कल्किआन के प्रथम अंक के लिए हमने वर्तमान विज्ञान साहित्य के पुरोधा डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय से कुछ ज्वलंत प्रश्न पूछे, जिनको उन्होने प्रश्नो की वर्षा कहा और बेह्द रोचक उत्तर दिये। साक्षात्कार आपकी ख़िदमत मे हाज़िर है।
स्वप्निल: विज्ञान कथाओं को लेकर आपके मन में रूचि कब जागृत हुई?
डॉ उपाध्याय: इस प्रश्न ने मुझे अतीत के विस्मृत पृष्ठों को उलटने हेतु प्रेरित किया है। तथ्यत: हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करने के उपरान्त मेरे पितामह ने मुझे अपने संग्रह में से, चन्द्रकान्ता संतति का प्रथम गुटका संस्करण, डेनियल डिफो की अंग्रेजी में राबिन्सन क्रूसो और आर्थर कानन डॉयल का एक उपन्यास (अंग्रेजी में) पढ़ने को दिया था। मेरे अन्त: मानस पर इन पुस्तकों ने प्रभाव डाला। कल्पना की उड़ान स वैज्ञानिक तथ्य चन्द्रकान्ता संतति से, नीर-क्षीर विवेक की शक्ति शरलाक होम्स के विवेचनों से और विश्व भ्रमण की आकांक्षा राबिन्सन क्रूसो ने जाग्रत की थी। इन्हीं तथ्यों ने समवेत रूप में मुझे विज्ञान कथा सृजन कर्मी बनाया।
स्वप्निल: क्या आपको याद है की आपने सबसे पहले कौन सी विज्ञान कथा पढ़ी थी और उसका आपके ऊपर क्या प्रभाव पड़ा था?
डॉ उपाध्याय: तुम्हारे इस प्रश्न का उत्तर उपरोक्त प्रश्न के मेरे कथ्य में निहित है।
स्वप्निल: आपने विज्ञान कथा कब लिखा शुरू किया और उसकी प्रेरणा क्या थी?
डॉ उपाध्याय: सुदीर्घ विदेश प्रवास से फैजाबाद में बसने के बाद जिसे मैं ``लीप टूहन्ड्रेड इयरस बैक´´ कहता हूँ , मैं यहाँ के प्रतिष्ठित फौजदारी के अधिवक्ता (क्रिमनल लाइयरद्ध के साथ एक शाम बैठा। विहस्की का आनन्द ले रहा था। हल्के जाड़ों का प्रारम्भ था- उसी दौरान, उन्होंने मुझे बताया कि पिछली रात एक नागिन ने उनकी पिंडली में काट लिया। पीड़ा जनित कष्ट ने उनकी निद्रा भंग कर दी। टॉर्च के प्रकाश में उन्होंने नागिन को देखा और उसे अपनी 0.22 राइफल से मार दिया। फिर उठ कर उन्होंने चार पेग विहस्की के लिए और यह सोच कर कि कल होगा भीर्षोर्षो सो गये। दूसरे दिन वे सामान्य भाव से कोर्ट चले गये। इसी घटना ने मुझे अपनी पहली विज्ञान कथा ``मेरे मित्र´´ लिखने की प्रेरणा दी थी। यह कथा 12 दिसम्बर 1984 को मैंने लिखी थी तथा वह मेरे विज्ञान कथा संग्रह ``सूर्य ग्रहण´´ का अंश है। यह स्थानीय समाचार पत्र ``जनमोर्चा´´ में लिखने के बाद प्रकाशित हुयी थी।
स्वप्निल: आपकी सबसे नवीनतम विज्ञान कथा कौन सी है...कृपया उसके बारे में कुछ बताएं.
डॉ उपाध्याय: इस प्रश्न का उत्तर मैं इस प्रकार देना चाहूँगा कि जो नवीनतम कथा है - वह अप्रकाशित है और जो मुझे सर्वप्रिय है, वह है ``खाँसी´´। इसकी नॉनो प्रौद्योगिकी जनित दुखद प्रभाव को दर्शाती पृष्ठभूमि में मानवीय त्राण-संवेदना को विचित्र किया गया है। अभी यह कथा प्रसिद्द साहित्य की पत्रिका - ``साहित्य अमृत´´ के मई 2009 पृष्ठ 24 पर प्रकाशित हुयी थी।
स्वप्निल: भारत में हिंदी विज्ञान कथाओ के विषय में आपका क्या विचार है?
डॉ उपाध्याय: यदि हम समर्पण भाव से हिन्दी विज्ञान कथाओं के सृजन से लगे रहें तो उच्च स्तरीय विज्ञान कथाएँ लोक मानस का रंजन करने में सक्षम होगी।
स्वप्निल: अक्सर आरोप लगाया जाता है की हिंदी विज्ञान कथाकार शोध पर अधिक ध्यान नहीं देते, कुछ कथाओ में तो बचकानी गलतियाँ मिल जाती है, इस आरोप के बारे में आपका क्या कहना है?
डॉ उपाध्याय: विज्ञान सम्मत तथ्यों और तर्कों का अभाव कथा को अविज्ञान-कथा बना देता हैं। लेखकों को विज्ञान तथ्य सम्मत कथाएँ लिखनी चाहिये।
स्वप्निल: हिंदी विज्ञान कथा जगत राजनीती का गढ़ सा बन गया है...लोग जुड़ने के बजाये अपने अपने ग्रुप बनाने में लगे रहते है...इस बारे में आपके क्या विचार हैं? यह देखा गया है की लोग प्रोत्साहित करने की बजाये दूसरों के प्रयास में कमियां ढूंढते हैं और हतोत्साहित करते है...इस तरह की सोच के बारे में आपका क्या विचार है?
डॉ उपाध्याय: हिन्दी साहित्य के इस अभिशाप के प्रति विज्ञान कथाकार सचेष्ट नहीं हैं। यह एक दुखद पक्ष है। इसको विज्ञान कथा के प्रचार-प्रसार की दृष्टि से त्यागना होगा क्योंकि विज्ञान कथा लेखक समिति का आदर्श वाक्य है 'विज्ञान कथा सृजाम्यहम्'।
स्वप्निल: विज्ञान और धर्म को एक दुसरे से कितना दूर रहना चाहिए. इस प्रश्न के पीछे कारण यह है की कई बार चर्चाओं में धर्म और विज्ञान के बीच का भेद कथाकार नहीं कर पाटा है. कुछ कथाकार धार्मिक तथ्यों का सहारा लेने लगते है..यह कितना सही है?
डॉ उपाध्याय: धर्म विशुद्ध भारतीय अवधारणा है, यह दीन और रिलीजन से भिन्न है। विज्ञान और धर्म लौकिक दृष्टि से अलग हैं। यह दूरी मिश्रित न हो, दृष्टि से ओझल न हो तो विज्ञान कथा के लिए श्रेयस्कर होगा।
स्वप्निल: भारतीय विज्ञान कथा और पश्चिम की विज्ञान कथा में आपके हिसाब के क्या सबसे बड़े अंतर हैं? उनका कारण क्या है?
डॉ उपाध्याय: पश्चिम का व्यक्ति और विज्ञान कथाकार विज्ञान के पक्षों का संबल लेकर कथासृजन कर्म करते हैं। परन्तु भारत में अधिकांश कथा लेखक विज्ञान के तथ्यों से परिचित ही नहीं हैं। वैसे विज्ञान में निष्णात भारतीय विज्ञान कथाकारों की रचनाएँ अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की हैं।
स्वप्निल: हल फिलहाल में आपने कौन सी विज्ञान कथा पढ़ी है और उसके बारे में क्या विचार है?
डॉ उपाध्याय: पश्चिमी आधुनिक विज्ञान कथाएँ अधिकतर फैन्टेसी पर आधारित पल्प हैं, मैं उन्हें नहीं पढ़ता हूँ।
स्वप्निल: हिंदी विज्ञान कथा के भविष्य को लेकर आपकी क्या राय है?
डॉ उपाध्याय: ``गच्छति पिप्पीलिको यातो, योजना नाम शतान्यपि:´´
स्वप्निल: कल्किआन भारत की प्रथम बहु भाषीय साईट बन गयी है...इससे हिंदी विज्ञान कथा को आवश्यक मंच मिल गया है. कल्किआन के बारे में आपके क्या विचार हैं?
डॉ उपाध्याय: इस साइट का विस्तार क्रमश: होता चले, यही शुभेच्छा है, शुभकामना है एवं शुभाशंसा भी।