इस यान के चन्द्रमा से टकरा कर नष्ट हो जाने के उपरान्त शोध और आकडों की खोज-बीन का जिम्मा प्रथ्वी स्थित वेधशालाओ, प्रयोगशालाओं पर आ जायेगा।
इस टक्कर के लिये जिस स्थान को चुना गया है, वहाँ पर पानी मिलने की संभावना सबसे अधिक है अत: नासा, तथा इस मिशन की सफ़लता, के लिये टकराव का स्टीक होना परम आवश्यक है।
चांद पर नासा का यह हमला इतना विशाल होगा कि अगर आपके पास एक अच्छी दूरबीन है तो आप अपने घर बैठे बैठे इस हमले से उठने वाले गुबार देख सकते हैं।