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डाक्टर सुबोध मोहन्ति से लम्बी बातचीत।

डाक्टर मोहन्ति से कल्किआन हिंदी संपादक एयर वाइस मार्शल विश्व मोहन तिवारी की लम्बी बातचीत।

डाक्टर सुबोध मोहन्ति विज्ञान प्रसार के अकादमिक हेड हैं और 'एफ' श्रेणी के वैज्ञानिक भी। आपने रसायन विज्ञान विषय पर अनेक शोध प्रबन्ध, तथा लगभग ३०० विज्ञान सम्बन्धी लेख तो लिखे ही हैं, जो 'सुबोध' होते हैं; उनकी संपादित तथा सहलेखन सहित लिखी, हुई 20-25 पुस्तकें भी हैं, वे विज्ञान कथाएं भी लिखते हैं। उन्हें विज्ञान में उत्कृष्ट मौलिक लेखन के लिये २००० में FIE का फ़ाउन्डेशन नेशनल एवार्ड, २००३ में राष्ट्रीय विज्ञान प्रौद्योगिकी संचार परिषद का राष्ट्रीय पुरस्कार, डा. मेघनाद साहा पुरस्कार २००५ में, २००६ में हिन्दी अकादमी दिल्ली का पुरस्कार, २००७ में आत्माराम पुरस्कार आदि से अलंकृत किया गया है। हमें डाक्टर मोहन्ति से संपादक एयर वाइस मार्शल विश्व मोहन तिवारी की लम्बी बातचीत का प्रकाशन करते हुए गर्व का अनुभव हो रहा है।

तिवारी - डा. महन्ति जी, वैसे हिन्दी में आपके नाम का सही उच्चारण महन्ति ही है, किन्तु इस बातचीत के लिये आपके नाम का बांग्ला उच्चारण का ही उपयोग करूंगा। मैं चाहता हूं कि 'हिन्दी.कल्कियान.काम' के पाठकों को जानकारी दूं कि, एक तो, यह मह्त्वपूर्ण संस्था विज्ञान प्रसार विज्ञान के प्रसार के लिये क्या क्या कर रही है तथा दूसरे, आप का उसके योगदान में कैसा अनुभव है। तो मैं सबसे पहले यह प्रश्न करता हूं कि आपने अपना अध्ययन कहां किया।
मोहन्ति - तिवारी जी, मैने स्नातक रामानन्द कालेज, विष्णुपुर, पश्चिम बंगाल से १९७६ में प्रथम श्रेणी में किया, और अखिल भारतीय प्रतियोगिता में राष्ट्रीय छात्रवृत्ति भी‌ जीती। और साथ ही रामानन्द छात्रावास में पूर्ण स्वावलम्बन आवास का जीवन भी जिया, उदाहरण के लिये, छात्रावास में, जो शायद भारत में एक ही था, विद्यार्थियों को अपना भोजन सामूहिकरूप से पकाना पड़ता था। (कुछ मुस्कराते हुए) इस विद्यालय तथा छात्रावास में प्रवेश के लिये विद्यार्थी में बौद्धिक योग्यता के साथ आर्थिक कमजोरी‌ आवश्यक थी। (कुछ संकोच के साथ) मैने स्नातकोत्तर की परीक्षा में स्वर्णपदक १९७८ में प्राप्त किया, तथा पी एच डी १९८२ में बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय से प्राप्त की, इसके लिये मैने 'नाभिकीय चुम्बकीय अनुनादी स्पैक्ट्रामिकी' (Nuclear Magnetic Resonance Spectroscopy), जो उस समय की ताजा पद्धति थी, का उपयोग कर ऱ्हाइबोज़ोम के अन्दर प्रोटीन संश्लेषण पर शोध किया। मानव शरीर में राइबोसोम का विशेष महत्व होता है। पिछले वर्ष का रासायनिकी में नोबल पुरस्कार जिन भारतीय मूल के वैंकट रामकृष्णन को मिला था उनका विषय भी राइबोसोम की संरचना को समझाना था।

कुछ वर्षों (१९८३ – ८८) तक वहीं मैने आण्विक जीवविज्ञान पर डाक्टरोत्तर शोध भी किया। और  मेरा विज्ञान लेखन का प्रकाशन भी इसी समय से पायोनियर तथा लिंक जैसे समाचार पत्रों में प्रारंभ हुआ। उसके बाद मैं 'राष्ट्रीय विज्ञान, प्रौद्योगिकी, एवं विकास अध्ययन संस्थान' (निस्टैड) दिल्ली आ गया। यह संस्था विज्ञान को सामाजिक संदर्भों में समझने का कार्य भी करती है।

तिवारी -  मेरी समझ में तो आपके अन्दर एक शोधपरक वैज्ञानिक होने के साथ विज्ञान के सामाजिक पक्षों का चिन्तक भी है जो आपको खींचकर यहां ले आया।
मोहन्ति - मैने बचपन से जो जीवन देखा है उसमें यह तो बिलकुल स्वाभाविक है, कोई विशेष बात नहीं। वैसे मैं भी यदि चाहता तो अन्य मित्रों की तरह यूएसए जा सकता था, किन्तु नहीं गया।

तिवारी - मैं तो इसे देशवासियों से प्रेम कहूंगा।
मोहन्ति - मैं 'राष्ट्रीय विज्ञान, प्रौद्योगिकी, एवं विकास अध्ययन संस्थान' आया। मैने ९२-९४ में डा. गोवारीकर, जो उस समय प्रधान मंत्री के विज्ञान पर सलाहकार थे, के मार्गदर्शन में उस समय की एक बड़ी समस्या 'ब्रेन ड्रेन' (मस्तिष्क का  बहिष्कार) पर शोध किया जिसके सुझावों का स्वागत किया गया तथा उनके अनुसार कुछ सुधार भी किये गए ।

तिवारी - जी हां मुझे याद है कि उस समय योग्य वैज्ञानिकों को स्थान न होने पर भी शोध संस्थानों में स्थान दिया जा रहा था।
मोहन्ति - इसके बाद मैने भारत के संदर्भ में 'विज्ञान–आबादी तथा विकास' पर शोध किया।

तिवारी - यह तो बहुत ही‌ मह्त्वपूर्ण विषय है, क्योंकि इस जानकारी पर आधार बनाकर ही पंचवर्षीय योजनाओं को उत्तम बनाया जा सकता है।
मोहन्ति - जी हां। मेरे उस अध्ययन का भी स्वागत हुआ था। और तब तक मैं जन जन में विज्ञान समझ के मह्त्व को गहराई से पकड़ सका था। अत: १९९४ में मैं 'विज्ञान प्रसार' में आ गया, मानों  मुझे अपना लक्ष्य मिल गया।

तिवारी - 'विज्ञान प्रसार' तथा राविप्रौसंप (राष्ट्रीय विज्ञान प्रौद्योगिकी संचार परिषद, एनसीएसटीसी) में क्या संबन्ध है? वैसे सतही तौर पर देखने में लगता है कि दोनों ही लगभग एक सा कार्य कर रही‌ हैं।
मोहन्ति - 'विज्ञान प्रसार' की स्थापना १९८९ में विज्ञान के प्रसार हेतु, राविप्रौसंप  शासकीय संस्था के बरअक्स, एक स्वायत्त संस्था के रूप में की गई थी, ताकि वह अपना कार्य करने में अधिक स्वतंत्र रहे। इस संस्था को विज्ञान प्रसार का वास्तविक कार्य करना नहीं था, वरन कार्य करवाना था, एक समन्वयन (कोआर्डिनेटिंग) संस्था की तरह। जब मैं आया था तब वह संस्था खड़ा होना सीख रही थी। शायद संस्था के कार्य की नवीनता के कारण उसे अपने कार्य निष्पादन हेतु पर्याप्त संसाधन नहीं दिये गए थे। डा. नरेन्द्र सहगल, जो विज्ञान प्रसार के संस्थापक निदेशक भी थे, के नेतृत्व में मैने सब के साथ मिलकर विज्ञान प्रसार के कार्य में तेजी लाना प्रारंभ कर दिया।

तिवारी - तो सबसे पहला मह्त्वपूर्ण मुद्दा आपने क्या लिया था?
मोहन्ति - १९९५ के पूर्ण सूर्यग्रहण को ही वैज्ञानिक समझ के प्रसार के लिये पहला बड़ा मुद्दा बनाया। उस घटना को अंधविश्वास के घेरे में से बाहर निकालकर उसे वैज्ञानिक समझ के खुले वातावरण में लाने का भरपूर प्रयास किया - सभी को वह सूर्यग्रहण, जो कि मुख्यतया उत्तरभारत में देखा जा सकता था, के देखने का आनन्द लेने के लिये उऩ्हें‌ सावधानियों तथा उपकरणों के साथ आमंत्रित किया। ३०,००० तो काले चश्में सस्ते में बँटवाए, हिन्दी, अंगेज़ी तथा बांग्ला भाषाओं में ६०,००० पोस्टर छपवाए, सभी पत्र पत्रिकाओं में 'करो और न करो' प्रकाशित करवाए, कार्य शालाएं करवाईं, दूर दर्शन से सीधा प्रसारण करवाया। यहां तक कि स्टैम्प पेपर पर लोगों से शपथ लिखवाई कि " मैं सूर्य ग्रहण देखूंगा"। और इस तरह सारे उत्तर भारत में उस अनोखी घटना के प्रति जागरूकता तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण उत्पन्न किया, जो बहुत सफ़ल हुआ क्योंकि १९८० के पूर्ण सूर्यग्रहण पर जब कि बहुत कम जनता बाहर निकली थी, १९९५ में लोग उमंग तथा उत्साह पूर्वक बाहर निकले। १९९९ में भी इसी तरह अधिकांश लोगों ने पूर्ण सूर्यग्रहण का आनन्द लिया।

तिवारी - यह प्रभाव तो जनता में मैने भी देखा है, और मुझे बहुत प्रसन्नता भी हुई।
मोहन्ति - भारत के समाचार पत्रों में विज्ञान के समाचार शायद ही छपते थे। इसी समस्या को मुद्दा बनाते हुए "मुद्रण के लिये तैयार पूरा पृष्ठ" अभियान चलाया। एक संस्था, यूनाइटैड न्यूज़ एजैन्सी को सहयोग देते हुए विज्ञान समाचारों से भरा पूरा पृष्ठ, सीधे मुद्रण हेतु तैयार, समाचार पत्रों को नियमित रूप से दिलवाया।

तिवारी - क्या यह सभी समाचार पत्रों ने प्रकाशित करना शुरु किया था? मुझे तो ऐसा याद नहीं पड़ता।
मोहन्ति - नहीं। प्रत्येक बड़े समाचार पत्र ने वह पृष्ठ केवल अपने लिये मांगा था, जिसके लिये हम सहमत नहीं थे। अतएव हमने उसे बीस मध्यम तथा लघु पत्रों को दिया। और इसे हिन्दी. मराठी, उर्दू, बांग्ला तथा अंग्रेज़ी पत्रों को दिया था, यद्यपि बाद में यह केवल हिन्दी, अंग्रेज़ी और उर्दू में ही चला। इस तरह विज्ञान प्रसार ने अखबारों की शिकायत काफ़ी हद तक दूर की कि उऩ्हें विज्ञान की प्रकाशन योग्य सामग्री नहीं मिलती।

तिवारी – किन्तु यह कटु सत्य है कि उस समय, वरन २००४ और २००५ तक भी, बड़े पत्र विज्ञान के समाचार प्रकाशित नहीं करना चाह्ते थे। २००५  में भारतीय विज्ञान लेखक संघ की एक संगोष्ठी में मैने यही प्रश्न पायोनियर, जिसे मैं एक बहुत जिम्मेदार समाचार पत्र मानता हूं, के विख्यात संपादक श्री चंदन मित्रा से इसका कारण पूछा था। उऩ्होंने प्रतियोगिता तथा अतिजीविता की बात कही थी। तब मैने कहा था कि यह तर्क शायद नवीन पत्रों पर लगता हो, किन्तु स्थापित पत्र तो करोडों में खेल रहे हैं। यह भी सत्य है कि आज विज्ञान समाचारों की उपस्थिति बड़े पत्रों में भी पहले से अच्छी है, यद्यपि संतोषजनक नहीं है।
मोहन्ति - कुछ वर्षों के बाद वह कार्य अर्थात 'विज्ञान समाचारों से भरा पूरा पृष्ठ, सीधे मुद्रण हेतु तैयार,' स्वावलम्बी हो गया था। किन्तु यूनाइटैड न्यूज़ एजैन्सी ने भी उस कार्य में रुचि लेना बन्द कर दिया। वास्तव में जनता को भी रुचि लेना चाहिये, तथा जनसेवी संस्थाओं को भी ऐसे कार्यों के लिये कुछ करना चाहिये।

तिवारी - जनता में विज्ञान के प्रति रुचि पैदा करना ही तो 'विज्ञान प्रसार' का कार्य है, जो आज के माध्यम के जमाने में भी कठिन सिद्ध हो रहा है।
मोहन्ति - जी, वही कठिन कार्य विज्ञान प्रसार कर रहा है। इसके बाद २००३ में 'विज्ञान रेल' अभियान प्रारंभ किया जिसके प्रभाव के बारे में तो सभी जानते हैं, वह एक सफ़ल अभियान रहा।विज्ञान रेल को सफल बनाने में डॉ. वी. बी. काम्बले ने विशेष भूमिका निभाई। विज्ञान प्रसार विभिन्न भाषाओं में अतीत में लोकप्रिय विज्ञान लेखन का संकलन करने के प्रयास में संलग्न है। इस कार्य को करने के लिए विज्ञान प्रसार संबंधित भाषा की उपयुक्त संस्था का सहयोग लेता है। इस दिशा में हिंदी भाषा में किए गए संकलन का संपादन प्रो. शिव गोपाल मिश्र, प्रधानमंत्री विज्ञान परिषद प्रयाग ने किया था। यह एक उल्लेखनीय दस्तावेज साबित हुआ है। बांग्ला भाषा में इसी प्रकार का संकलन विज्ञान प्रसार के निर्देशन में एशियाटिक सोसाइटी, कोलकाता ने किया है। हाल ही में मराठी और उड़िया भाषा में इस प्रकार के संकलन निर्माण का काम पूरा कर लिया गया है

हम लोग प्रकाशन के कार्य में तेजी लाए हैं। अभी तक ११ भाषाओं में विज्ञान संबन्धी २०० पुस्तकें प्रकाशित कर चुके हैं। उसमें एक पुस्तक 'विज्ञान लेखन के सौ वर्ष' हमने डा. शिव गोपाल मिश्र जी से लिखवाई है जो बहुत उपयोगी सिद्ध हो रही है। यह हिन्दी, बांग्ला, मराठी तथा उड़िया में प्रकाशित हो चुकी है, अब इसका अन्य भाषाओं में प्रकाशन करने का कर्य चल रहा है। इसी तऱह हमारे अन्य प्रकाशन भी बहुभाषीय होते हैं, अखिल भारतीय। पत्रिकाओं के प्रकाशन में भी अच्छी प्रगति हो रही‌ है। 'ड्रीम २०४७' पत्रिका, जो अंग्रेज़ी तथा हिन्दी में द्विभाषी है, की ५२००० प्रतियां प्रकाशित होती‌ हैं जिनमें से ३०००० तो शालाओं को भेजी जाती हैं।   'आडियो विज़ुअल' (ध्वनिदृश्य)  माध्यम में रेडियो में तो ११७ स्टेशनों से १९ भाषाओं में कार्यक्रम प्रसारित होते हैं। 'हैम' रेडियो को लोकप्रिय बनाया जा रहा है। दूरदर्शन पर भी विज्ञान संबन्धी कार्यक्रम नियमित रूप से आधा घन्टा प्रसारित होता है। इसमें 'इग्नु' का सहयोग भी लिया जा रहा है जो 'ज्ञान वाणी' तथा 'ज्ञान दर्शन' कार्यक्रम चलाती‌ है।'इग्नु' विज्ञान प्रसार द्वारा निर्मित कार्यक्रम 'ज्ञान वाणी' रेडियो द्वारा तथा 'ज्ञान दर्शन' टैलीविज़न चैनल के द्वारा अपने लाखों विद्यार्थियों को प्रसारित करती है।

तिवारी - विद्यार्थियों तक केवल पाठ्यक्रम का विज्ञान ही नहीं वरन लोकप्रिय विज्ञान पहुँचाना एक ताजी सोच है जो प्रभावी भी बहुत हो सकती है।
मोहन्ति - विज्ञान प्रसार के लिये हमने विज्ञान क्लब चलाए जिनकी संख़्या आज १२००० से अधिक है। इसमें‌ हम विपनैट नाम की एक पत्रिका भी‌ प्रकाशित करते हैं जिसमें न केवल उऩ्हें ज्वलंत विषयों पर उपयोगी‌ जानकारी देते हैं वरन प्रायोगिक प्रायोजनाएं भी देते हैं।

तिवारी - जी हां मैने यह प्रायोजनाएं विपनैट में देखी‌ हैं। वे सदस्यों को न केवल सैद्धान्तिक होने से बचाती हैं वरन 'हाथ' से विज्ञान करने के लिये कार्य देती हैं। यह कार्य भी प्रशंसनीय है, बशर्ते कि पूरी लगन से किया जाए क्योंकि यह विज्ञान प्रसार के कर्मचारियों से कल्पनाशीलता तथा परिश्रम की माँग करता है।
मोहन्ति - विज्ञान प्रसार की एक द्विभाषिक पत्रिका भी है 'ड्रीम २०४७'।विज्ञान प्रसार की मासिक पत्रिका ड्रीम 2047 सन् 1997 में शुरू हुई। जैसा कि आप जानते है कि उस साल देश में भारत की आजादी की 50वीं वर्षगाठ के समारोह मनाए जा रहे थे, उस समय हमें अहसास हुआ कि भारत में वैज्ञानिक जागरूकता पैदा करने के लिए काफी कुछ करना शेष है। इसलिए विज्ञान प्रसार की द्विभाषी पत्रिका का नाम ड्रीम 2047 रखा गया है। इस नाम से यह लक्षित होता है कि 2047 अर्थात स्वतंत्रता के 100 वर्ष बाद हमारे जनमानस की वैज्ञानिक समझ संतोष जनक हो जाएगी।

तिवारी - मैं तो कहूंगा कि आप या तो बहुत आशावादी हैं या भारतीय जनमानस की योग्यता पर आपको बहुत विश्वास है। देखिये आधुनिक विज्ञान को पश्चिम में आए ३०० वर्षों से अधिक हो गए हैं, किन्तु क्या आज भी वहां की अधिकांश सामान्य नागरिक की वैज्ञानिक समझ संतोष जनक है? नहीं तब?
मोहन्ति - देखिये वहां तो धर्म और विज्ञान का द्वन्द्व चल रहा है, दलबन्दी हो जाने से दिमाग बन्द हो जाते हैं।

तिवारी - यह आपने बहुत सटीक अवलोकन दिया है। पादरी तो अपना दिमाग बन्द रखें, यह समझ में आता है, किन्तु वैज्ञानिक भी अपना दिमाग बन्द रखें, यह समझना कठिन है। देखिये '(दो संस्कृतियों वाले प्रसिद्ध) 'सी पी स्नो इन न्यूयार्क' लेख में लारैन्स क्रास ने कहा है (देखें साइन्टिफ़िक अमेरिकन सितम्बर ०९) कि "विज्ञान, आस्था और धर्म' जैसे विषय पर चर्चा 'विश्व विज्ञान उत्सव', न्यूयार्क सिटी में रखने की  आवश्यकता ही क्या है ! इससे धर्म और विज्ञान के बराबर होने का भ्रम फ़ैलता है।" (मैं कुछ उत्तेजित हो गया था इसलिये अपनी बात ठीक से रखना चाहता था। अत: मैने अपनी बात शान्तिपूर्वक जारी रखी) भारत में कुछ समय पहले अचानक गणेश जी दूध पीने लग गए थे।
मोहन्ति - जी हां, वैज्ञानिकों ने इसे तरह तरह से सभी माध्यमों से समझाया था . . .

तिवारी - उसमें अनेक वैज्ञानिक समझाते समय धार्मिकों का मजाक भी उड़ा रहे थे । यहां तक कि एक ने तो आस्थावानों का उपहास करते हुए एक चर्मकार के त्रिलम्बी लौह उपकरण को भी दूध पिलवा दिया था।  मेरा आपसे प्रश्न यह है कि क्या वैज्ञानिक समझ पैदा करने के लिये धर्म का उपहास ज़रूरी‌ है? ( यह मेरा प्रश्न सामान्य वैज्ञानिकों की सोच पर सीधा आक्रमण कर रहा था, और मैं‌ उत्सुक था कि डा. मोहन्ति क्या उत्तर देते हैं। उनके उत्तर ने मुझे प्रसन्न करते हुए चकित कर दिया।)
मोहन्ति - इस मामले में 'वर्सैस' नही होना चाहिये - 'धर्म वर्सैस (बरअक्स) विज्ञान' नहीं होना चाहिये। विज्ञान को अपना कार्य खुले दिमाग से वैज्ञानिक विधियों द्वारा करना चाहिये, धर्म के विरोध की आवश्यकता ही नहीं होना चाहिये; 'Valid versus invalid' अर्थात प्रामाणिक या अप्रामाणिक, उपयोगी या अनुपयोगी होना चाहिये।

तिवारी - जी हां, वैज्ञानिक चर्चा करते समय भावनात्मक नहीं होना चाहिये (मैने सोचा कि एक खुले दिमाग वाला भारतीय ही इस पैंचीदे विषय पर ऐसा स्पष्ट सोच सकता है)। मोहन्ति जी आपने क्या खूब जवाब दिया है ( मैं ऐसा कहने से अपने को रोक नहीं सका)।
मोहन्ति - (शायद बात को बदलते हुए) मैं आपको यह भी‌ बतला दूं कि ड्रीम २०४७ की ५२,००० प्रतियां प्रकाशित होती हैं। जिसमें से ३०,००० तो स्कूलों में जाती हैं। हमारी एक गतिविधि है - 'प्रयोग प्रदर्शन' – जिसके तहत हम विज्ञान के प्रयोगों का इस तरह अभिकल्प करते हैं कि वे प्रयोग बिना विशेष उपकरणों के किये जा सकते हैं, क्योंकि इस आर्थिक विपन्न देश में विज्ञान को अधिकांशत: बिना प्रयोगों के प्रदर्शन के पढ़ाया जाता है। हमने कानपुर आइ आइ टी से भी इन अभिकल्पों के लिये सहयोग लिया है। गतिविधि किट तथा वैज्ञानिक खिलौनों का भी निर्माण कर ऱहे हैं जिनका उपयोग प्रयोग प्रदर्शन के लिये भी किया जा सकता है। और हम लोग 'हैम रेडियो' को भी‌ लोकप्रिय बना रहे हैं।

तिवारी - शायद लगे कि यह कोई बड़ा कार्य नहीं है, किन्तु बहुत उपयोगी हो सकता है। आज के समय में हैम रेडियो मँहगा भी नहीं है, और शौक के अतिरिक्त यह बहुत उपयोगी‌ हो सकता है।आपदा आने पर जैसे कि सुनामी आपदा के समय जब सामान्य संचार माध्यम काम नहीं कर रहे थे तब सामान्य नागरिकों के हैम रेडियो ने बहुत मदद की थी।
मोहन्ति - आप तो हमारे 'एड्युसैट' (शिक्षौपग्रह) कार्यक्रम में भाग ले चुके हैं। हमारे पास भारत में ५० स्थानों पर 'टर्मिनल' हैं जिन पर हम दृश्य चैनलों पर मानों कि आमने सामने शिक्षण का कार्य करते हैं।

तिवारी - जी हां मुझे याद है कि किस तरह जिज्ञासु श्रोता हमारा भाषण सुनने के बाद  उत्साहपूर्वक हम से प्रश्न पूछ रहे थे और हम उनके उत्तर दे रहे थे।
मोहन्ति - हमने १९९६ में देश में प्रथम ई – मैगैज़ीन 'कमकम' (आइये आइये) प्रकाशित की थी, जो चल रही है। हम लोग प्रत्येक वर्ष उस वर्ष के वैश्विक निर्धारित विषय पर देशव्यापी विशेष कार्यक्रम करते हैं; जैसे कि जैव विविधता पर इस समय चल रहा है, और 'ग्रह पृथ्वी' पर भी। और हमारी एक भरी पूरी वैब साइट है जिस पर आप हमारी गतिविधियों की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

तिवारी - यह देखकर मुझे प्रसन्नता हो रही है कि विज्ञान प्रसार 'विज्ञान तथा समाज' के सभी अंगों पर विचारकर कार्य करता है। मानव व्याहार के विषय में अनौपचारिक विधियों से कार्य करते हुए उपलब्धियां नापना कठिन कार्य है। आप इतनी विभिन्न विधियों द्वारा विज्ञान संचार कर रहे हैं, इन कार्यों की उपलब्धि कैसे नापते हैं?
मोहन्ति - विज्ञान प्रसार ने स्वयं भी इस प्रश्न पर विचार किया है, एक विशेषज्ञों की समिति का गठन भी इसी हेतु किया गया था। हम अपने कार्यों की 'रेटिन्ग्स' देखते हैं, समीक्षाएं पढ़ते हैं, आपस में चर्चाएं करते हैं, पाठकों के पत्रों को विशेष मह्त्व देते हैं। वैसे स्वयं विज्ञान संचारकों का जगत इस विषय में स्पष्ट नहीं है। और इस कठिन विषय पर हमारी सोच जारी है।

तिवारी - आपकी कौन सी विधि सर्वाधिक व्यय प्रभावी है?
मोहन्ति - यह तो प्रश्न ही गलत है। जिस कार्य को करने में जो व्यय होता है वही ठीक है। जो कार्य करना है वह करना ही है, उनके बीच प्रतियोगिता की‌ बात मह्त्वपूर्ण नहीं लगती। अंधविश्वास के विरोध में कार्यक्रम का अभिकल्प 'ड्रीम २०४७' के अभिकल्प से भिन्न होगा, और उन पर व्यय भिन्न होगा। और दोनों आवश्यक हैं।

तिवारी - देखिये किसी भी संस्था का बजट, विशेषकर हमारे देश में, तो हमेशा सीमित होता है। उस सीमित धन का बेहतर उपयोग करने के लिये आपको उनकी 'व्ययप्रभाविता' को तो देखना ही चाहिये। जैसे टीवी का माध्यम, यद्यपि बहुत लोकप्रिय है, बहुत मँहगा है, और रेडियो का अपेक्षाकृत बहुत सस्ता है।
मोहन्ति - विज्ञान प्रसार दोनों का उपयोग यथाशक्ति करता है टीवी की मँहगाई अपने आप ही एक सीमा तय कर देती है। साइन्स क्लब और 'कार्य शालाएं' हम बहुत व्यय प्रभावी मानते हैं। हम अपने कार्यों को 'लक्ष्य पर संधान' (टार्गैट स्पैसिफ़िक) करने का प्रयास करते हैं।

तिवारी - आपके सामने समस्याएं भी आती होंगी।
मोहन्ति - सबसे बड़ी समस्या तो प्रामाणिक जानकारी की होती है। विज्ञान जैसे विषय में भी कोई कुछ कहता है तो कोई कुछ और। इसमें कौन सा अधिक प्रामाणिक है ? दूसरे, विज्ञान की जानकारी को सही परिप्रेक्ष्य में समझना और रखना भी। अब अभी हुई  ताजी घटना 'संश्लेशित जीवन' को ही‌ लें। इसमें कितने व्यर्थ के विवाद उठाए जा रहे थे। कहां तो 'संश्लेशित जिनोम' की रचना की गई थी और माध्यम 'संश्लेषित जीवन' की बात कर रहा था। समस्याओं का हल करने के लिये तो हम लगे ही रहते हैं।

तिवारी - विज्ञान संचार का एक पुरानी पद्धति है जिसे 'डेफ़िसिट माडल' कहते हैं, और अब पश्चिम में वे 'संवाद प्रारूप' पर आ गए हैं। आप कौन सी पद्धति का उपयोग करते हैं।
मोहन्ति - हम तो जैसा लक्ष्य देखते हैं वैसा करते हैं. हम 'डेफ़िसिट माडल की तरह ज्ञान भी लेख आदि के रूप में देते हैं, और संवाद प्रारूप का भी उपयोग करते हैं, और जिस कार्य के लिये जो विधा उचित लगती है, उसी‌ का उपयोग करते हैं। हमारा तो मिश्रित प्रारूप है क्योंकि आवश्यकताएं भी भिन्न हैं।
  
तिवारी - मुझे पता नहीं कि विज्ञान संचारकों को आमंत्रित कर जो संगोष्ठी बुलाई जाती है उसका व्यय अधिक होता है या कम, किन्तु सतही रूप से वह अधिक उपयोगी नहीं लगती। आपका क्या अनुभव है?
मोहन्ति - तुलनात्मक रूप से हमें‌ वह अधिक खर्चीली नहीं लगती, वरन अधिक उपयोगी लगती है। पहले तो उसमें किसी‌ महत्वपूर्ण विषय पर विज्ञान संचारकों में विचारों का आदान प्रदान होता है, उनमें उस विषय के प्रति जागरूकता बढ़ती है। दूसरा विज्ञान संचारकों को आपस में अन्य विषयों पर भी चर्चा करने का समय मिलता है। एक तरह से उनके बीच 'नैट वर्किंग' (सचमुच में गोष्ठी के मूल अर्थ में) होती है और विज्ञान संचार की गतिविधियां बढ़ती हैं। और प्रलेखन (डाक्युमैन्टेशन) होता है।

तिवारी - आपके अनुभव में भारत के सामान्य व्यक्ति की वैज्ञानिक समझ (साइंटिफ़िक टैम्पर), वैज्ञानिक ज्ञान नहीं, कैसी है?
मोहन्ति - अच्छी है। कठिनाई इस समझ में किसी जानकारी के 'counter intuitive' होने की है। ऐसी स्थिति में 'विश्वास' ही मदद करता है-  विश्वास नई जानकारी देने वाले के प्रति। और भारतीय का खुला दिमाग का होना भी इसमें‌ मदद करता है।

तिवारी - आप ने विज्ञान प्रसार में १६ वर्षों से अधिक कार्य किया है, इस कार्य में प्रगति कैसी‌ हो रही है?।
मोहन्ति - शुरुआत अच्छी है, प्रगति सीमित है, यह बेहतर हो सकती थी, किन्तु सभी कारणों के देखते हुए विज्ञान का प्रसार करने में प्रगति अच्छी हुई है।

तिवारी - क्या आप भारत में हो रहे विज्ञान संचार की स्थिति की विकसित देशों से तुलना करना चाहेंगे?
मोहन्ति - इसका उत्तर सीधा नही हो सकता। कहीं हम बेहतर हैं तो कहीं वे। पाकिस्तान के प्रसिद्ध भौतिकीविद प्रो. हुडबाय हैं, जिऩ्हें कलिंग पुरस्कार से सम्मानित किया गया था उऩ्होंने तो यह कह दिया कि काश विज्ञान प्रसार जैसी संस्था उनके देश में भी होती। प्रगति पर शोध होते रहना चाहिये, न केवला मात्रा का वरन गुणवत्ता का भी।

तिवारी - जी हां, इलैक्ट्रानिक्स परिपथ में इसे कहते हैं कि 'लूप मस्ट बी क्लोज़्ड' अर्थात आत्मालोचन करते रहना चाहिये। आप इस देश में भी अपने कार्य के सम्बन्ध में बहुत स्थानों में गए हैं। किस प्रान्त के लोगों की वैज्ञानिक समझ से आप सर्वाधिक प्रभावित हुए हैं, और किससे कम?
मोहन्ति - इसका उत्तर मैं नहीं दे सकता क्योंकि इस पर अवलोकन कर मैने या अन्य किसी ने कोई वैज्ञानिक पद्धति से अवलोकन नहीं किया है। वैसे यह कह सकता हूं कि हिन्दी के अतिरिक्त महाराष्ट्र, बंगाल, केरल में विज्ञान प्रसार के लिये अच्छा कार्य हो रहा है।

तिवारी - 'वैज्ञानिक समझ का माप कैसे किया जाए?', यह भी तो एक समस्या है। हम बीटी बैंगन का ही उदाहरण लें इसके विषय में हमारे शासक या अधिकारी या तत्संबन्धी वैज्ञानिक वर्ग की सोच क्या वैज्ञानिक है?
मोहन्ति - बैंगन की हमारे यहां विभिन्न जलवायु तथा मिट्टी के लिये सैकड़ों जातियां तथा उपजातियां हैं। इसकी उपज में कोई कमी‌ नहीं‌ है क्योंकि पारंपरिक कृषि से ही मांग तो पूरी हो रही है। और बीटी बैंगन के दुष्प्रभाव क्या क्या हो सकते हैं, इस पर पर्याप्त शोध तो होना चाहिये। और जब तक यह सब स्पष्ट नहीं हो जाता तब तक इसे बाजार में नहीं लाना चाहिये। 

तिवारी - इस चर्चा या वाद- विवाद में 'विज्ञान प्रसार' को  भी आना चाहिये। बीटी फ़सलें बहुत मह्त्वपूर्ण विषय हैं, इनमें हमारी बीज संबन्धी स्वायत्ता को भी‌ खतरा है। अस्तु। अब एक दूसरा प्रश्न - ऐसी मान्यता है कि विज्ञान तो केवल अंग्रेज़ी भाषा में‌ ही लिखाया पढ़ाया जा सकता है, भारतीय भाषाएं इसके योग्य नहीं। इस पर आपके क्या अनुभव हैं?
मोहन्ति - मैं कहना चाहूंगा कि ऐसी मान्यता थी। अब तो यह दिख रहा है कि हिन्दी में तथा अन्य समृद्ध भारतीय भाषाओं में यह शक्ति है। यह तो अनेक विज्ञान संचारक अग्रणी विज्ञान लिखकर सिद्ध कर रहे हैं। हां यह बात तो है कि विज्ञान में आवश्यक पाठ्य पुस्तकें‌ नहीं‌ हैं।

तिवारी - जी हां। इससे तो आप सहमत होंगे कि जब तक पाठ्यपुस्तक के बाजार में बिकने की संभावना नहीं होगी, पाठ्य पुस्तक के प्रकाशित होने की संभावना ही कम होगी। भारतीय भाषाओं में लोकप्रिय विज्ञान खूब लिखा जा रहा है। क्या विज्ञान की शिक्षा भारतीय भाषाओं में दी जाना चाहिये?
मोहन्ति - जी हां, तभी हम विज्ञान में और प्रौद्योगिकी में सच्ची उन्नति करेंगे।
 
तिवारी -  मैं अब अपनी चर्चा की दिशा विज्ञान कथा की ओर मोड़ना चाहता हूं। मेरी‌ जानकारी में विज्ञान प्रसार ने विज्ञान कथा में कुछ कार्य नहीं किया है।
मोहन्ति - तिवारी जी आप को तो ऐसा नहीं बोलना चाहिये। आप स्वयं औरंगाबद में हुई विज्ञान कथा में सक्रिय भाग लेने गए थे।

तिवारी‌ - मुझे क्षमा करें, मैं बिलकुल ही भूल गया था। जी हां आई ए एस एफ़ एस ('विज्ञान कथा अध्ययन का भारतीय एसोशिएशन') ने विज्ञान प्रसार के तत्वावधान में 'विज्ञान कथा की दशा और दिशा' विषय पर एक अखिल भारतीय संगोष्ठी की थी, जो बहुत प्रभावी हुई थी। यह औरंगाबाद में हुई थी जो कि उस संस्था का पश्चिम संभाग का मुख्यालय है। उनकी‌ यह ११ वीं संगोष्ठी थी। यह संस्था भी विज्ञान कथा के लिये अंग्रेज़ी तथा हिन्दी दोनों भाषाओं में कार्य करती है।
मोहन्ति - हमने प्रसिद्ध वैज्ञानिक नार्लीकर जी की विज्ञान कथाओं का मराठी से हिन्दी में अनुवाद भी करवाया है। उनकी एक विज्ञान कथा पर एक फ़िल्म का भी निर्माण करने की योजना है। २००७ में नेपाली तथा बांग्ला में विज्ञान कथा की १३ कड़ियों वाला कार्यक्रम भी रेडियो पर प्रसारित किया। अब निकट भविष्य में मराठी तथा हिन्दी में और कार्य करना है।

तिवारी - आप तो मूलत: उड़िया भाषी हैं, और सारा अध्ययन आपने अंग्रेज़ी में ही किया है, तब आप हिन्दी में विज्ञान लेखन के लिये किस तरह आए? और क्या आपको हिन्दी में विज्ञान लिखने में कठिनाई हुई?
मोहन्ति - मैं मूलत: बाग्ला भाषी हूं।

तिवारी - अरे, मोहन्ति-जन तो मुझे हमेशा ओडिशा के ही मिले। आपके पूर्वज बहुत पहले बंगाल आ गए होंगे?  
मोहन्ति - जी‌ हां, बहुत पहले। मुझे लगा कि हिन्दी अधिक महत्वपूर्ण भाषा है, इसे विज्ञान संचार की अधिक आवश्यकता है, और चूंकि मैंने स्नातक स्तर के बाद सारा अध्ययन और डाक्टरोत्तर कार्य भी वाराणसी में ही किया था, इससे मुझे हिन्दी से प्रेम भी हो गया था। मुझे हिन्दी में लिखने में कोई कठिनाई नहीं हुई, वरन मुझे गैर हिन्दी‌भाषी होने का विज्ञान लेखन में एक लाभ भी हुआ। मैं तकनीकी शब्द शब्द-कोश में देखकर ही लिखता हूं, जब कि हिन्दी‌भाषी उसे अपनी स्मृति या समझ के अनुसार लिखते रह्ते हैं। 

अब तक लंच का समय हो चुका था और उनके मित्र उऩ्हें दो बार बुला चुके थे, अत: मेरे पास और भी प्रश्न होते हुए मैने अंतिम प्रश्न  रखा।

तिवारी - डा. मोहन्ति अब आपसे विज्ञान प्रसार के विषय में इतनी विस्तृत तथा उपयोगी जानकारी प्राप्त करने के बाद मैं आपसे विज्ञान प्रसार के भविष्य की योजनाओं के विषय में संक्षिप्त जानकारी चाहूंगा।
मोहन्ति - अब हम बच्चों पर तथा नवसाक्षरों के लिये विज्ञान प्रसार पर अधिक जोर देना चाहेंगे। और हमें लगता है कि 'जैन्डर' मुद्दों अर्थात 'महिला पुरुष सम्बन्धों' पर भी कुछ कार्य की आवश्यकता है। मोटे तौर पर कहें तब हम लक्ष्य पर ध्यान रखकर ही कार्य करेंगे। भारतीय भाषाओं में अधिकाधिक सामग्री का प्रसार करेंगे। 

तिवारी - मोहन्ति जी यह सभी उद्देश्य मह्त्वपूर्ण हैं। मुझे पूरी आशा है कि विज्ञान प्रसार इन महती उद्देश्यों में‌ सफ़ल होगा। आपने आपने बहुमूल्य समय में से 'हिन्दी.कल्किआन.काम' को समय दिया, उसके लिये कैल्कियान परिवार आपका आभार स्वीकार करता है। और एक अन्तिम अनुरोध कि आप कृपया समय निकालकर अंग्रेजी के 'kalkion.com' तथा हिन्दी के 'हिन्दी.कैल्कियान.काम' को अवश्य देखें और हमें उसमें सुधार तथा समुन्नति के लिये सुझाव दें। बहुत धन्यवाद।
मोहन्ति - तिवारी जी आपका धन्यवाद कि विज्ञान प्रसार के साथ आपने बातचीत की और उसके प्रसार के द्वारा आप विज्ञान का भी प्रसार करेंगे।



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by Dr. Radut.