हरीश गोयल एक सिद्धहस्त तथा वरिष्ठ विज्ञान कथाकार हैं जिनकी कहानियां दशकों से हिन्दी विज्ञान साहित्य के ख़जाने को भरती रही हैं। तो आइये करते हैं उनसे दो-चार बातें।
स्वप्निल भारतीय: विज्ञानं कथाओं को लेकर आपके मन में रूचि कब पैदा हुई?
हरीश गोयल: प्रारंभ में मेरी रूचि साहित्य लिखने में थी। में बचपन में कविताएँ तथा कहानियां लिखा करता था लेकिन वय के बढ़ने के साथ साथ मेरी रूचि विज्ञानं में भी बढ़ने लगी। ऐसा विज्ञानं का विद्यार्थी बनने के कारण हुआ। युवा होने पर मेरे मन में ऐसी कथाएँ लिखने का हुआ जो विज्ञानं से सम्बंधित हो। में विज्ञानं को साहित्य से मिलाना चाहता था। मैं अपनी उर्वर कल्पना को विज्ञानं के साथ पिरोकर स्वरुप देना चाहता था। विज्ञानं को निबंध के साथ देने पर ऐसा संभव नहीं था। न ही वैज्ञानिकों की जीवनी या विज्ञानं के अकाट्य तथ्यों पर आधारित कहानी गढ़ देने से यह संभव था। ऐसी कहानी केवल विज्ञानं विषयक बन कर रह जाती है। मैं चाहता था कि मेरी कहानियां मीमांसात्मक वैज्ञानिक कहानियों का हिस्सा बने।
स्वप्निल भारतीय: क्या आपको याद है कि आपने सबसे पहले कौन सी विज्ञान कथा पढ़ी और उसका आप पर क्या प्रभाव पड़ा ?
हरीश गोयल: यह ठीक से कहना मुश्किल है। मैं बचपन मैं कॉमिक्स पढ़ा करता था। जैसे फैटम,बैट्समैन, टार्जन आदि। तब मैं यह नहीं जनता था कि ये कॉमिक्स विज्ञान कथाओं पर आधारित है इसके अतिरिक्त कई वर्ल्ड क्लासिक्स की श्रृंखलाएं पढ़ी यथा एलिस इन वंडरलैंड, वाटर बेबीज आदि। एडगर राईस बरोज की बारसम सीरीज तथा मून सीरीज ने मुझ पर काफी प्रभाव डाला तब मैं यह नहीं जानता था कि ये विज्ञानं कथाएँ है। इसके पश्चात् मैंने जूल्स वरने की जर्नी टू दी सेंटर ऑफ दि अर्थ पढ़ी एच। जी.वेल्स की इन विजिबल मैन टाइम मशीन, प्लेतनर स्टोरी ,एपिओर्निस आईलैंड, दि मैन हू कुद वर्क मिरेकल ग्रिजली फोक आदि कथाओं का आनंद लिया। मैं आर्थर क्लार्क की स्पेस ओडिशी तथा आइजक एसिमोव की एसिमोव्ज मिस्ट्रीज को नहीं भुला सकता इसके पश्चात् मैंने पेंग्विन साइंसफिक्शन क्लासिक्स को पढ़ा। मैने साइंस फिक्शन को प्लेतनर स्टोरी से जाना। यह मैंने १९६९ में पढ़ी कथा में गोद्फ्रेड प्लेत्नर को विबल एक थैली थमता है जिसमें एक हरे रंग का पाउडर होता है । प्रयोगशाला में प्लेतनर उसे परखनली में डालता है. तथा उसका जल एवं कई अम्लों से परीक्षण करता है इसका कोई परिणाम नहीं निकलता है वह पाउडर की करीब आधी बोतल को एक स्लेट पर उढेल देता है तथा माचिस की एक तीली लगा देता है तत्काल प्रयोगशाला में विस्फोट हो जाता है इस धमाके के साथ ही गोद्फ्रेड प्लेटनर अद्रश्य हो जाता है मुझ पर इसका इतना प्रभाव पड़ा कि मैंने विज्ञानं कथाएँ लिखना प्रारंभ कर दिया।
स्वप्निल भारतीय: आपने विज्ञान कथा कब लिखना प्रारंभ किया? उसकी प्रेरणा क्या थी ?
हरीश गोयल: मैं जब द्वितीय वर्स स्नातक का छात्र था तथा विज्ञानं का छात्र था मैंने विज्ञानं कथाएँ लिखना प्रारंभ कर दिया। यह सन्१९६९ की बात है। यह एक स्व-स्फूर्त प्रेरणा थी। मैं कथा के माध्यम से नई नई खोंजों का परिचय देना चाहता था लेकिन यह परिचय संकेतात्मक होता था न कि उपदेशात्मक। मैं कथा के माध्यम से नए खोजे गए वैज्ञानिक शब्द के प्रति भावात्मक रिश्ता कायम करना चाहता था जैसे मेरी विज्ञानं कथा कॉम्लेक्स-३९ मैं बीटापिक्टोरिस तारा है अथवा मेरी विज्ञानं कथा द्रूमा में डबल ऑप्टिकल तारे हैं। काम्प्लेक्स -३९ मेरी प्रथम विज्ञानं कथा है मैंने इसे १९६९ में लिखा लेकिन इसका प्रकाशन १९८७ में हुआ। मैं कथा में अमूर्त खोजे गये शब्द को मूर्त स्वरुप देना चाहता था यथा मेरी कालजयी यात्रा नामक उपन्यास में तेकायण कण गणितीय आधार पर खोजा गया शब्द है यह स्पेक्यूलेतिव है लेकिन मैंने तेकायन रॉकेट की कल्पना की यह एक मूर्त स्वरुप है। यह के भविष्योन्मुखी कल्पना है। विज्ञानकथा कॉम्प्लेक्स -३९में कॉम्प्लेक्स-३९ बाह्य अन्तरिक्षवासियों की एक शक्ति है जिसका सामना पृथ्वीवासी करते हैं।
स्वप्निल भारतीय: आपकी सबसे नवीनतम विज्ञानं कथा कौन सी है ? कृपया उसके बारे में बताएं।
हरीश गोयल: मेरी सबसे नवीनतम विज्ञानं कथा एलियंस से युद्ध है। कथा में एलियंस १५३ प्रकाशवर्ष दूर एक ग्रह के वासी पृथ्वी पर आक्रमण कर देते हैं। अधिकांश पृथ्वीवासी भूमिगत स्थलों में वास करने लगते हैं। वे एलियंस का सामना करते हैं। इसी बीच एक एलियन की कुदृष्टि नायिका एंजेलिना पर पड़ जाती है। वह उसका पीछा करता है एंजेलिना तथा कथा का नायक हार्वर्ड एलियंस के विरुद्ध युद्ध में शामिल हो जाता है कथा का नायक तथा नायिका भूमिगत भूलभुलैया में होते हुए अंटार्टिका से न्यूयार्क पहुँच जाते हैं। बाहर निकलकर नायक एलियंस के विरुद्ध युद्ध में खुलकर शामिल हो जाता है अंत में एलियंस पृथ्वी का विध्वंश करने में सफल हो जाते है तथा वहां से चले जाते हैं। अब पृथ्वी का नवनिर्माण किया जाता है इसमें नैनोटेक्नोलोजी अहम भूमिका निभाती है यह भूमंडल में नष्ट हुई ओजोन छतरी को फिर से कायम कर देती है यही नहीं वायु ,जल तथा थल प्रदुषण एवं रेडियो सक्रियता को भी दूर कर देती है। पृथ्वी पर से आल्हाद छा जाता है।
स्वप्निल भारतीय: भारत में हिंदी विज्ञानं कथाओं के बारे में क्या विचार है?
हरीश गोयल: भारत में हिंदी का विज्ञानं कथा साहित्य अब अत्यंत समृद्ध हो चुका है। हम अब आधुनिक विज्ञानं तथा नई नई खोजों का प्रयोग हिंदी विज्ञानं कथाओं में करते है जीन इंजीनिअरिंग, ह्यूमन जीनोम प्रोजेक्ट, रोबोटिक्स, क्लोनिंग, अन्तरिक्ष, पर्यावरण तथा विज्ञानं की अनेक धारणाओं का उपयोग बखूबी से करने लगे है कथा को पिरोते समय हम मानवीय संवेदना का पूरा ध्यान रखते हैं। विज्ञानं कथाएँ भविष्योन्मुखी होती है हिंदी विज्ञानं कथाएँ सोद्देश्य होती है निरी फंतासी नहीं होती।
स्वप्निल भारतीय: अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि हिंदी विज्ञानं कथाकार शोध पर पूरा ध्यान नहीं देते कुछ कथाओं में बचकानी गलतियाँ मिल जाती है?
हरीश गोयल: नहीं, यह आरोप पूरी तरह निराधार है। आधुनिक विज्ञानं कथाकार वैज्ञानिक शोधों पर पूरा ध्यान दे रहे हैं। अन्तरिक्ष, नैनोटेक्नोलोजी, जीन इंजीनिअरिंग, क्लोनिंग, ह्यूमन जीनोम प्रोजेक्ट, मेडिसिन इलेक्ट्रानिक्स कंप्यूटरसाइंस एवं अन्य क्षेत्रों में हो रही शोधों को को हिंदी विज्ञानं कथाकार अपनी कथाओं में पिरो रहे हैं। वे इनसे होने वाली क्रांतियों तथा समाज में होने वाले परिवर्तनों को कथा के माध्यम से प्रस्तुत कर रहे हैं। यह अवश्य है कि कुछ समालोचक एवं विज्ञानकथा लेखक विज्ञानं विषयक कथाओं को इसमें शामिल कर देते है यह गलत है।
स्वप्निल भारतीय: हिंदी विज्ञानं कथा जगत राजनीति का गढ़ बन गया है लोग जुड़ने के बजाय अपना ग्रुप बनाने में लगे है। इस बारे में आपका क्या ख्याल है? यह देखा गया है कि लोग प्रोत्साहित करने के बजाय दूसरे के प्रयासों में कमियां ढूंढते नजर आते हैं और हतोत्साहित करते है इस तरह की सोच में आपका क्या विचार है?
हरीश गोयल: मेरे विचार में अभी हिंदी विज्ञानं कथा जगत राजनीति का अड्डा नहीं बना है। भारतीय विज्ञानं कथा लेखक समिति सभी विज्ञानं कथाकारों का स्वागत करती है। यह एक पत्रिका विज्ञानं कथा पत्रिका त्रैमासिक निकाल रही है यह पत्रिका सभी विज्ञानं कथाकारों को स्थान देती है अब विज्ञानं तथा प्रौद्योगिकी विभाग के सहयोग से अन्य संस्थाएं भी जुड़ने लगी है उनमें दक्षिण की संस्थाएं भी शामिल है। जहाँ तक ग्रुप बनाने का सवाल है या किसी की कटु आलोचना का सवाल है तो बड़े साहित्यकार भी पूर्वग्रह से मुक्त नहीं है कार्लाइल जैसा बड़ा लेखक ब्राउनिंग के काव्य को पढना बर्दास्त नहीं करता था महाकवि बायरन अन्य अंग्रेजी कवियों को नापसंद करते थे। विज्ञानं कथाकारों जूल्स वर्ने तथा एच जी वेल्स में उनकी कथाओं को लेकर गहरे मतभेद थे कथाओं को लेकर मतभेद हो सकते है पर मनभेद नहीं होना चाहिए। कोई भी विज्ञानं कथाकार अपनी अपनी संस्था खोलने के लिए स्वतंत्र है लेकिन प्रयास यही होना चाहिए कि इससे हिंदी विज्ञानं कथाकारों का भला हो। उन्हें हतोत्साहित करने के बजाय प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। अभी विज्ञानं कथाओं में बहुत कुछ किया जाना बाकी है।
स्वप्निल भारतीय: विज्ञानं और धर्म को एक दूसरे से कितना दूर होना चाहिए। इसकी चर्चा के पीछे कारण यह है कि कई बार चर्चाओं में धर्म और विज्ञान के बीच भेद विज्ञानं कथाकार नहीं कर पता है। कुछ लोग धार्मिक तथ्यों का सहारा लेने लगते है ,यह कितना सही है ?
हरीश गोयल: अब समय आ गया है कि विज्ञानं और धर्म को एक दूसरे के निकट आना चाहिए, इस अर्थ में नहीं कि हमें ईश्वर को प्राप्त करना है कोई भी किसी भी धर्म का पालन करने के लिए स्वतंत्र है। अपने अपने ईष्ट को मानने के लिए स्वतंत्र है। एक विज्ञानं कथाकार तो मिथकों में निहित रहस्यों को विज्ञानं की अधुनातन खोजों की दृष्टि से देखता है हमने देवी देवता, यक्ष, असुर, परियां आदि को हाइब्रिड के रूप में देखना शुरू कर दिया है।
भगवान शिव ने क्रोध में आकर गणेश जी के सिरको धड़ से पृथक कर दिया था तथा हाथी का सिर लगा दिया था, वह एक हाइब्रिड थे। ग्रीक मिथक में एकिडना का आधाशरीर नारी का तथा आधा शरीर सर्प का, कईमेरा का अर्ध भाग बकरी तथा अर्ध भाग सर्प, ई स्फिंक्स का चेहरा स्त्री शरीर सिंह तथा पंख पक्षी के है यूनिकॉर्न की देह घोड़े की, सिर हिरण, पांव हाथी तथा पूँछ एक जंगली शूकर की है लेकिन विज्ञानं इसे एक दिन संभव कर दिखायेगा।
जीन इंजीनिअरिंग का परिणाम गीप है यह भेड़ और बकरी के मेल से पैदा की गई। ट्रांसजेनिक जीव आज एक हकीकत है। हर्मन, ट्रेसी तथा जैनी ट्रांसजेनिक जीव है भविष्य में मानव -बन्दर तथा वुल्फ -मैन जैसी कल्पनाएँ साकार होने लगेगी। मैंने विज्ञानं कथा कायांतरण में वुल्फ़ -मैन की कल्पना की जिसे ह्यूमन जीनोम प्रोजेक्ट के तहत तैयार किया जाता है। फिलिप जोस फार्मर ने वैज्ञानिक उपन्यास ए प्राइवेट कॉस्मोस में ऐसे ही कई हाइब्रिड का प्रयोग किया। इसी प्रकार से हम टेलीपेथी, माईंड स्वैप, अतीन्द्रिय दृष्टि, सूक्ष्म शरीर प्रक्षेपण, सम्मोहन, पूर्वाभास तथा अदृश्यता आदि मिथक में वर्णित धारणाओं को विज्ञानं की दृष्टि से देखने लगे है। यद्यपि यह अभी एक लम्बी खोज का विषय है लेकिन हमने इनकी ओर एक कदम बढा दिया है। मेटेरिअल ट्रान्सफर आज एक हकीकत बनती जा रही है। वैज्ञानिक फोटोन को एक स्थान से दूसरे स्थान पर सरकाने में सफल हुए है नारद जी पल भर में एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँच जाते थे।
भविष्य में विज्ञानं भी इसे कर दिखायेगा। मृत जीवों को शुक्राचार्य की संजीवनी द्वारा जीवित करने की क्रिया आज हमें संभव होती दिखाई पड़ रही है। क्लोनिंग ने इसकी आशा जगाई है डॉ.राजीव रंजन उपाध्याय ने अपनी पुस्तक वैज्ञानिक पुराकथाओं में विज्ञानं को धर्म से जोड़ने का सराहनीय प्रयास किया है। जरावस्था को पुनः यौवन में परिवर्तित किया जा सकता है मुझे इसका सुराग क्लोनिंग में नजर आया। मेरा विज्ञानं कथा उपन्यास इसी पर आधारित है यह आवश्यक नहीं कि विज्ञानं कथाएँ सत्य साबित हो ही लेकिन संभाव्य अवश्य होती है भविष्य में हम बुढापा दूर कर सकेंगे. अमरता की ओर अग्रसर हो सकेंगे। क्लोनिंग ने इसकी आशाएं जगाई है यदि कुछ विज्ञानं कथाकार धार्मिक तथ्यों का सहारा लेते है तो इसमें कुछ भी हर्ज नहीं है लेकिन उसे विज्ञानं की तराजू में तौल कर देखना होगा इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि विज्ञानं कथाएँ अकाट्य तथ्यों पर ही आधारित हों, वैज्ञनिक फंतासी भी हों सकती है।
स्वप्निल भारतीय: भारतीय विज्ञानं कथा और पश्चिमी विज्ञानं कथा में आपके हिसाब से क्या अंतर है ?उसका कारण क्या है?
हरीश गोयल: भारतीय विज्ञानं कथाकार आधुनिक विज्ञानं का सहारा लेते हैं। विज्ञानं के अकाट्य तथ्यों ,नई नई शोधों की ओर उनका ध्यान आकर्षित हुआ है अब वे इनका उपयोग बखूबी से करने लगे है वे इनको एक्स्त्रापोलेट(बहिर्वेशन ) अपनी कथाओं में करते है इसी से जनम होता है विज्ञानं फंतासी का लेकिन उसमें भी कहीं न कहीं वैज्ञानिक सूत्र होता है विश्व विज्ञानं कथाएँ अकाट्य तथ्यों का सहारा बहुत कम लेती है लेकिन साईबर पंक के आने के साथ वे भी इस ओर अग्रसर हुई है। विश्व विज्ञानं कथाएँ हजारों साल बाद की पृष्ठभूमि पर आधारित कल्पनाएँ है ,कुछ अपवाद अवश्य हों सकते हैं। हमारी विज्ञानं कथाओं का परिवेश अक्सर भारतीय होता है।
स्वप्निल भारतीय: हिंदी विज्ञानं कथा के भविष्य को लेकर आपकी क्या राय है?
हरीश गोयल: हिंदी विज्ञानं कथाओं का भविष्य अत्यंत उज्जवल है। हमारे विज्ञानं कथाकार वैज्ञानिक शोधों तथाउनके मानव पर पड़ने वाले भावी प्रभावों को लेकर पूरी ऊर्जा के साथ विज्ञानं कथाएँ रच रहे हैं। उनके लिए मानवीय संवेदनाएं सर्वोपरि है।
स्वप्निल भारतीय: हाल ही में आपने कौनसी विज्ञानं कथा पढ़ी है ?उसके बारे में आपके क्या विचार है?
हरीश गोयल: हाल ही में मैंने प्रसिद्ध विज्ञानं कथाकार रॉबर्ट शेक्ले की विज्ञानं कथा वेलकम टू स्टेंडर्ड नाईत्मैअर है। कथा में इन्वेसन ऑफ़ अर्थ थीम को लिया है. इस थीम की शुरूआतविज्ञानं कथाओं में एच। जी.वेल्स की विज्ञानं कथा द वारऑफ़ द वर्ल्ड के साथ ही हो गयी थी लेकिन द वार ऑफ़ द वर्ल्ड में जहाँ पृथ्वी पर आक्रमण का कारण मंगलवासी होते हैं तो वेलकम टू द स्टेंडर्ड नाईत्मेअर में पृथ्वी पर आक्रमण का कारण स्वयं होते हैं लेकिन पृथ्वीवासी किसी दूसरे ग्रह की सहायता से ऐसा करते है.कथा का नायक जोनी बेजिक यान की सहायता से सीअर्जन क्लस्टर के एक ग्रह लोरिस पर पहुंचता है। लेकिन वहां पहुँचने पर वह पता है कि लोरिस वासी अत्यंत सौम्य प्रकृति के होते है.वे शांतिप्रिय ,प्रगतिशील ,खोजपरक,तथा स्थायित्व पसंद ह्यूमेनोइड है। उनके वहां युद्ध नहीं होते है। विद्रोह नहीं होता है।श्रमिकों का कार्य मशीन ही करती है। वहां ताले मानसिक आदेश पर खुल जाते हैं। वहां राज्य किसी राजा,अध्यक्ष अथवा प्रधानमंत्री द्वारा नहीं किया जाता बल्कि लोरियनवासियों का संयुक्त मस्तिष्क होता है। कथा का नायक एक पृथ्वीवासी है। वह स्वाभाव से उद्दंड। असंतुलित, गुस्सैल, असभ्य होता है। वह वहां कानून को धत्ता बताता है घटनाएँ इस तरह से घटती है कि उसे वहां का नेतृत्व सम्हला दिया जाता है। वह पृथ्वी पर आक्रमण की योजना बनाता है यहीं से स्टैण्डर्ड नाईट मेअर प्रारंभ हो जाता है।
स्वप्निल भारतीय: कल्किआन भारत की प्रथम बहुभाषीय साईट बन गई है। इससे विज्ञानं कथा को आवश्यक मंच मिल गया है। कल्किआन के बारे में आपका क्या विचार है ?
हरीश गोयल: हम ऐसी साईट की भारत में बहुत बड़ी कमी महसूस कर रहे थे हमारा विज्ञानं कथा साहित्य विश्व में अपना स्थान नहीं बना पा रहा था तो इसका कारण यह था कि अब तक उसे कोई ऐसा मंच नहीं मिला। कल्किओन से आशाएं जगी है हम जिस फॉण्ट में लिख रहे थे, वह यूनिवर्सल नहीं था। कल्किओन से हमें वो फॉण्ट मिल जायेगा। इसके जरिये हम विश्व स्तर पर अपनी हिंदी विज्ञानं कथाओं का प्रचार कर सकेंगे लेकिन फिर भी हमारी विज्ञानं कथाओं का अनुवाद अंग्रेजी में होना आवश्यक है। इसके लिए कल्किओन को ऐसे अनुवादक ढूँढने होंगे जो हिंदी कि विज्ञानं कथाओं का अंग्रेजी में त्वरित गति से कर सके। हमें द्विभाषी सोफ्टवेयर आने का इंतजार है यह आ भी गया तो बहुत कीमती होगा लेकिन कल्किओन से हमें बहुत आशाएं है। यह एक अच्छी बात है कि कल्किओन हिंदी में भी नवीनतम विज्ञानं समाचार दे रहा है। कल्किओन की एक और उल्लेखनीय बात है कि कल्किओन विज्ञानं कथाओं को रचने के लिए नए नए विचार सुझा रहा है। इस तरह का यह प्रथम प्रयास है। इसके लिए साधुवाद।